कामरेड जी एन साईंबाबा को श्रद्धांजलि

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सपनों की कलम  -मौमिता आलम

मत पूछो कभी कि कैसे होती है 
एक कामरेड की मौत?
एक पेड़ की तरह
पहले उसे उखाड़ा जाता है 
घर से
फिर
कैद करके रखा जाता है अंडा सेल में 
बगैर रौशनी और बारिश 
बादलों और हवा के,
राज्य मिटा देना चाहता है पेड़ को 
सुखा देना चाहता है पौधे को पूरा का पूरा
फिर राज्य
शनैः शनैः, थोड़ा थोड़ा, टुकड़े दर टुकड़े 
चिकित्सकीय रूप में बहुत बारीकी से 
लिखता है उसका मृत्यु प्रमाणपत्र।
बेशक वे कर सकते हैं हत्या 
एक पेड़ की
पर कैसे कर सकते हैं खत्म
पेड़ों की उन हजार जड़ों को
जो अंकुरित हुई हैं उनकी रोशनाई से 
उनकी व्हील चेयर के पहियों से?
कभी मत करो शोक
एक कामरेड की मौत का
अपने चारों ओर देखो
तुम्हें हमेशा नजर आएगा एक पेड़
लहराते हुए अपनी पत्तियां
बिगुल सा फूंकते हुए 
युद्ध जारी है!
और 
साईं बाबा कभी नहीं मरते!

आलेख

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अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

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जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

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ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा। 

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लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?