हमारे देश में एक दिन भी ऐसा नहीं बीतता है जब दलितों के खिलाफ कुछ हिंसा नहीं होती हो। शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता होगा, जिस दिन, किसी दलित की हत्या न होती हो। किसी दलित महिला के साथ बलात्कार न होता हो। साल दर साल दलितों के साथ हिंसा की घटनाओं में वृद्धि होती जा रही है। दलितों के साथ अत्याचार के मामले में उत्तर भारत के राज्य सबसे आगे हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान व मध्य प्रदेश में दलितों के साथ हिंसा व अत्याचार की सबसे अधिक घटनाएं दर्ज की जाती रही हैं। इस समय इन तीनों ही राज्यों में ‘हिन्दू-हिन्दू’ का ढोल पीटने वालों की सरकारें हैं। उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश में तो कई वर्षों से ये सत्ता में काबिज हैं।
दलितों के साथ होने वाले अत्याचारों की एक फेहरिस्त काफी लम्बी है। यह उतनी ही लम्बी है जितना लम्बा दलितों के खिलाफ अत्याचारों का अंतहीन सिलसिला है। हत्या, सामूहिक बलात्कार, बलात्कार, छेड़खानी, गालियां देना, मारपीट करना, रुपया-पैसा छीन लेना, मल खाने को मजबूर करना, पेशाब पिलाना या पेशाब करना, दलितों की बारात न निकलने देना व दूल्हे का अपमान करना, पूजा स्थलों में न जाने देना, सरकारी नलों से पीने का पानी नहीं लेने देना, किराये पर मकान का न मिलना, दलित रसोइयों या भोजनमाताओं के हाथ का खाना न खाना इत्यादि, इत्यादि।
इस अंतहीन फेहरिस्त में घट रही घटनाएं कहने को ऐसे भारत में घट रही हैं जिसे आजाद हुए कई दशक हो गये हैं। इक्कीसवीं सदी का भारत, देश के दलितों के लिए आज भी हिंसा व अत्याचार के मामले में सोलहवीं शताब्दी का बना हुआ है। भले ही भारत का कितना भी पूंजीवादी विकास हो गया हो परन्तु मूल्य-मान्यताओं, परम्पराओं, सामाजिक व्यवहार के मामले में मध्ययुगीन अवशेषों से चिपका हुआ है। भेदभाव, छुआछूत, जातिगत अपमान, अत्याचार, हिंसा से दलितों का पिण्ड छूटता ही नहीं है। हरियाणा में हाल ही में जातिगत उत्पीड़न से त्रस्त एक दलित आई पी एस अधिकारी की आत्महत्या ने दिखला दिया कि भारत की प्रशासनिक सेवा व पुलिस में भी किस गहरे तक जातिवादी कुण्ठाओं का असर है। और फिर जिस देश में राजनीति में प्रधानमंत्री से लेकर ग्राम प्रधान तक का फैसला जाति के गणित से हो रहा हो वहां नौकरशाही जातिवाद के अभिशाप से भला क्यों व कैसे मुक्त हो सकती है।
यही कारण है कि दलितों के साथ होने वाली हिंसा व अत्याचार के मामले, पुलिस थानों में आसानी से दर्ज ही नहीं होते हैं। जब किसी तरह से पुलिस केस भी हो जायें तो ढंग से उनकी जांच ही नहीं होती। और जब ढंग से जांच ही न हो, और जब स्वयं पुलिस जांच अधिकारी जातिगत कुण्ठा से ग्रसित हो तब अपराधियों को सजा मिलती ही नहीं है। पुलिस अथवा अदालत में जाने वाले पीड़ित दलित के साथ हिंसा व अत्याचार का नया सिलसिला शुरू हो जाता है। दलितों के ऊपर सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक दबाव बनाया जाता है कि वह अपना मामला वापस ले लें। ग्रामीण व मोहल्ले में सामाजिक सौहार्द के नाम पर दलित उत्पीड़न, अपमान व हिंसा की घटनाओं पर लीपापोती कर दी जाती है। कथित ऊंची जातियों का जो वर्चस्व सदियों से कायम है वह ऐसी हर घटनाओं के साथ-साथ फिर-फिर स्थापित और मजबूत हो जाता है। यदि अपराधियों को ठीक से कानूनन ही सही सजा मिले और समाज ऐसी हर घटनाओं के खिलाफ खड़ा हो जाये तो तब तो हो सकता है कि कथित ऊंची जातियों के हौंसले पस्त हों और वे अपनी जाति श्रेष्ठता की कुण्ठा को त्यागने को मजबूर हों तब ही हर दलित पूरी मानवीय गरिमा के साथ सामान्य जीवन जी सकता है।
ऐसा नहीं है कि भारत का समाज जहां सोलहवीं सदी में खड़ा था, वहीं खड़ा है। परन्तु इक्कीसवीं सदी के पहली चौथाई तक भी जाति का उन्मूलन न होना, यह बताने को पर्याप्त है कि हमारे यहां जाति व्यवस्था की जड़ें कितनी-कितनी गहरी हैं। हमारे शासक कितने प्रतिक्रियावादी हैं, कितने निकम्मे और धूर्त हैं। और भारत में जाति के पूर्ण रूप से उन्मूलन में अभी न जाने, कितना समय और लगेगा। और यह समय और अधिक इसलिए लगता है कि भारत के शासक वर्ग- पूंजीपति वर्ग- की यह मंशा ही नहीं है कि जाति व्यवस्था का उन्मूलन हो। धर्म, राजनीति के साथ स्वयं राज्य (राजसत्ता) जाति व्यवस्था का संरक्षक बना हुआ है।
