ईरान पर मंडराते युद्ध के बादल

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
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ईरान के चारों ओर से अमरीकी फौजी घेरेबंदी हो गयी है। पश्चिम एशिया के देशों में अमरीकी फौजें पहले से ही तैनात हैं। अमरीकी नौसैनिक बेड़ों को तैनात किया जा रहा है। ओमान की खाड़ी, अदन की खाड़ी और लाल सागर से लेकर हिन्द महासागर के डियेगो गार्सिया तक में अत्याधुनिक हथियारों से लैस बेड़े ईरान पर हमला करने के मकसद से तैनात किये जा चुके हैं। इन बेड़ों में आधुनिक लड़ाकू जहाज, आणविक शक्ति से लैस मिसाइलें, टारपीडो, पनडुब्बियां और रक्षा प्रणालियां शामिल हैं। जार्डन में एफ-35 और एफ-16 सैकड़़ों की तादाद में तैनात हैं। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने धमकी दी है कि ईरान या तो समझौता करे, या अपने ऊपर हमले के लिए तैयार हो जाये। ट्रम्प ईरान से यूरेनियम संवर्धन को रोकने, मिसाइलों की मारक क्षमता को कम करने/समाप्त करने और क्षेत्रीय प्रतिरोध संगठनों- लेबनान के हिजबुल्ला, यमन के हौथी और इराक व सीरिया के प्रतिरोध संगठनों- की मदद से हाथ खींचने की मांग कर रहा है। ईरानी सत्ता ने बार-बार घोषित किया है कि वह दबाव या धमकियों से झुकने वाली नहीं है। यदि समझौता करना है तो बराबरी के आधार पर और इज्जत के साथ यह हो सकता है। 
    
यह अप्रत्यक्ष बातचीत ओमान की मध्यस्थता में हुई। यह सिर्फ यूरेनियम संवर्धन के मसले पर हुई। बाकी दो मुद्दों पर ईरान ने बातचीत से इंकार कर दिया। दूसरे चक्र की बातचीत जारी रखने पर दोनों पक्षों के बीच सहमति हुई।
    
इस बातचीत से पहले और बाद में अमरीका की धमकी लगातार जारी है। इस बातचीत के बाद अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान पर और कई प्रतिबंध लगा दिये हैं। फारस की खाड़ी में और ईरान के इर्द-गिर्द अमरीकी फौजी घेरेबंदी बढ़ती जा रही है। ईरान के उत्तर में तुर्कमेनिस्तान और आर्मेनिया में अमरीकी जंगी जहाजों को उतारा जा रहा है। 
    
समूचे पश्चिम एशिया में ईरान ही एकमात्र ऐसा देश है जो 1979 की इस्लामी क्रांति के समय से अमरीकी साम्राज्यवादियों और उनकी क्षेत्रीय चौकी इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत के विरुद्ध दृढ़ता से खड़ा रहा है। बाकी के अरब देश अमरीकी साम्राज्यवादियों की छत्रछाया में रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी ईरान की सत्ता को पलटना चाहते हैं और मौजूदा सत्ता को हटाकर अपनी समर्थक सत्ता लाना चाहते हैं। ईरान की मौजूदा हुकूमत इजरायली शासकों के फिलिस्तीन को पूर्णतया निगल जाने और फिलिस्तीनियों के स्वतंत्र राज्य के बुनियादी हक को कुचलने की दृढ़ विरोधी रही है। इजरायली शासकों द्वारा गाजापट्टी में फिलिस्तीनियों पर किये गये नरसंहार की ईरान की सत्ता धुर विरोधी और वहां किये गये महाविनाश के विरुद्ध लड़ रहे फिलिस्तीनियों के प्रतिरोध समूहों का दृढ़ता से समर्थन करती है। वह लेबनान के हिजबुल्ला समूह का समर्थन करती है जो इजरायली कब्जे के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है। इसी प्रकार, वह यमन में अंसारउल्लाह का समर्थन व सहयोग करती है जिसे अमरीकी साम्राज्यवादियों के सहयोग से साउदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात खतम करना चाहते हैं। 
    
यही कारण है कि पश्चिम एशिया में अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली यहूदी नस्लवादी शासक ईरान की मौजूदा सत्ता को अपना दुश्मन समझते हैं। क्यांकि पश्चिम एशिया में उनके प्रभुत्व के लिए ईरान सबसे बड़ा अवरोध है। 
    
