ऐसा बहुत ही कम होता है कि भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री हर छोटी-बड़ी चीज का श्रेय न लें। अक्सर ही उन्हें अपने छोटे-मोटे कामों की ‘वाह-वाही’ करते देखा जा सकता है। आये दिन वे पेट्रोल पम्पों के पास अपने आपको धन्यवाद देने के लिए अपने ही खजाने से अपने ही आदमियों से पोस्टर लगवाते हैं। ‘धन्यवाद मोदी!’ के पोस्टर जुगुप्सा पैदा करते हैं परन्तु मोदी जी को क्या। ऐसा ही हाल तब हुआ था जब ‘आपरेशन सिंदूर’ के बाद फौजी ड्रेस में मोदी सड़कों-चौराहों पर अवतरित हो गये थे। फौजी ड्रेस में मोदी जी यूं नमूदार हुए मानो सीधे जंग के मैदान से आये हों। फिर ऐसा क्या हुआ कि मोदी जी ने ‘ऐतिहासिक अंतरिम व्यापार रूपरेखा’ (‘हिस्टोरिक इंतरिम ट्रेड फ्रेमवर्क’) का श्रेय नहीं लिया। अपने दो मंत्रियों विदेश मंत्री और वाणिज्य मंत्री को बंदरों की तरह उछलने-कूदने, खी-खी-खा-खा करने को छोड़ दिया। और खुद मलेशिया चले गये।
बाद में संसद और देश में मचे हल्ले-गुल्ले के बाद मोदी जी का सोशल मीडिया में एक ठण्डा बयान डोनाल्ड ट्रम्प को धन्यवाद देते हुए आया कि ‘‘यह रूपरेखा हमारी साझेदारी की बढ़ती गहराई, भरोसे और गतिशीलता को दर्शाती है...हमारे बीच निवेश और तकनीक की साझेदारी को और गहरा करेगी’।
हकीकत में क्या हुआ है? भारत के स्वयंभू राष्ट्रवादियों ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया है। और एक तरीके से अपने इतिहास को फिर से दुहरा दिया है। आजादी की लड़ाई के समय ये ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के ‘आज्ञाकारी सेवक’ थे और आज ये अमेरिकी साम्राज्यवादियों के आज्ञाकारी अनुचर बने हुए हैं।
‘‘ऐतिहासिक अंतरिम व्यापार रूपरेखा’’ के अनुसार भारत अमेरिका से आयात करने वाले सभी अमेरिकी औद्योगिक सामानों और ढेर सारे अमेरिकी खाद्य व कृषि उत्पादों पर या तो शून्य टैरिफ (कर) लगायेगा या फिर उन्हें कम कर देगा। अगले पांच साल में भारत अमेरिका से 500 अरब डालर का सामान खरीदेगा। भारत रूस से (और ईरान से तो पहले से ही) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से तेल नहीं खरीदेगा।
और अमेरिका क्या करेगा? नई स्थिति में भारतीय सामानों पर अमेरिकी टैरिफ 50 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत हो जायेगा। चन्द माह पहले तक यह टैरिफ महज 2.9 प्रतिशत था। यानी अमेरिका ने किस्म-किस्म के दबाव बनाकर इस टैरिफ को 2.9 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक बढ़ाया और जब भारत के महान राष्ट्रवादियों ने उसके सामने समर्पण कर दिया तो उसे घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया। यह करते हुए भी नई तरह की शर्तें थोप दीं। यहां से तेल खरीदोगे वहां से नहीं खरीदोगे। 500 अरब डालर का सामान अगले 5 साल में खरीदोगे ही खरीदोगे।
अभी तक स्थिति यह रही है कि भारत की जनता को जो कुछ भी पता चल रहा है वह अमेरिका की सरकार से पता चल रहा है। भारत के प्रधानमंत्री, उनके मंत्री हकीकत को झूठ और लफ्फाजी से छिपा रहे हैं। वाणिज्य मंत्री लफ्फाजी करते हुए बयान देते हैं ‘‘संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों की पूरी तरह से रक्षा’’ की गयी है।
अमेरिकी साम्राज्यवादी जो भारत के साथ कर रहे हैं ठीक वही तीसरी दुनिया के अन्य देशों के साथ भी कर रहे हैं। भारत के शासकों का मुखरतापूर्वक इस सब का विरोध करने के स्थान पर रुख उल्टा ही है। भारत के सरकारी भौंपू बने अखबार इस बात पर जश्न मना रहे हैं कि हमसे ज्यादा खराब हालत तो बांग्लादेश की है। भारत ने तो अपने किसानों की बड़ी रक्षा की है परन्तु बांग्लादेश तो ऐसा नहीं कर सका है। यह कैसा तर्क है। कोई गुलाम इस बात पर खुश हो कि उसके साथ वाले गुलाम ने मालिकों से ज्यादा कोड़े खाये।
भारत के शासकों खासकर आज के शासकों का व्यवहार ऐसा क्यों है। वे क्यों अमेरिकी साम्राज्यवादियों का मुखर विरोध नहीं कर पाते हैं। वे क्यों नहीं इस बात का जोखित उठाते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवादी नाराज हों तो हों, पर वे किसी भी कीमत पर एक देश के रूप में भारत की सम्प्रभुता, स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता व राष्ट्रीय गौरव की रक्षा करेंगे। कोई समझौता होगा तो बराबरी, परस्पर लाभ व साझे भविष्य के लिए होगा अन्यथा नहीं होगा। क्या भारत के शासक आज की दुनिया में अमेरिकी, यूरोपीय, जापानी, चीनी, रूसी साम्राज्यवादियों के साथ आंख से आंख मिलाकर व्यवहार, बातचीत, समझौते कर सकते हैं? ये जो भाषा पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल के लिए इस्तेमाल करते हैं उसको भूलवश भी साम्राज्यवादियों के सामने नहीं दुहरा सकते हैं।
