जनतंत्र से जन को बाहर करने की साजिश

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कुछ साल पहले उदारवादी माने जाने वाले अखबार इंडियन एक्सप्रेस में दो स्वनाम धन्य बुद्धिजीवियों ने एक लेख लिखा था। जिसका आशय यह था कि भारत के आम लोगों को समय से पहले वोट देने का अधिकार मिल गया जो आज भारत की बहुत सारी समस्याओं के मूल में है। लेख में कहा तो नहीं गया था पर भाव यही था कि देर से ही सही, इस गलती को सुधारने की जरूरत है। 
    
इनका तर्क कुछ इस प्रकार था : यूरोप-अमेरिका के पूंजीवादी जनतंत्रों का विकास कुछ इस तरह हुआ था कि मतदान के अधिकार का विस्तार धीमे-धीमे हुआ। पहले थोड़े से धनवान और पढ़े-लिखे लोगां को ही मतदान का अधिकार था। वे ही इस योग्य थे कि अपने विवेक का इस्तेमाल कर ठीक से मतदान कर सकें। आम जन जाहिल थे और यदि मतदान का अधिकार मिल जाता तो वे जनतंत्र समेत पूरी व्यवस्था को खतरे में डाल देते। समय के साथ जैसे-जैसे आम जन की जाहिलियत कम होती गयी, उसे मतदान का अधिकार मिलता गया। इससे जनतंत्र का विस्तार तो हुआ पर वह खतरे में नहीं पड़ा। मतदान का अधिकार पाने तक आम जन (मजदूर और महिलायें, क्योंकि सबसे अंत में इन्हें ही मतदान का अधिकार मिला) जनतंत्र के योग्य हो चुके थे। इसके उलट भारत में आम जन को एक झटके से भारत के संविधान द्वारा मतदान का अधिकार दे दिया गया- 26 जनवरी, 1950 को। अनपढ़-जाहिल आम जन जनतंत्र के लायक नहीं थे पर वे अधिकार पा गये। परिणाम भारतीय जनतंत्र और समूची व्यवस्था के लिए अच्छा नहीं रहा। आम जन जाति-धर्म, क्षेत्र, भाषा, इत्यादि के हिसाब से चलते रहे और चालाक नेता व पार्टियां इनका इस्तेमाल करते रहे। आज भी यही हो रहा है। आज भी पूरे देश, समाज या यहां तक कि इन जाहिल आम जन के हित में जो नीतियां हैं उन्हें लागू करने के बदले सारा कुछ इनकी तात्कालिक जरूरतों के हिसाब से होता है। इसलिए आज भी यदि चीजों को ठीक करना है तो जाहिल आम जन के दबाव से भारतीय जनतंत्र को मुक्त करना चाहिए। और यह केवल जनतंत्र के अधिकार से वंचित कर ही हो सकता है। अंतिम वाक्य उनकी ओर से कहा नहीं गया पर समूची तर्क पद्धति का यह स्वाभाविक निष्कर्ष था। 
    
किसी को आश्चर्य हो सकता है कि इक्कीसवीं सदी में लोग खुलेआम यह कहने का साहस कर सकते हैं। पर थोड़ा ध्यान से देखने पर यह पता चल जाता है कि यह उतनी आश्चर्य की बात नहीं है। कि आज समाज में एक पूरी धारा है जो इस तरह की सोच रखती है और कुछ समाजों में, जिसमें भारत भी है, यह धारा प्रमुख होती जा रही है। 
    
आज कम ही लोगों को याद होगा कि पन्द्रह साल पहले जब केजरीवाल एण्ड कम्पनी ने अन्ना नामक जमूरे को आगे कर अपना भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा किया तो उसमें एक प्रमुख तर्क अनपढ़-जाहिल जनता का ही था। कहा गया कि जाहिल जनता जाति-धर्म या चन्द रुपयों की खातिर अपना वोट भ्रष्ट-पतित और अनपढ़ नेताओं को बेच देती है। ये भ्रष्ट-पतित नेता अपनी तिजोरियां भरते हैं और देश का बेड़ा गर्क कर देते हैं। वे जो नीतियां बनाते हैं वह देश के विकास के हित में होने के बदले जाहिल जनता को रेवड़ी बांटने वाली होती हैं। देश का भला तभी हो सकता है जब देश की कमान भ्रष्ट-पतित नेताओं और जाहिल जनता के हाथों से छीनकर पढ़े-लिखे काबिल लोगों के हाथों में दे दी जाये। 
    
उस आंदोलन में संघ परिवार ने पर्दे के पीछे से बढ़-चढ़कर भागेदारी की थी। आंदोलन का मध्यमवर्गीय आधार मूलतः उपरोक्त सोच का था। वो केन्द्र सरकार में मोदी और प्रदेश सरकार में केजरीवाल की नीति पर चलता था। 
    