ईरान की इस्लामी सत्ता को गिराने के अमरीकी साम्राज्यवादियों के प्रयास निरंतर रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान पर कड़े प्रतिबंध लगा रखे हैं। वे बहुपक्षीय परमाणु समझौते से एकतरफा तौर पर अलग हो गये थे और पहले से चले आ रहे आर्थिक प्रतिबंधों को और ज्यादा विस्तारित कर दिया। ईरान इस क्षेत्र में तेल और गैस का बड़ा निर्यातक देश रहा है। उसके इन निर्यातों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। कोई न कोई बहाना बनाकर ईरान की हुकूमत को अस्थिर करने, उसके अंदर से विद्रोह कराने की कोशिश-साजिश अमरीकी साम्राज्यवादी लगातार करते रहे हैं। 
    
अभी जून, 2025 में जब ईरान के साथ अप्रत्यक्ष समझौता वार्ता अमरीकी साम्राज्यवादी कर रहे थे, तभी इजरायल से हमला करा दिया गया। उनके कई शीर्ष सैन्य अफसरों, वैज्ञानिकों के साथ-साथ सैकड़ों-हजारों निर्दोष नागरिकों की हत्यायें कर दी गयीं। इसी समझौता वार्ता के दौरान अमरीकी साम्राज्यवादियों ने बी-2 बाम्बर से ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने की कोशिश की। इजरायल के विरुद्ध ईरान ने पलटवार किया और यह युद्ध 12 दिन तक चला। जब ईरान ने कतर में अमरीकी फौजी अड्डे पर मिसाइलों से हमला किया, तब इजरायल और अमरीका युद्धविराम करने के लिए मजबूर हुए। 
    
ईरान की सत्ता को गिराने के लिए इसके बाद उसकी मुद्रा का अवमूल्यन किया गया। इससे जनअसंतोष भड़क उठा। लोग ईरानी सत्ता के विरुद्ध सड़कों पर उतर पड़े। इस जन-असंतोष को हिंसक बनाने में इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद और अमरीकी खुफिया एजेन्सी सी आई ए की भूमिका स्पष्ट तौर पर सामने आ चुकी है। इन हिंसक हमलों में न सिर्फ सरकारी कार्यालयों और पुलिस स्टेशनों को जलाया गया बल्कि साधारण नागरिकों को भी तलवारों से काटा गया। जब ये हिंसक हमले हो रहे थे, तब ट्रम्प ने उन्हें उकसाने वाले बयान दिये और कहा कि हमलावरों की मदद आ रही है। जब यह साजिश भी नहीं सफल हुई तब ट्रम्प ने कहा कि आंदोलनकारियों (मोसाद और सीआईए के एजेण्टों) को यदि फांसी दी गयी तो अमरीका ईरान पर हमला कर देगा; इस तरह की धमकी दी गयी। जब यह भी तरीका सफल नहीं हुआ तो ईरान की सैनिक घेराबंदी की गयी है और हमले की धमकी दी जा रही है। ट्रम्प बार-बार यह कह रहा है कि इस हमले से ईरान को वह तबाह-बर्बाद कर देगा। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक यह समझते हैं कि व्यापक पैमाने पर फौजी घेरेबंदी करने के बाद ईरानी शासक डरकर अमरीकी शर्तों को मान लेंगे। ईरानी शासकों ने अमरीकी धमकियों का जवाब यह कहकर दिया है कि यदि ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमला हुआ तो यह जल्द ही क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील हो जायेगा। समूचा पश्चिमी एशिया इसकी चपेट में आ जायेगा। ईरानी शासकों ने अरब देशों के शासकों को यह साफ कह दिया है कि जिस भी देश की जमीन, वायुक्षेत्र या पानी के जरिये अमरीकी साम्राज्यवादियों को हमला करने की छूट मिलेगी, वह देश भी ईरानी मिसाइलों का निशाना बनेगा और उसे दुश्मन देश के बतौर देखा जायेगा। ईरान की सत्ता ने अमरीकी साम्राज्यवादियों को भी चेतावनी दी है कि ईरान पर हमला होने की स्थिति में इस क्षेत्र में तमाम अमरीकी फौजी अड्डों को निशाना बनाया जायेगा। 12 दिनी युद्ध के दौरान इजरायल और अमरीका ने ईरान की मिसाइलों की मारक क्षमता को देख लिया है। तब से ईरान की मिसाइलों की क्षमता और बढ़ गयी है। उसकी सुपरसोनिक और हाइपरसोनिक मिसाइलों का भण्डार बढ़ गया है। उसकी ये मिसाइलें इजरायल के किसी भी शहर तक मार कर सकती हैं। उसकी कुछ हाइपरसोनिक मिसाइलें अमरीका के पूर्वी तट के शहरों तक मारने की क्षमता रखती हैं। 
    