कारण स्पष्ट है। भारत के शासकों खासकर एकाधिकारी घरानों के हित व भविष्य इसमें ही सुरक्षित है कि भारत अलग-अलग साम्राज्यवादियों से अच्छे-बुरे समझौते करे और चुपचाप उनकी शर्तों को कम या ज्यादा, जल्दी या देर से स्वीकार कर ले। इनको अधिक से अधिक जो लाभ, समय, स्थान मिलता है वह साम्राज्यवादी देशों के आपसी झगड़ों-लफड़ों व हितों की टकराहट के कारण ही मिल पाता है या मिल पाता रहा है। हुआ यह है कि जैसे-जैसे अन्य परम्परागत साम्राज्यवादी अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सामने बौने होते गये हैं इनकी सौदेबाजी की क्षमता, समय की उपलब्धता आदि खतरे में पड़ गये हैं। चीनी साम्राज्यवादी इस बीच में एक बहुत बड़ी ताकत के रूप में उभरे पर चीन का साम्राज्यवादी उभार भारत की सौदेबाजी की क्षमता को बढ़ाने के स्थान पर इनको पश्चिमी खासकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के सामने समर्पण की ओर ही अधिक धकेलता है।
चीनी साम्राज्यवादियों से भारत का शासक वर्ग खास तरह का खतरा, भय और प्रतिद्वन्द्विता रखता है। इस कारण ये अमेरिकी साम्राज्यवादियों की ओर ज्यादा ही झुकते गये हैं। अमेरिकी साम्राज्यवादी भी भारत के लुंज-पुंज शासकों का भयादोहन करते हैं और इस तरह इन्हें अपने पाले में कम या ज्यादा बनाये रखते हैं। भारत के वर्तमान हिन्दू फासीवादी शासकों की स्थिति अपने पूर्ववर्त्तियों से और भी खराब है। अपने जन्म से ही ये अमेरिकी साम्राज्यवाद के खास प्रशंसक रहे हैं। मोदी का ट्रम्प की प्रशंसा में कसीदाकारी करना इसकी ही एक खास अभिव्यक्ति है। यही हाल संघ का भी है। इनका राष्ट्रवाद कभी भी साम्राज्यवाद खासकर अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ नहीं रहा है। इनके राष्ट्रवाद के निशाने पर सदा से पड़ोसी देश व देश के भीतर के मुसलमान व ईसाई रहे हैं। इसीलिए हमें हिमंत विस्वा सरमा, योगी आदि के घोर साम्प्रदायिक बयान तो मुसलमानों के खिलाफ दिखाई देते हैं परन्तु अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ एक भी शब्द सुनने को नहीं मिलता है।
भारत के वास्तविक शासक बने अम्बानी, अडाणी, टाटा, बिड़ला, मित्तल जैसे एकाधिकारी घराने किसी भी कीमत पर अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ नहीं जा सकते। ये सभी पूंजी निवेश, वित्त व्यवस्था, व्यापार, तकनीक व मुनाफा की सुरक्षा आदि के लिए पश्चिमी साम्राज्यवाद खासकर अमेरिकी साम्राज्यवाद पर निर्भर हैं। ये भले ही भारत में बड़ी भूमिका में दिखते हों परन्तु बाकी दुनिया में ये छुटभैय्ये व अमेरिका के पिच्छलग्गू ही हैं। ये अमेरिका सहित दुनिया के अधिकांश हिस्से में कारोबार अमेरिकी साम्राज्यवादियों की मेहरबानी व छत्रछाया में ही कर सकते हैं। इनका सारा कारोबार अमेरिकी साम्राज्यवाद पर बुरी तरह से निर्भर है। उनकी मेहरबानी व सुरक्षा का मोहताज है। इसलिए इन एकाधिकारी घरानों की पाली-पोसी मोदी सरकार अमेरिकी व अन्य पश्चिमी साम्राज्यवादियों के सामने बौनी व मिमयाती नजर आती है। मोदी, जयशंकर, पीयूष गोयल की नपी-तुली भाषा अम्बानी-अडाणी के कक्ष से निकली व तयशुदा भाषा है।
ऐसे हालात में भारत के मजदूर, किसान, नौजवान क्या करें? क्या हमारे देश के मजदूरों-मेहनतकशों को फिर वही नहीं करना होगा जो उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्ति पाने की लड़़ाई के दौरान किया था। नयी गुलामी के खिलाफ नयी आजादी की लड़ाई। भारत को साम्राज्यवाद के चंगुल से मुक्त कराने की लड़ाई लड़नी होगी। इस लड़ाई को जीतने की पहली शर्त यह होगी कि भारत को पूंजीवाद के चंगुल से मुक्त कराया जाए। क्योंकि भारत में साम्राज्यवाद को लाने वाले और बनाये रखने वाले भारत के पूंजीपति खासकर एकाधिकारी घराने हैं। ये ही भारत में हिन्दू फासीवाद के प्रस्तोता व संरक्षक भी हैं। इस तरह से आज भारत के तीन प्रमुख दुश्मन पूंजीवाद, साम्राज्यवाद व हिन्दू फासीवाद मजदूरों-मेहनतकशों के निशाने पर स्वाभाविक रूप से आने चाहिए।