और फिर हिन्दू धर्म की आत्मा जाति व्यवस्था में ही बसती है। और जो राजनीति व राजसत्ता आज हिन्दू धर्म के महिमामण्डन में लगी हुयी हो वह जाति व्यवस्था को तरह-तरह से वैधता व संरक्षण देती रहती है, देती रहेगी। अब भले ही देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सफाईकर्मियों के पैर धोयें या फिर अयोध्या में राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में कुछेक ‘दलित पण्डितों’ को भी अपने साथ बिठा दें।
जाति व्यवस्था हिन्दू धर्म की आत्मा है। और इसलिए यह संभव ही नहीं है कि हिन्दू धर्म के मौजूदा स्वरूप के रहते हुए जाति व्यवस्था की जकड़बंदी खत्म होवे। कौन नहीं जानता जिस राम का भाजपा महिमामण्डन करती है उन्हीं राम ने दलित शम्बूक की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी थी कि उन्होंने वेद पढ़ लिया था। भाजपा के राम तो गांधी के राम भी नहीं हैं। वहां (गांधी के यहां) राम-रहीम के साथ ही रहते हैं। और कबीर के राम तो निर्गुण हैं। कबीर के निर्गुण राम से तो भाजपा-संघ की राजनीति व कुटिल मंसूबे पूरे नहीं हो सकते हैं। इसलिए उन्हें ऐसा राम चाहिए जो क्रोधोन्मत हो। हर समय आंखें लाल किये हुए धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाये हुए हो। हर वक्त दुश्मन को खोजने और उनका नाश करने के अभियान में लगा हुआ हो। जाहिरा तौर पर ऐसे राम के अनुयायी इन हिन्दू फासीवादियों को हर शहर, हर मौहल्ले में ऐसे दुश्मन चाहिए जिन्हें ये आसानी से निशाने पर ले सकें। ऐसे दुश्मन कभी इन्हें मुसलमान तो कभी दलित तो कभी आदिवासी तो कभी स्त्रियां दिखायी देती हैं। इसलिए संघ-भाजपा के नेता-कार्यकर्ता भारत के उत्पीड़ितों को अलग-अलग ढंग से लांछित करते हैं। अपमानित करते हैं। यह अनायास नहीं है कि उत्तर प्रदेश, राजस्थान व मध्य प्रदेश में दलित उत्पीड़न की घटनाओं के साथ अक्सर ही भाजपा व संघ के लोगों का नाम जुड़ा होता है। हाल ही में उ.प्र. के रायबरेली में एक दलित की नृशंस हत्या करने वाले अपने आपको गर्व से ‘‘बाबावादी’’ (योगी आदित्यनाथ के अनुयायी) बताते हैं।
इन बातों का आशय क्या है? यह स्पष्ट है कि हिन्दू फासीवादियों के सत्ता में रहते हुए ये दलित उत्पीड़न की घटनाओं में कमी आ ही नहीं सकती है। वे सनातन संस्कृति, हिन्दू संस्कृति आदि की जितनी भी बातें करेंगे उसका स्वाभाविक परिणाम भारत के दलितों सहित सभी उत्पीड़ितों का और दमन ही निकलेगा। या फिर ये अपने द्वारा प्रायोजित साम्प्रदायिक दंगों में ‘हिन्दू धर्म के खतरे के नाम’ पर उन्हें एक औजार की तरह इस्तेमाल करेंगे। ऐसे मौकों पर कथित ऊंची जाति के खाते-पीते लोग सुरक्षित स्थलों पर रहेंगे। परन्तु दलितों, आदिवासियों को गरीब मुसलमानों या ईसाईयों के खिलाफ भड़का कर उनका अपने नियोजित-प्रायोजित साम्प्रदायिक घटनाओं व दंगों में इस्तेमाल जमीनी लड़ाईयों में करेंगे। गुजरात के मेहसाणा काण्ड (2002) का कत्लेआम हो या फिर हल्द्वानी के वनभूलपुरा (2024) में मुसलमानों पर हमले का मामला रहा हो यहां कुटिलतापूर्वक दलितों का इस्तेमाल किया गया।
दलितों के खिलाफ हिंसा-अत्याचार का सवाल हो या फिर जाति व्यवस्था के उन्मूलन का सवाल हो यह वर्तमान पूंजीवादी राजनैतिक-सामाजिक ढांचे के रहते हुए हल ही नहीं हो सकता है। इसलिए ऐसा कोई सामाजिक आंदोलन जो दलित मुक्ति की लड़ाई लड़ना चाहता हो तो उसे अवश्य ही वर्तमान व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की लड़ाई को सबसे आगे रखना होगा। बिना पूंजीवादी ढांचे के ध्वस्त हुए दलित मुक्ति संभव नहीं है। पूंजीवाद का विनाश और समाजवाद को कायम करने का लक्ष्य लेकर ही आज के समय में दलित उत्पीड़न व अत्याचार के खिलाफ कोई सार्थक लड़ाई लड़ी जा सकती है। यह एकदम स्पष्ट ही है कि ऐसे दलित मुक्ति आंदोलन से जो पूंजीवाद के विनाश का लक्ष्य लेकर चलता हो, उससे हर उस व्यक्ति को दिक्कत होगी जिनका स्वर्ग या तो पूंजीवाद में हो या फिर जो उसमें अपना स्वर्ग ढूंढने की कोशिश करता हो।