अरब देशों को दी जाने वाली चेतावनियों के बाद कई अरब देशों के शासकों में भय व्याप्त हो गया है। यदि उन्होंने अमरीका को अपनी जमीन का इस्तेमाल ईरान पर हमले के लिए करने दिया तो खुद उनकी जनता उनके विरुद्ध विद्रोह भी कर सकती है। यह डर अरब शासकों में व्याप्त हो गया। वे ट्रम्प से अपील करने लगे कि ईरान के साथ बातचीत करके मसले को सुलझाने का प्रयास करें। अरब शासकों के पड़ने वाले दबाव और धमकियों और फौजी घेरेबंदी का ईरान पर वांछित प्रभाव न पड़ता देखकर ट्रम्प भी समझौता वार्ता की पहल लेने के लिए मजबूर हुआ। यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें मौजूदा वार्ता शुरू हुई। ईरानी शासक अविश्वास और संदेह के साथ इस वार्ता में शामिल हुए। अगली वार्ता अभी होनी है। लेकिन वार्ता के साथ ही वे युद्ध के लिए तैयार हैं। यदि युद्ध हुआ तो वे इसे क्षेत्रीय युद्ध में तब्दील करेंगे। यह महज ईरान की सीमाओं तक नहीं रहेगा। 
    
यहां पर रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों की भूमिका की चर्चा करना जरूरी है। रूसी साम्राज्यवादियों के साथ ईरान के घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। पश्चिम एशिया में ईरान के साथ इनके फौजी सम्बन्ध भी हैं। ईरान ने रूस को यूक्रेन युद्ध में ड्रोनों की आपूर्ति की है। रूस ने इस समय ईरान को एस-400 वायु रक्षा प्रणाली दी है। रूसी जंगी जहाज ईरान को मिले हैं। कूटनीतिक तौर पर रूस सभी विश्व मंचों पर अमरीकी साम्राज्यवाद की आक्रामक ईरान नीति का विरोध करता रहा है। जिस प्रकार, रूस वेनेजुएला में राष्ट्रपति के अपहरण के मामले में अमरीकी साम्राज्यवाद का विरोध शब्दों तक करने तक सीमित रखे हुए था, उस तरह यह ईरान के मसले में सीमित नहीं रह सकता। वह सक्रिय तौर पर ईरान के साथ खड़ा होगा। क्योंकि पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में रूसी साम्राज्यवादी अपनी पैठ को मजबूत करने में लगे हुए हैं। सीरिया में बशर अल असद की सरकार के पतन के बाद हुई कमजोर स्थिति को वे फिर से मजबूत करने में लगे हुए हैं। वे ईरान के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास से लेकर हथियारों की आपूर्ति कर रहे हैं। यह सही है कि रूस इस समय यूक्रेन में निर्णायक जीत की ओर अग्रसर है और वहां पर उसका अपना ध्यान केन्द्रित है। लेकिन ईरान जैसे पड़ोसी और मजबूत संश्रयकारी की उसे भी जरूरत है। 
    
जहां तक चीनी साम्राज्यवादियों का प्रश्न है, उनका ईरान में तथा समूचे पश्चिम एशिया में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। ईरान के अधिकांश तेल का खरीदार चीन है। यदि ईरान की सत्ता गिरती है तो चीन के तेल आयात का एक प्रमुख स्रोत खतरे में पड़ जायेगा। इसी प्रकार ईरान चीन की बेल्ट और रोड पहल का इस क्षेत्र में प्रमुख भागीदार है। चीन ईरान के साथ सीधे रेल मार्ग से जुड़ गया है। चीन ने ईरान को अलग-अलग किस्म के आधुनिक निगरानी प्रणाली के साधन मुहैय्या कराये हैं। चीन के जंगी जहाज भी ईरान के आस-पास मौजूद हैं। अभी हाल ही में रूस, चीन और ईरान की नौसेनाओं ने संयुक्त सैन्याभ्यास किया है। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादियों को ईरान पर हमला करते समय इस गठबंधन की ताकत को भी ध्यान में रखना होगा। 
    
यदि अमरीकी साम्राज्यवादी ईरान पर हमला करते हैं और ईरान होरमुज के जलडमरूमध्य को बंद कर देता है तो एशिया और यूरोप में तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हो जायेगी। होरमुज के जलडमरूमध्य से दुनिया भर के तेल और गैस के निर्यात का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। यदि यह बंद हो गया तो तेल और गैस का संकट पैदा हो जायेगा। जापान, कोरिया, चीन और दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण एशिया के देशों को तेल और गैस की आपूर्ति कहीं और से करनी होगी। अरब देशों के तेल और गैस का निर्यात बाधित हो जायेगा। इससे जापान और कोरिया के उद्योगों के लिए तेल महंगा मिलेगा, देर से मिलेगा। उत्पादन बाधित होगा। विश्व आपूर्ति श्रंखला पर इसका असर पड़ेगा। इसलिए अमरीकी साम्राज्यवादियों का यह कहना कि पश्चिम एशिया में तेल निर्यात संकट से उन पर कोई असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि वे तेल व गैस के मामले में आत्मनिर्भर हैं, पूर्णतया गलत बात है। क्योंकि उनके यहां जापान, कोरिया या अन्य देशों से जो औद्योगिक माल जायेगा उसमें बाधा पड़ेगी। इसका असर समूचे विश्व पर पड़ेगा। 
    
