‘ताबूत घर’ और ‘बिलों के लोग’

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
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हांगकांग (चीन) और लास वेगास (अमेरिका) पूंजीवादी दुनिया के चमचमाते शहरों में से हैं। हांगकांग लगभग एक शताब्दी से प्रमुख औद्योगिक-व्यापारिक केन्द्र रहा है। वहीं लास वेगास आधी शताब्दी से पूंजीवादी दुनिया में मौज-मस्ती-अय्याशी के सबसे बड़े केन्द्र के रूप में उभर के आया है। लास वेगास दुनिया भर के सबसे बड़े जुआघर के रूप में प्रसिद्ध है। 
    
इन शहरों को पहली नजर में देखकर यहां की चकाचौंध चमत्कृत कर देती है। जगमगाती सड़कें, ऊंची-ऊंची इमारतें, महंगी गाड़ियां, हर किस्म की शान-शौकत इनको पूंजीवाद के स्वर्ग सरीखी आभा प्रदान करते हैं। लेकिन पूंजीवाद के ये स्वर्ग केवल उन्हीं के लिए हैं जिनकी जेब में मोटा पैसा है। गरीब आदमी को तो दूर से भी इस आभा का आनंद बहुत महंगा पड़ सकता है। 
    
सभी पूंजीवादी चकाचौंध से लबरेज ऐसे शहरों के स्वर्गों के नीचे इनके अपने-अपने पाताल लोक होते हैं। ये पाताल लोक इन शहरों के अपने नरक होते हैं। हांगकांग के नरक की झलक ‘काफिन होम्स’ और लास वेगास के नरक की झलक ‘मोल पीपुल्स’ के रूप में हम पा सकते हैं। 
    
‘काफिन होम्स’ या ‘ताबूत घर’ हांगकांग शहर में रहने की ऐसी जगहें होती हैं, जिनमें केवल उतनी ही जगह होती है, जितनी की एक बड़े ताबूत में होती है। इसलिए इन्हें ‘काफिन होम्स’ या ‘ताबूत घर’ कहते हैं। 
    
कल्पना करने के लिए आप ऐसा समझ सकते हैं कि रेलगाड़ी के स्लीपर कोच की सीटों को बंद करके एक बाक्स जैसा बना दिया जाये, तो वह कुछ-कुछ ‘ताबूत घर’ जैसा बन जायेगा। इतनी ही जगह पर लोगों का सारा सामान भरा होता है। इसमें इतनी जगह नहीं होती है कि कोई खड़ा हो सके। इसलिए खाना- पीना, कपड़े बदलना, आदि सब कुछ बैठकर या लेटकर करना पड़ता है। 
    
दरअसल रियल एस्टेट के मुनाफाखोरों ने जगह-जगह बिल्डिंगों में बड़े कमरों को दो या तीन तला पार्टीशन करके इस तरह के ‘ताबूत घरों’ में परिवर्तित कर दिया है। एक बड़े कमरे में लगभग 25-30 ऐसे ‘ताबूत घर’ बन जाते हैं। ऐसे ‘ताबूत घरों’ में एक व्यक्ति का रहना भी मुश्किल है, फिर भी कुछ में दो-दो लोग तक ठुंसे रहते हैं। ऐसी जगह पर कोई खिड़की नहीं होती है। हवा के आने-जाने का कोई रास्ता नहीं रहता, इसीलिए भयंकर उमस और दमघोंटू बदबू होती है। ऐसी उमस में बिस्तरों-कपड़ों में खटमलों की भरमार होती है। लगभग सारे ही लोग गंभीर त्वचा सम्बन्धी बीमारियों से ग्रस्त रहते हैं। अगर कोई खाना बनाना चाहता है तो उसे बाथरूम-टॉयलेट को इस्तेमाल करना पड़ता है। अन्य कामां के लिए इस्तेमाल होने वाले वॉश बेसिन ही सब्जियां धोने के लिए प्रयुक्त होते हैं। 
    
हांग-कांग के अंदर लगभग सवा दो लाख लोग ऐसे ‘ताबूत घरों’ में रहते हैं। और ऐसे ताबूत सरीखे घरों के लिए भी कम से कम तीस हजार रुपये का भुगतान करना पड़ता है। यहां रहने वाले लोग साठ हजार से लेकर डेढ़़ लाख रुपये मासिक तक कमाने वाले लोग हैं। कितनी व्यग्ंयपूर्ण क्रूरता है कि हांगकांग में जेल के अंदर भी एक कैदी को इससे पांच गुना ज्यादा बड़ी जगह मिलती है, जिसमें खुद का टॉयलेट भी होता है। यानी ‘ताबूत घरों’ के निवासी कैदियों से भी बुरी जिंदगी जी रहे हैं। अधिकांश लोग ऐसी जगहों पर 5-10 साल से रह रहे हैं। 
    
