एक बार फिर ‘डायन कुप्रथा’ अमानवीय कुकृत्य एवं 5 लोगों की हत्या के कारण चर्चा में है। 6-7 जुलाई की दरमियानी रात को बिहार के पूर्णिया जिले के टेटगामा गांव में ग्रामीणों की भीड़ ने एक ही परिवार के पांच लोगों को पीट-पीट कर अधमरा किया तथा जिंदा जलाकर उन्हें मार डाला। इसके बाद गांव वालों ने अलग-अलग बोरियों में पांचों लाशों को भरकर ट्रैक्टर में लादकर गांव के बाहर जलकुंभियों वाले तालाब में फेंक दिया था। मृतकों के नाम बाबूलाल उरांव उम्र 65 साल, उनकी माता कांतो देवी उम्र 80 साल, पत्नी सीता देवी उम्र 60 साल, पुत्र मंजित उम्र 25 साल और पुत्रवधू रेखा देवी उम्र 22 साल हैं। जिला मुख्यालय से मात्र 12 किमी दूर टेटगामा गांव में बाबूलाल उरांव के परिवार पर रात भर ग्रामीणों का हिंसक नंगा नाच चलता रहा। लेकिन जिस पुलिस के पास गुप्त सूचना पहुंचाने वाले आदमी सब जगह मौजूद होते हैं तथा आधुनिक संसाधनों से लैस होती है, उसी पुलिस को इसकी सूचना तक नहीं मिली। यह बात समझ से परे है।
इस हत्याकांड के खिलाफ पूरे गांव पर एफआईआर दर्ज हुई है, जिसमें 23 लोग नामजद हैं तथा 200 लोग अज्ञात बताए गए हैं। हत्यारों ने आरोप लगाया था कि मृतक महिलाएं डायन थीं तथा पूरा परिवार जादू-टोना करता था। नामजद आरोपियों में से एक रामदेव उरांव के एक बेटे की मौत कुछ महीने पहले बीमारी से हो गई थी तथा उसका छोटा बेटा बीमार चल रहा था। रामदेव ने आरोप लगाया था कि बाबूलाल उरांव के परिवार द्वारा जादू-टोना करने से उसके बड़े बेटे की मौत हुई तथा दूसरा बीमार है। यह मामला गांव के ही तंत्र-मंत्र करने वाले एक तांत्रिक नकुल उरांव के पास गया था। तांत्रिक ने भी बताया था कि बाबूलाल का परिवार जादू-टोना करता है और रामदेव के बेटे की मौत जादू-टोना के कारण हुई है। यह मामला काफी दिनों से चल रहा था लेकिन जब रामदेव का दूसरा बेटा बीमार पड़ा तो तांत्रिक ने फिर बताया कि यह सब बाबूलाल के परिवार द्वारा जादू-टोना करने की वजह से हो रहा है। फिर मामला उग्र हो गया बीमार बेटे को लेकर ही 6-7 जुलाई की दरमियानी रात 9ः30 बजे गांव की पंचायत बुलाई गई और पंचायत ने फैसला सुनाया कि बाबूलाल उरांव का परिवार रामदेव के बेटे को ठीक करे। फिर भीड़ हिंसक हो गई और 10ः30 बजे के आस-पास बाबूलाल उरांव के घर पर लाठी-डंडों से हमला कर उनके सभी सदस्यों को बुरी तरह से पीटकर अधमरा कर दिया गया। फिर गांव से बाहर बसवारी में ले जाकर, उनको जिंदा ही आग के हवाले कर दिया गया। इस घटना के बाद सरकार, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, नेताओं, अधिकारियों, तथाकथित बुद्धिजीवियों, एनजीओ मार्का सामाजिक संस्थाओं आदि के भांति-भांति के बयान आ रहे हैं। शिक्षा, अज्ञानता, पिछड़ापन, अंधविश्वास और गरीबी आदि, आदि को इसका कारण बताया जा रहा है। इस घटना के लिए आदिवासी समाज और उनके पिछड़ेपन को ही जिम्मेदार बताया जा रहा है।