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपनी सोच में ही जनतंत्र विरोधी रहा है। यह जनतांत्रिक अधिकारों तथा आम जन के जनतंत्र में शामिल होने के खिलाफ रहा है। भारतीय संविधान बनने के समय संघ ने अपने मुखपत्र के जरिये खुलेआम कहा था कि इस संविधान में भारतीयता नहीं है तथा भारतीय संविधान को मनुस्मृति पर आधारित होना चाहिए। मनुस्मृति वर्ण व्यवस्था को सारी सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था का आधार बनाती है। वर्ण व्यवस्था जड़ श्रेणीक्रम की व्यवस्था है जो श्रेणियों के हिसाब से व्यक्तियों के अधिकार और कर्तव्य तय करती है। यह अपनी मूल प्रकृति में ही जनवाद विरोधी है तथा शूद्रों, अंत्यजों और स्त्रियों को लगभग सारे अधिकारों से वंचित करती है। आज भी संघ खुलेआम वर्ण व्यवस्था में अपना विश्वास व्यक्त करता है।
    
संघ के ज्यादातर कारकून और पक्के समर्थक सवर्ण पृष्ठभूमि के होते हैं जो दिल ही दिल में दलितों-पिछड़ों और खासकर मुसलमानों को हिकारत की नजर से देखते हैं। वे स्त्रियों को भी दोयम दर्जे में रखते हैं। वे जब आम जन की जाहिली की बात करते हैं तो उनकी नजर में ये ही लोग होते हैं। वे इन्हें अपने हितों के लिए तथा अपने देश के हितों के लिए समस्या मानते हैं। उनकी दिली इच्छा होती है कि उन्हें देश का भविष्य तय करने के अधिकार से वंचित कर दिया जाये। मुसलमानों के मामले में तो कभी गोलवलकर ने खुलेआम यही बात कही थी। 
    
पिछले सालों में इस सोच को लागू करने की भांति-भांति के तरीकों से कोशिशें हुई हैं। संघ परिवार के भारतीय राजनीति में हावी होने के बाद मुसलमान व्यवहारतः दूसरे दर्जे के नागरिक की श्रेणी में डाल दिये गये हैं। राजनीति में वे अदृश्य हो गये हैं। इतना ही नहीं, केन्द्र और प्रदेश दोनों स्तर पर कई कानून इन्हें निशाना बनाने के लिए ही बनाये गये हैं। नागरिकता संशोधन, गौ-रक्षा तथा धर्म परिवर्तन, इत्यादि सारे कानूनों का निशाना मुसलमान ही हैं। ये कानून मुसलमानों को प्रताड़ित या बहिष्कृत करते हैं। 
    
लेकिन निशाना केवल मुसलमान नहीं हैं। अन्य गरीब, शोषित-उत्पीड़ित भी निशाना हैं। कई प्रदेशों में स्थानीय निकाय के चुनावों में उम्मीदवार बनने के लिए शैक्षणिक योग्यता का प्रावधान कर दिया गया है। इसके अलावा दो बच्चों की सीमा बांध दी गयी है। यह स्पष्ट तौर पर गरीब लोगों तथा दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और स्त्रियों को उम्मीदवारी से बेदखल करने की कोशिश है। मजे की बात यह है कि ये प्रावधान सांसद या विधायक के चुनावों पर लागू नहीं होते। यहां वर्गीय दृष्टि स्पष्ट है। 
    
बिहार में इस समय मतदाता सूची में संशोधन के नाम पर जो कुछ हो रहा है, वह इसी का विस्तार है। वह जनतंत्र विरोधी सोच को व्यापक पैमाने पर लागू करने का प्रयास है जिससे आम जन को जनतंत्र से बाहर किया जा सके।
    
संकीर्ण अर्थ में ऐसा लग सकता है कि बिहार में चुनाव आयोग ने आनन-फानन में मतदाता सूची में व्यापक संशोधन का जो अभियान छेड़ा उसका निशाना मुसलमान हैं, खासकर बंगाल के सीमावर्ती जिलों के मुसलमान। उन्हें मतदाता सूची से बाहर करने के लिए यह भारी-भरकम कवायद शुरू की गयी। 
    
इस संबंध में पहली बात तो यही कि यदि ऐसा हो भी तो यह जनतंत्र का पूर्ण नकार है। प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी तरह से किसी भी समूह को मतदान से वंचित करना जनतंत्र की मूल भावना का नकार है। यह अपनी बारी में दूसरे अन्य असुविधाजननक समूहों को मतदान से वंचित करने की ओर ले जायेगा। 
    
दूसरे, यह वास्तव में बिहार में हो रहा है। जो नियम-शर्तें बनाई गयी हैं वे मुसलमानों के अलावा भारी मात्रा में हिन्दुओं को भी मतदाता सूची से बाहर कर देंगी। असल में बाहर होने वालों में बहुसंख्या हिन्दुओं की ही होगी। यह ऐसे ही होगा जैसा आसाम में अवैध प्रवासियों के मामले में हुआ था जब अवैध होने वालों में तीन चौथाई हिन्दू थे। 
    
