हल्द्वानी/ 24 फरवरी 2026 को सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जयमाला बाघची की पीठ ने बनभूलपुरा प्रकरण में अंतरिम आदेश दिया। इस अंतरिम आदेश में रेलवे और राज्य सरकार की जमीन को खाली करने की बात कही गयी। साथ ही 4,365 परिवारों के पुनर्वास के लिए प्रधानमंत्री आवास योजना और आर्थिक रूप से कमजोर (मू) श्रेणी के तहत सरकारी योजना लागू करने का आदेश दिया। इसके लिए 19 मार्च से 31 मार्च तक सर्वे कर पात्र लोगों को चिन्हित करने का आदेश दिया है।
लोगों की सबसे पहली प्रतिक्रिया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘‘न्याय नहीं किया, फैसला सुनाया है’’। फैसले में यह नहीं देखा गया कि यहां की बसावट ब्रिटिश काल तक जाती है। रेलवे ने कभी भी अपनी योजना पेश कर जमीन की मांग नहीं की। बल्कि 2007 में रेलवे स्टेशन के पास मलिन बस्ती हटाने और 2013 में गोला नदी के पुल टूटने की याचिका दायर हुई। रेलवे ने कभी भी विस्तार योजना के लिए जमीन नहीं मांगी, बल्कि आज भी रेलवे से विस्तार की कोई योजना नहीं मांगी जा रही है। हल्द्वानी से 5 किलोमीटर उत्तर में यहां का आखिरी रेलवे स्टेशन काठगोदाम है, अतः यहां से देश भर के लिए और रेलगाड़ियां चलाने की गुंजाइश या सवाल ही नहीं है।
न्यायालय ने यह भी नहीं देखा कि प्रभावित 4,365 परिवार की बसावट में दो सरकारी इंटर कॉलेज, प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, पेयजल टंकी आदि स्थापित हैं। यह दिखाता है कि उक्त जमीन राज्य सरकार की संपत्ति है। यहां बसे हजारों परिवारों को उजाड़ने के बजाय रेलवे के पास पूर्व दिशा में खाली पड़ी दसियों एकड़ जमीन को इस्तेमाल करने का आदेश दिया जा सकता था। या पास की ही खाली पड़ी वन भूमि अधिग्रहण कर रेलवे की जरूरत (यदि है तो) पूरी की जा सकती थी। यहां फैसला दो पक्षों के निजी जमीन विवाद की तरह लिया गया न कि हजारों जनता बनाम सरकार या रेलवे की तरह। फैसले में नागरिकों के अधिकार और सुरक्षा नदारद है।
लोग इसे देश में चल रहे मुसलमान अल्पसंख्यकों पर किये जा रहे हमलों पर न्यायालय की मोहर की तरह भी देखते हैं। गौरतलब है कि 2017 से उत्तराखंड में भाजपा की सरकार है। सरकार ने 2017 से 2022 तक उच्च न्यायालय में कभी भी यहां अपनी जमीन होने की पैरवी नहीं की। 2023 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर राज्य सरकार को उसकी जमीन के बारे में बताया गया। लेकिन तब भी राज्य सरकार ने अपनी जमीन का दावा करने और उसे नागरिकों को देने के बजाय कह दिया कि हमारी जमीन है, जिसे हम रेलवे को देना चाहते हैं। सरकार को वहां रह रहे हजारों लोग, उनकी रोजी-रोटी या भविष्य की कोई चिंता नहीं है। सरकार ने 2018 में राज्य की मलिन बस्तियों को उजाड़ने से बचाने के लिए एक अध्यादेश जारी किया था, जिसमें बनभूलपुरा की मलिन बस्तियां भी संरक्षित की गयी थीं। इस अध्यादेश को सरकार लगातार विस्तार दे रही है, लेकिन बनभूलपुरा को संरक्षित करने के बजाय इसे उजाड़े जाने की सरकार हिमायती है।
स्थानीय प्रशासन का रुख यह है कि जब-जब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की तारीख आती है तो पूरे इलाके को पुलिस छावनी बना दिया जाता है। यहां फ्लैग मार्च किया जाता है। बनभूलपुरा कोई बेवजह ‘‘संवेदनशील’’ क्षेत्र मानकर लोगों में डर-भय का माहौल बनाया जाता है। यहां तक कि मौजूदा समय में रमजान के महीने में भी इलाके में रात में दुकानें खोलने पर भी प्रशासन रोक लगा रहा है।
सरकार से लेकर प्रशासन तक के नकारात्मक रुख की इस कड़ी में ही 2022 के उच्च न्यायालय के फैसले और अब सर्वोच्च न्यायालय के अंतरिम फैसले को देखा जा रहा है जिसमें न्याय ही गायब है।
इसके अलावा पिछले समय में प्रदेश की धामी सरकार समय-समय पर मुसलमान अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेते हुए साम्प्रदायिक बयान देती रही है। यहां तक कि प्रशासन भी फासीवादी तरीके उपयोग में लाता रहा है। इस सरकारी संरक्षण में समय-समय पर बनभूलपुरा को निशाना बनाया जाता रहा है। हल्द्वानी के तमाम लम्पट ‘‘हिन्दू रक्षक’’ बन शहर में उत्पात मचाते हैं। मुस्लिम मजदूरों और दुकानदारों को निशाना बनाते हैं पर प्रशासन इस सबसे आंखें मूंदे रहता है।
इस हिन्दू फासीवादी माहौल में हल्द्वानी के अधिकांश हिस्सों में फैसले के प्रति उदासीनता है। कुछ लोग फैसले के बाद उजाड़े जाने पर लोगों का क्या होगा, इससे परेशान हैं। कुछ लोग साम्प्रदायिक प्रभाव में इस बात पर खुश भी हैं। वो मजदूर, मेहनतकशों के प्रति कोई हमदर्दी नहीं रखते हैं और जब उजड़ने वाले ज्यादातर मुसलमान हैं तो वे घृणा भी दिखाते हैं। इनमें भी कुछ लम्पट हिन्दूवादी लोग तो फैसले के तहत उजाड़े जाने की स्थिति में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने में लम्पटों की तरह इस्तेमाल होने को तत्पर बैठे हैं।
इन हालातों के बीच बनभूलपुरावासी 28 अप्रैल के फैसले (संभवतः अंतिम) से उम्मीद लगाए बैठे हैं। साथ ही धुंधली ही सही पर एक उम्मीद न्याय की भी है। न्याय के पक्ष में अगर सड़कों पर आवाज उठेगी ही न्यायालय से किसी सकारात्मक रुख की संभावना बन सकती है। अन्यथा तो न्यायपालिका पूंजीवादी न्याय कर चुकी है और बता चुकी है कि उसे उजड़ने वाले हजारों परिवारों से कोई सरोकार नहीं है। -हल्द्वानी संवाददाता