एपस्टिन फाइल
एपस्टिन फाइलें अब अमेरिकी न्याय विभाग से निकलकर पूरी दुनिया में फैल चुकी हैं। इन फाइलों में छिपे नेताओं-दौलतमंदों-अधिकारियों-धर्म के ठेकेदारों यानी कुल मिलाकर समूचे पूंजीवादी शासक वर्ग के काले कारनामों से सारी दुनिया परिचित हो रही है। दुनिया जान रही है कि कैसे शासक वर्ग अपनी अय्याशी के लिए अमानवीयता की हद तक पतित हो चुका है। कि आज हमारे शासक मासूम बच्चियों से न केवल यौन सम्बन्ध बना रहे हैं, उनका व्यापार कर रहे हैं बल्कि जवान बने रहने की चाहत में इनका मांस खाने से भी परहेज नहीं कर रहे हैं। यानी अय्याशी व पतन के मामले में वो इस हद तक गिर चुके हैं कि सामान्य इंसानी गुणों से भी उनका दूर-दूर तक नाता नहीं रह गया है।
एपस्टिन फाईलों में अमेरिकी सरगना ट्रम्प, क्लिंटन से लेकर ब्रिटिश राजकुमार, बौद्ध मठाधीशों-पादरियों-शीर्ष वैज्ञानिक सभी मौजूद हैं। भारत में मोदी, मंत्री हरदीप पुरी, मीरा नायर, अनिल अंबानी, निर्देशक अनुराग कश्यप, वैलनेस गुरू दीपक चोपड़ा के नाम इनमें मौजूद हैं।
ये फाइलें खुलने के बाद पूंजीवादी बुद्धिजीवी इसे कुछ शासकों के पतित होने, घिनौने अपराध में लिप्त होने के बतौर पेश कर रहे हैं। तो कुछ इन फाइलों को एपस्टिन द्वारा षड्यंत्र कर दुनिया भर के शीर्ष लोगों को ब्लैकमेल करने का औजार बता रहे हैं। कुछ लोग एपस्टिन को धूर्त राक्षस बता बाकी लोगों को अपने कुकर्मों में शामिल कराने का दोषी ठहरा रहे हैं। ये सभी इस सच्चाई पर पर्दा डालने का काम कर रहे हैं कि एपस्टिन कारनामे पूंजीवादी शासकों का आम चेहरा हैं। ये अपवाद नहीं हैं। इसीलिए एपस्टिन सरीखे राक्षस केवल अमेरिका ही नहीं पूरी दुनिया में हर देश में अपनी सडांध फैला रहे हैं और अधिकाधिक देशों का शासक वर्ग इस सडांध में डूबा हुआ है। पूंजीवादी व्यवस्था जो काफी समय से प्रतिक्रियावाद और पतनशीलता की राह पर बढ़ चुकी है, उसके शीर्ष पर काबिज शासकों की नैतिकतायें कब की गायब हो चुकी हैं- उनकी इंसानियत कब की मर चुकी है। ऐसे में वे अपनी लूट-अत्याचार से ही नहीं अपनी अय्याशी से भी सडांध ही पैदा कर सकते हैं। साथ ही उनकी लूट-अय्याशी की कीमत दुनिया भर के मजदूर-मेहनतकशों के साथ उनकी मासूम औलादों को भी भुगतनी पड़ रही है।
पूंजीवाद के बीते 500 वर्षों में शासक वर्ग की पतनशीलता व नैतिकता विहीनता की स्थिति लगातार बढ़ती चली गयी है। पहले शासक अपनी बीवियां बदलते थे, जानवरों से यौन सम्बन्ध कायम करते थे आज वे और पतित हो मासूम बच्चिं से यौन सम्बन्ध बनाने व उनके मांस भक्षण तक पहुंच गये हैं।
पूंजीवाद केवल उपभोग की वस्तुओं को ही माल बनाकर खरीद-बेच की चीज नहीं बनाता बल्कि वो हर इंसानी संबंधों व मानवीय सारतत्व को भी माल बना देता है। वह स्त्री शरीर को भी उपभोग वस्तु बना डालता है और उसकी खरीद-बेच-तस्करी शुरू कर देता है। इससे आगे बढ़कर वह इनके मांस को भी परोसने पर उतारू हो सारी नैतिकता को तार-तार कर देता है। कहने की बात नहीं है कि मानवीय सारतत्व से च्युत सडांध में पहले खुद शासक वर्ग गोते लगाता है और फिर बाकी समाज को भी उसी दिशा में ले जाता है।
एपस्टिन सरीखे कारनामे अंजाम देते हुए शासक वर्ग बाकी समाज को नैतिकता का पाठ पढ़ाता है। गरीब मुल्कों में ऐसे तमाम अड्डे जब तब उजागर होते रहते हैं जहां किसी मठ में, किसी चर्च में, किसी फैक्टरी-कारखाने में इसी तरह की शासकों की ऐशगाहें चलती रहती हैं। इनके खुलासों से ज्यादा संख्या में ये छिपे ढंग से चल रहे होते हैं। देश के कस्बों-देहातों से गायब होते इंसानी बच्चे यहां पहुंच जाते हैं।
गायब होते बच्चों की लाखों-करोड़ों की तादाद भी यही बताती है कि शासक वर्ग की पतनशीलता आम है अपवाद नहीं। कि वह हर देश-हर कोने में मौजूद है।
एपस्टिन कारनामों के खुलासों ने बस यही किया है कि पर्दे के पीछे छिपी शासकों की सड़ांध को एक झटके में दुनिया के सामने ला दिया है। अब अपनी सडांध को ढंकने के लिए शासक बुद्धिजीवी इसे अपवाद ठहराने में जुटे हैं। जरूरत है कि इस बात को उजागर किया जाये कि पतनशीलता की सड़ांध आज सारी दुनिया में फैली है। कि एपस्टिन सरीखे सैकड़ों दैत्य दुनिया भर में न केवल फल-फूल रहे हैं बल्कि हर धंधे-व्यवसाय के शीर्ष पर विराजमान हैं। एपस्टिन की तरह पूंजीवादी कानून उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पा रहा है। वैसे भी पूंजीवादी कानून व्यवस्था अपने आकाओं को गुनहगार नहीं ठहरा सकती।
पूंजीवादी व्यवस्था के रहते मजदूर-मेहनतकश अवाम ऐसी सड़ांध व उसमें गोते लगा रहे शासकों से मुक्त नहीं हो सकता। इससे मुक्ति के लिए जरूरी है कि पूंजीवादी व्यवस्था जो खुद सड़-गल रही है उसे समाप्त कर मजदूर वर्ग की समाजवादी व्यवस्था कायम की जाये। तभी मानवीय गरिमा को फिर से स्थापित किया जा सकेगा। जहां कोई किसी का शोषण नहीं करेगा।