आजादी के 78 साल बाद भी बिहार, झारखंड, उड़ीसा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में डायन और टोना-टोटका के नाम पर हत्याएं की जा रही हैं। अगस्त 2015 में झारखंड की राजधानी रांची के पास एक गांव में पांच महिलाओं को डायन बताकर नंगा कर उनकी भी पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार वर्ष 2000 से 2024 तक 2500 महिलाओं पर डायन होने का आरोप लगाकर उनकी निर्मम हत्या की गई। केवल वर्ष 2000 में ही डायन के नाम पर 85 महिलाओं की हत्या की गई। एक सर्वे के अनुसार केवल बिहार में अभी भी 75,000 ग्रामीण महिलाओं पर डायन होने का सामाजिक ठप्पा लगा है, यानी ये महिलाएं डायन के रूप में जानी जाती हैं।
जो महिलाएं डायन के रूप में जानी जाती हैं उनके साथ सामाजिक रूप से बहुत ही घिनौना और अमानवीय बर्ताव होता है। पीटकर, जलाकर मार देना तो एक बात है, लेकिन जीते जी उन्हें मानव मल-मूत्र खिलाना, सर मुंड़वाना, नंगा करके गांव में घुमाना, सामाजिक-आर्थिक बहिष्कार करना जैसे कुकृत्य उनके साथ किए जाते हैं। ऐसा होने से महिलाएं अवसाद में चली जाती हैं, सुन्न हो जाती हैं। भयंकर अपमान के साथ घुट-घुट कर जीना, मौत से भी ज्यादा पीड़ादायी होता है। डायन का आरोप झेलने वाली और हत्या व हिंसा की शिकार महिलाओं की उम्र मोटा-मोटी 30 से 66 वर्ष के बीच होती है। इनमें 97 प्रतिशत महिलाएं दलित, अति पिछड़ी तथा पिछड़ी जातियों से होती हैं। जो कि आर्थिक रूप से अति कमजोर एवं पूर्णतः भूमिहीन होती हैं। इनके परिवार की कोई नियमित आय नहीं होती है। सवर्ण और संपन्न महिलाओं पर कोई उंगली भी नहीं उठाता है।
कुछ अग्रणी नेतृत्वकारी महिलाओं को भी डायन के नाम पर हिंसा व हत्या का शिकार बनाया जाता है। शराब बिक्री व सेवन के खिलाफ संघर्ष में कई महिलाओं ने आदिवासी इलाकों में अग्रणी भूमिका अदा की। उन्होंने संघर्षों का नेतृत्व किया है। ऐसी महिलाओं को पुरुष वर्चस्व के खिलाफ माना जाता है तथा उनको सबक सिखाने के लिए डायन बताकर, जादू-टोना करने वाली बताकर उनके ऊपर हिंसा और अत्याचार किया जाता है।
हालिया आंकड़ों से पता चला है कि पीड़ित महिलाओं में से 73 प्रतिशत तो कभी स्कूल भी नहीं गईं। केवल 31 प्रतिशत पीड़ित महिलाएं थाना पुलिस अथवा ग्राम पंचायत में अपने मामले को ले गई हैं, लेकिन इनमें से भी 62 प्रतिशत मामलों का कोई समाधान नहीं मिला है। 38 प्रतिशत मामलों को पुलिस और पुरुष प्रधान पंचायत ने किसी तरह सुलह समझौता कराकर रफा-दफा कर दिया। ग्राम पंचायतें, पुलिस और सामुदायिक शासन में काम करने वाले स्थानीय अधिकारी जिनकी भूमिका महत्वपूर्ण बनती है, वे खुद ही डायन जैसी कुप्रथाओं में विश्वास रखते हैं अथवा तांत्रिकों से वसूली करते हैं अथवा निष्क्रिय रहते हैं।
1999 में बिहार सरकार ने डायन प्रथा निवारण अधिनियम-1999 बनाया तथा झारखंड में भी डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम-2001 बनाया गया है। डायन और जादू टोना जैसी कुप्रथाओं को रोकने के लिए इसी तरह के कानून छत्तीसगढ़, उड़ीसा, राजस्थान, असम, महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी बनाए गए हैं। लेकिन इनका क्रियान्वयन बहुत ही लचर है। आदिवासी क्षेत्रों में काम करने वाले सामाजिक संस्थाओं के सर्वे में बताया गया है कि लगभग 85 प्रतिशत ग्राम प्रधान या मुखिया कुप्रथाओं को रोकने वाले कानूनी प्रावधानों से अनभिज्ञ होते हैं। यहां तक कि एसएचओ और उनके ऊपर के कई पुलिस अधिकारी भी उपरोक्त कानूनी प्रावधानों से अनजान होते हैं।
