सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कृष्ण और सुदामा की आड़ लेते भ्रष्टाचारी

चुनावी चंदे में पारदर्शिता लाने के नाम पर लाये गये इलेक्टोरल बांड खुद ही भ्रष्टाचार का माध्यम बन गये। ये भ्रष्टाचार इतना बढ़ता गया कि इस चंदे का 90 प्रतिशत तक सत्ताधारी पार्टी के पास जाने लगा। इलेक्टोरल बांड भारतीय स्टेट बैंक जारी करता है। कोई भी व्यक्ति इलेक्टोरल बांड खरीद सकता है और जिस पार्टी को वह पसंद करता है उसे वह बांड दे सकता है। किस व्यक्ति ने किस पार्टी को कितना चंदा (इलेक्टोरल बांड) दिया है इसे जानने का हक किसी को नहीं है। यह सूचना के अधिकार कानून से भी बाहर है। इसीलिए सत्ताधारी पार्टी भाजपा को सबसे अधिक चंदा प्राप्त हुआ है। यह चंदा क्यों और किसने दिया और इसके बदले में उसने सरकार से क्या-क्या रियायत हासिल की, उसे कितना फायदा हुआ। यह सांठगांठ कितनी गहरी है और इससे मजदूरों-किसानों और अन्य मेहनतकशों का कितना नुकसान हुआ है। सूचना के अधिकार कानून से बाहर रखने के कारण देश की जनता को नहीं पता चल पाता है। 
    

अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रोरल बांड को रद्द कर दिया है और भारतीय स्टेट बैंक को निर्देश दिया है कि इलेक्टोरल बांड के माध्यम से किसके द्वारा किसे कितना चंदा दिया गया उसे चुनाव आयोग को उपलब्ध कराना होगा और चुनाव आयोग उसे सार्वजनिक करेगा। जिसकी जानकारी कोई भी हासिल कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से जहां इस गुप्त चंदे को जानने की उम्मीद देश की जनता कर रही है तो वहीं पर मोदी सरकार के और खुद मोदी के चेहरे से रौनक गायब हो गयी है। प्रधानमंत्री मोदी अब अपने बचाव में धर्म और लोगों की आस्था को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। अपने चुनावी भाषण में सहानुभूति हासिल करने के लिए सुदामा द्वारा कृष्ण को चावल की पोटली देने का जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि अगर आज का समय होता तो उसे भी लोग भ्रष्टाचार की श्रेणी में ला देते। मोदी द्वारा खुद की कृष्ण से तुलना और सुदामा की करोड़ों रुपये का चंदा देने वाले पूंजीपतियों से तुलना कहीं से भी मेल नहीं खाती। वह यह नहीं बताते कि करोड़ों रुपये का चंदा देने वाले का नाम क्यों छुपाया जाए कि इससे मजदूरों-मेहनतकशों एवं देश का क्या फायदा होगा। और क्यों न गुप्त करोड़ों रुपये का चंदा लेने के बजाय उनके ऊपर टैक्स को बढ़ाकर मजदूरों-मेहनतकशों को राहत प्रदान की जाए। जीएसटी का कलेक्शन 64.3 प्रतिशत निचले पायदान पर खड़ी 50 प्रतिशत आबादी क्यों वहन करती है और ऊपर की 10 प्रतिशत आबादी मात्र 3.4 प्रतिशत ही क्यों देती है। नौकरी पेशा वाले लोग 30 प्रतिशत के कर दायरे में क्यों आते हैं और पूंजीपतियों पर कारपोरेट की 22 प्रतिशत की अधिकतम सीमा क्यों निर्धारित है। विशेष आर्थिक क्षेत्र में दस वर्षों तक टैक्स छूट क्यों दी जाती है और देश का गरीब से गरीब आदमी भी अप्रत्यक्ष कर क्यों देता है। इस पर बात करने के बजाय मोदी सिर्फ वाकपटुता और लफ्फाजी करते हैं तथा धर्म और लोगों की आस्था की आड़ लेकर अपने भ्रष्टाचार को छुपाने का प्रयास कर रहे हैं।  -हरिगोविन्द बरेली

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