यहां पर अरब देशों की भूमिका पर भी चर्चा करना समीचीन होगा। जहां यह सही है कि अरब देशों के शासक अमरीकी साम्राज्यवादियों के प्रभाव में हैं। वहीं, एक तरफ वे अरब देश हैं जो अब्राहम समझौते से बंधे हुए हैं। ये देश इजरायली सत्ता के ज्यादा नजदीक हैं। इनमें संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन हैं। जो देश अब्राहम समझौते के हस्ताक्षरकर्ता नहीं हैं, वो अमरीकी साम्राज्यवाद के प्रभाव में रहते हुए भी इजरायल के साथ घनिष्ठता से नहीं जुड़े हैं। इनमें भी इस क्षेत्र का सबसे बड़ा देश साउदी अरब है। साउदी अरब का संयुक्त अरब अमीरात के साथ टकराव है। अभी यमन में संयुक्त अरब अमीरात समर्थक दक्षिणी संक्रमणकालीन परिषद को दक्षिण यमन से हटाने के लिए साउदी अरब ने हवाई हमले किये थे। इन दोनों देशों का टकराव बहरीन को लेकर भी है और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में प्रभाव को लेकर है। इन टकरावों के चलते ये एक अवस्थिति नहीं अपना सकते। जहां संयुक्त अरब अमीरात इजरायल के सहयोग से बंदरगाहों पर नियंत्रण के लिए पूंजी निवेश कर रहा है और अफ्रीका में सोना, तांबा की खदानों में निवेश कर रहा है तथा वहां पर भाड़े के सैनिकों के जरिये सत्ता संघर्ष में कई विरोधी गुटों की मदद कर रहा है। संयुक्त अरब अमीरात इजरायल के साथ जुड़कर सोमालिया से अलग हुए सोमालीलैण्ड में मदद पहुंचा रहा है। वहीं साउदी अरब सोमालिया की सरकार के साथ खड़ा है। 
    
यहां संदर्भ यह है कि संयुक्त अरब अमीरात के शासक इजरायल के ज्यादा करीब हैं जबकि साउदी अरब के शासक अपेक्षाकृत कम करीब। यहां यह भी ध्यान में रखना उचित होगा कि चीन ने साउदी अरब और ईरान के शासकों के साथ सम्बन्ध सामान्य बनाने की प्रक्रिया शुरू कराने में भूमिका निभायी थी। इस अर्थ में, साउदी अरब और ईरान क्षेत्रीय प्रतिद्वन्द्वी होते हुए भी एक-दूसरे के विरुद्ध जाने में हिचकेंगे।  
    
इस तरह पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बना हुआ है। यह खतरा ईरान के लिए प्रत्यक्ष है और यह दूर की बात नहीं है। इस अमरीकी आक्रमणकारी युद्ध के क्षेत्रीय और वैश्विक आयाम हैं। क्षेत्रीय ताकतों के अपने-अपने आपसी अंतरविरोध हैं। वैश्विक आयाम में अमरीकी साम्राज्यवादियों का रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों के साथ अंतरविरोध हैं, प्रभाव क्षेत्रों की लड़ाई है। ये अंतरविरोध प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष युद्ध में तब्दील होंगे या नहीं, यह आने वाले टकरावों से तय होगा। 
    
लेकिन इस बात की ज्यादा संभावना है कि ईरान पर हमले के बाद अमरीकी साम्राज्यवादियों का इस क्षेत्र में प्रभाव पहले जैसा मजबूत नहीं रहेगा। चूंकि यह दो गैर बराबर ताकतों के बीच युद्ध होगा। ईरान को भीषण तबाही-बर्बादी का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन इस युद्ध के बाद अमरीकी साम्राज्यवादी और कमजोर पड़़ेंगे। जहां तक इजरायल का प्रश्न है इसके बृहत्तर इजरायल की योजना का असफल होना लाजिमी है। 
    
देर-सबेर जनता के संघर्षों से स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य बनेगा जो इस क्षेत्र की समस्याओं व टकरावों का केन्द्र बिन्दु है।

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