बिहार और झारखंड जैसे राज्यों की सरकारें कानून बनाकर अपने कानों में तेल डालकर चैन से सो रही हैं। असल में कुप्रथाओं को रोकने की उनकी कोई मंशा नहीं है। सरकार पीड़ित महिलाओं के पुनर्वास में कोई मदद या सहयोग नहीं देती हैं। जिन मामलों में महिलाओं पर अत्यधिक हिंसा की गई होती है, उन्हें अस्पताल पहुंचाने या मदद करने का काम पुलिस या सरकारी कर्मचारी नहीं करते हैं, यह काम आदिवासी इलाकों में काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं के कार्यकर्ता ही करते हैं।
आजादी के बाद बने संविधान में सामाजिक बुराइयों, भेदभाव, तंत्र-मंत्र, जादू-टोना और डायन जैसी कुप्रथाओं को रोकने के लिए संवैधानिक व कानूनी प्रावधान हैं, लेकिन सत्ता में कांग्रेस रही हो या भाजपा-आरएसएस की मोदी सरकार, सामाजिक बुराइयों को रोकने या मिटाने के लिए कोई ठोस कार्यक्रम नहीं बनाया गया बल्कि उक्त सरकारों ने सामाजिक बुराइयों का चुनावी नफा-नुकसान के हिसाब से इसका इस्तेमाल किया है।
एक अध्ययन से पता चला है कि 2003 में कांग्रेस के तत्कालीन राज्यसभा सांसद बिम्बा रायकर ने ‘महिला एवं बालिका’ नाम से एक निजी विधेयक पेश किया था, जिसमें डायन जैसी कुप्रथा को रोकने का प्रावधान था। लेकिन कांग्रेस पार्टी की सरकार की उदासीनता के कारण उसे वापस ले लिया गया था। 2016 में भाजपा के तत्कालीन सांसद राघव लखन पाल ने डायन प्रथा को रोकने के लिए एक निजी विधेयक राज्यसभा में पेश किया था, लेकिन मोदी सरकार ने उसे भी वापस करवा लिया था। 2022 में भाजपा सांसद सुजीत कुमार ने डायन-दागा, डायन-शिकार एवं अन्य हानिकारक कुप्रथाओं को रोकने के लिए एक निजी विधेयक पेश किया था, लेकिन वह भी ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है।
भाजपा-आरएसएस की मोदी सरकार की बात की जाए तो पिछले 11 सालों में इस सरकार और इससे जुड़े हुए हिंदू संगठनों ने लव जिहाद, धर्मांतरण, तीन-तलाक, हिजाब, समान आचार संहिता, धारा 370, नमाज, बीफ, हज यात्रा और कुर्बानी जैसे मुस्लिम समुदाय से जुड़े हुए रीति रिवाजों को एजेंडा बनाकर ,उसमें नफरत का मिर्च मसाला लगाकर मुसलमान समुदाय के खिलाफ दुष्प्रचार किया है। इसके उल्टे मौजूदा सरकार द्वारा हिंदू धर्म और आदिवासी समुदाय के बीच मौजूद दलित विरोधी, महिला विरोधी सामाजिक बुराइयों, कुप्रथाओं, अंधविश्वासों, पाखंडों और पाखंडियों का आस्था के नाम पर महिमामंडन और प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी तो अपने को ईश्वरीय अवतार साबित करने में लगे हैं। मोदी व अन्य भाजपा नेता आस्था के नाम पर पाखंड और अंधविश्वास को ही स्थापित करते रहे हैं। जिस देश का प्रधानमंत्री वैज्ञानिक सोच पर चलने के बजाय आस्था के नाम पर अंधविश्वास और पाखंड के रास्ते पर चलता हो तो उस देश में कुप्रथाओं को कैसे मिटाया जा सकता है?