जब चुनाव आयोग ने (अथवा मोदी-शाह ने) यह फैसला लिया तो ऐसा नहीं था कि उन्हें पता नहीं था कि इसका क्या दुष्परिणाम निकलेगा। कम से कम आसाम का ठोस उदाहरण उनके सामने था। इसके बावजूद वे इस ओर गये। इसका मतलब उनके लिए स्पष्ट था कि वे क्या कर रहे हैं। 
    
ठोस राजनीतिक तौर पर देखें तो बिहार में इस तुगलकी फरमान से जो लोग मतदान से वंचित होंगे उनमें से ज्यादातर विपक्षी गठबंधन के संभावित मतदाता होंगे। योजना शायद यह भी हो कि सरकारी गठबंधन के संभावित मतदाताओं को धांधली से मतदाता सूची में शामिल कर लिया जाये भले ही उनके पास जरूरी दस्तावेज न हों। यह मतदाता सूची में उसी तरह का हेर-फेर होगा जिसका आरोप विपक्षी महाराष्ट्र में होने का आरोप लगा रहे हैं। बस इस बार चुपके-चुपके नहीं बल्कि डंके की चोट पर हो रहा होगा। 
    
लेकिन ठोस राजनीति से इतर इसका वह पहलू है जिसकी पहले चर्चा की गयी है। यानी आम जनता को येन-केन प्रकारेण जनतंत्र से बाहर कर दिया जाये। उसे मतदान से वंचित कर दिया जाये। इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि बाहर होने वालों में अच्छी-खासी तादात स्वयं संघ समर्थकों की हो। 
    
फासीवादी हमेशा से आम जनता को भेड़-बकरी समझते रहे हैं। वे महामानव और भीड़ में विश्वास करते रहे हैं। मुसोलिनी और हिटलर दोनों ने बाकायदा ऐसे तरीके विकसित किये जिससे आम जन को नागरिकता बोध से वंचित कर भीड़ में रूपान्तरित किया जा सके। एक बार भीड़ में रूपान्तरित हो जाने के बाद आम जन को आसानी से अपने औजार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। इटली के फासीवादी निजाम में तथा जर्मनी के नाजीवादी निजाम में जनतंत्र को वास्तव में समाप्त कर दिया गया। 
    
जिस हद तक संघ परिवार फासीवादी है, उस हद तक उसका भी वही लक्ष्य है। स्वयं संघ के भीतर चुनाव की कोई व्यवस्था नहीं है। वहां एक नेता के पीछे सबको चलना है, यह आप्त वाक्य है। वर्ण व्यवस्था और इस फासीवादी सोच से लैस संघ परिवार के लिए नागरिकता बोध और जनतंत्र वास्तव में न केवल असुविधाजनक है बल्कि उनके रास्ते का रोड़ा है। उनका फासीवादी हिन्दू राष्ट्र तभी कायम हो सकता है, जब उन्हें किनारे लगा दिया जाये। 
    
वैसे यह प्रवृत्ति आज केवल संघ परिवार तक सीमित नहीं है। जैसा कि पहले कहा गया है, केजरीवाल एण्ड कंपनी तथा उनके समर्थक भी इसी प्रवृत्ति के हैं। शुरू में जिन दो बुद्धिजीवियों का जिक्र किया गया था वे भी इसी प्रवृत्ति के हैं। आज जब बुर्जुआ दायरे में बार-बार ‘रेवड़ी संस्कृति’ की बात होती है तो उसका भी सारतत्व यही होता है। भूखी-नंगी जनता वाले जनतंत्र में पूंजीवादी पार्टियों द्वारा रेवड़ी बांटना उनकी मजबूरी है। उसके बिना वे मतदाताओं को नहीं लुभा सकते। आखिर वे भूखे-नंगे लोगों से यह तो नहीं कह सकते कि हमें वोट दो जिससे हम अंबानी-अडाणी, टाटा-बिड़ला पर सरकारी खजाना लुटा सकें। इस ‘रेवड़ी संस्कृति’ से बचने का एक ही तरीका है- उन्हें स्वयं जनतंत्र से बाहर कर देना। यह उन्हें मतदान से वंचित कर ही किया जा सकता है, तरीका चाहे जो अपनाया जाये। 
    
यह याद रखना होगा कि अपने पूंजीवादी जनतंत्र में पूंजीपति वर्ग ने आम जन को बहुत मजबूरी में दाखिल होने दिया था। उसने हर कदम पर प्रतिरोध किया था। केवल आम जन के तीखे संघर्षों के दबाव में ही वह क्रमशः पीछे हटा था। पीछे हट कर भी वह हमेशा असुविधा महसूस करता रहा। जनतंत्र में आम जनों के प्रवेश के बाद उनसे निपटने के लिए कभी फासीवाद की शरण लेता रहा तो कभी जनतंत्र को एकदम खोखला, औपचारिक बनाता रहा। अब फासीवादियों के एक बार फिर उभार के दौर में वह आम जन को भांति-भांति से जनतंत्र से बाहर करने की कोशिश कर रहा है। 
    
कहने की बात नहीं कि पूंजीपति वर्ग को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ेगी।   
    

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