‘ताबूत घरों’ के निवासियों की ही तरह का नारकीय जीवन ‘मोल पीपुल’ (बिलों के लोग) भी जीने को मजबूर हैं। लास वेगास शहर सड़कों और कंक्रीट का जंगल सरीखा है। ऐसे में जब शहर के ऊपर य पास के पहाड़ों पर बारिश होती है, तो पूरे शहर की सड़कों में बरसाती पानी की नदियां बहने का खतरा रहता है। इस समस्या के समाधान के लिए पूरे शहर के नीचे लगभग 320 किलोमीटर लंबाई में फैला सुरंगों का जाल है, जिनके माध्यम से यह बरसाती पानी शहर से बाहर निकाल दिया जाता है। 
    
लास वेगास शहर के हजारों गरीबों ने इन्हीं सुरंगों को अपना घर बना लिया है। इन लोगों को ही ‘मोल पीपुल’ के नाम से जाना जाता है। ये लोग शहर में छोटा-मोटा रोजगार, कूड़ा बीनना, सामान ढोना, आदि करने वाले लोग हैं। बहुत से लोग बेघर-बार हो चुके लोग हैं। बहुत से अपने पहचान-पत्र खो चुके हैं, इसलिए इन्हें पुलिस-प्रशासन से छिपकर इन सुरंगों में रहना पड़ता है। 
    
इन सुरंगों में प्रकाश की व्यवस्था नहीं होती है। घनघोर अंधेरे में टार्च की रोशनी में ही लोगों को अपने सारे काम करने पड़ते हैं। जब शहर का पानी इन सुरंगों में घुसता है, तो इन लोगों की जान पर बन आती है। हर बार के पानी भरने में 3-4 लोग तो मारे ही जाते हैं। इन लोगों की लाशें इन्हीं सुरंगों में पड़ी-पड़ी सड़ती रहती हैं। इसी तरह बाढ़ के साथ आये मरे जानवरों की लाशें भी इन सुरंगों में सड़ांध भरी हवा फैलाए रखती हैं। 
    
बाढ़ के पानी के अलावा शहर का गंदा पानी और मल-मूत्र भी इन्हीं सुरंगों से होकर जाता है। सुरंगों के तल पर यह गंदा कीचड़ जगह-जगह भरा रहता है, जिससे चलकर इन ‘मोल पीपुल’ को कई बार गुजरना होता है। इन सुरंगों में लूट-पाट, हिंसक झड़पों और हत्या की घटनाएं भी बेहद आम हैं। 
    
लगातार अंधेरे और डर के माहौल में रहने के कारण ये ‘मोल पीपुल’ गंभीर मनोवैज्ञानिक बीमारियों से ग्रस्त हैं। वहम-भ्रम, सिजोफ्रेनिया (भूत-प्रेत दिखाई-सुनाई देना) जैसी मनोवैज्ञानिक समस्यायें इन लोगों में बेहद आम हैं। 
    
दुनिया के सारे ही बड़े शहर इस तरह के ‘ताबूत घर’ निवासियों व ‘मोल पीपुल’ से भरे पड़े हैं। हमारे अपने देश भारत में भी नदी-नालों, रेल पटरियों के इर्द-गिर्द ऐसे पूंजीवादी नरक एकदम आम हैं। जिन्हें विदेशी राजनेताओं के आगमन पर पर्दे के पीछे छुपाने की कोशिशें हमारी सरकारें करती  हैं। ‘ताबूत घरों’ और ‘मोल पीपुल’ के उदाहरण से हम पाते हैं कि पूंजीवाद के सबसे अग्रणी देश भी मानवता के ऊपर इस कलंक से मुक्त नहीं हैं। साफ है कि पूंजीवाद एक ही प्रक्रिया में चकाचौंध और नारकीय अंधकार दोनों पैदा करता है। हर समय, हर जगह। पूंजीपतियों के लिए स्वर्ग और गरीबों के लिए नरक दोनों ही मुनाफे की हवस का परिणाम हैं। 

(प्रस्तुत लेख Ruhi Cenet (रूही चेनेट) के यू-ट्यूब चैनल पर उपलब्ध डाक्यूमेंट्री फिल्मों पर आधारित है। पाठक ‘काफिन होम्स’ और ‘मोल पीपुल’ के बारे में जानने के लिए इन फिल्मों को देख सकते हैं) 

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