संघ एक सोची समझी नीति के तहत हिन्दू त्यौहारों-दिवसों को जोर-शोर से मनाने में जुटा है। इस प्रक्रिया में वह समाज में व्याप्त धार्मिक पाखण्ड-पिछड़े मूल्यों-परम्पराओं को बढ़ावा देने से परहेज नहीं कर रहा है। वह इन दिवसों-त्यौहारों को हिन्दू ध्रुवीकरण के लिए व मुसलमानों पर हमले के लिए इस्तेमाल कर रहा है। पर यूं ही नहीं है कि कांवड़ यात्रा हो या शोभा यात्रायें अक्सर ही तय राह से भटक कर मस्जिदों-मुसलमानों के मोहल्लों में पहुंच साम्प्रदायिक हिंसा का कारण बन जा रही हैं।
महिला हितों का दावा करने वाले संघी तत्व दरअसल घोर महिला विरोधी हैं। दूसरे धर्म की महिलाओं के साथ बलात्कार की धमकी, हिन्दू बलात्कारियों का फूल मालाओं से स्वागत, यौन उत्पीड़न के आरोपी नेताओं को संसद-विधानसभा पहुंचाना आदि दिखलाता है कि ये दरअसल महिलाओं को पैरों की जूती से ज्यादा अहमियत नहीं देते। ऐसे में स्पष्ट ही है कि महिलाओं के उत्पीड़न से जुड़ी कुप्रथायें इसके राज में खत्म होने के बजाय और बलवती ही होंगी।
आज शासक पूंजीपति वर्ग समाज को कुछ भी सकारात्मक देने के लायक नहीं बचा है। वह प्रतिक्रियावादी हो चुका है। इसीलिए वो संघ-भाजपा सरीखे प्रतिक्रियावादी-फासीवादी तत्वों को सत्ता पर पहुंचा रहा है। जो अपनी बारी में समाज को सारी वैज्ञानिक सोच-तर्कपरकता से दूर कर साम्प्रदायिक उन्माद, पाखण्ड, अंधश्रद्धा-अंधराष्ट्रवाद के दलदल में धकेल रहे हैं। ऐसे में स्पष्ट ही है कि ये ताकतें एक ओर पूंजीपति वर्ग को मजदूर-मेहनतकशों के शोषण को बढ़ाने की नित नयी सहूलियतें दे रही हैं तो दूसरी ओर जनता को अंधविश्वास, कुप्रथाओं, साम्प्रदायिकता में डुबो कर उनको पूंजी के खिलाफ एकजुट हो संघर्ष करने से दूर ले जा रही हैं।
लूट पर आधारित पूंजीवादी व्यवस्था में मजदूरों-मेहनतकशों को लूटने वाले शासन सत्ता में बैठे नेताओं-अधिकारियों से सामाजिक बुराइयों और कुप्रथाओं को मिटाने अथवा रोकने की आशा करना निराधार व व्यर्थ है। दरअसल समूची पूंजीवादी व्यवस्था और इसको संचालित करने वाली प्रतिक्रियावादी ताकतें किसी भी सड़ी-गली सामाजिक बुराइयों और कुप्रथाओं को बढ़ावा देकर अपने सुरक्षा कवच की तरह इस्तेमाल कर रही हैं।
दरअसल सामाजिक बुराइयों और डायन जैसी प्रथाओं को रोकने का काम पूंजीवादी व्यवस्था और सामंती मूल्य-मान्यताओं के खिलाफ संघर्षों को संगठित करने, मजबूत बनाने और तेज करने के रास्ते से ही किया जा सकता है