समय के साथ अब यह एकदम साफ होता जा रहा है कि कोई भी सरकार, कोई भी राजनैतिक दल या सामाजिक-राजनैतिक सरकारी या गैर सरकारी संस्था महिलाओं के मुद्दों के प्रति अनदेखी नहीं कर सकती है। उन्हें महिलाओं के मुद्दों, मांगां और आकांक्षाओं के संदर्भ में कुछ न कुछ कहना पड़ता है। और कुछ न कुछ करना पड़ता है। यह बात न केवल हमारे देश बल्कि दुनिया के हर देश के संदर्भ में कम या ज्यादा लागू होती है। ये अलग बात है ये बातें दिखावटी व सजावटी ही हैं।
महिलाओं के मुद्दों, मांगां, आकांक्षाओं की अनदेखी करना इसलिए अब संभव नहीं रहा है कि पिछली डेढ़-दो सदी में महिलाओं की जनवादी चेतना में तेजी से इजाफा हुआ है। मुखरता बढ़ती गयी है। और सबसे बड़ी बात यह है कि वह सामाजिक-सांस्कृतिक आधार प्रायः व क्रमशः कमजोर पड़ता गया है जो महिलाओं को दासता की जंजीरों में बांधता था। अब हर वर्ग, तबके की महिलाओं में आम तौर पर यह धारणा मजबूती से फैली हुयी है कि वे किसी भी मामले में मर्दों से कम नहीं हैं। और यह बात समाज में हर पेशे से महिलाओं की दमदार उपस्थिति से अक्सर ही साबित होती रहती है। पिछली डेढ़-दो सदी में महिलाओं ने जीवन के हर क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व को तोड़ा है। अल्पसंख्या में ही सही वे उन क्षेत्रों में भी हैं जिन्हें पुरुष खालिस तौर पर अपना ही क्षेत्र समझते थे।
भारी सामाजिक प्रगति के बावजूद अभी भी महिलाओं की दोयम दर्जे की स्थिति है। वे दोहरी-तिहरी दासता की जंजीरों में जकड़ी हुयी हैं तो इसका कारण उनके अपने प्रयासों अथवा मेहनत की कमी में नहीं हैं। महिलाओं को जहां भी, जितना भी अवसर मिला है उन्होंने साबित किया है कि वे किसी भी मामले में मर्दों से कमतर नहीं हैं। सवाल फिर यह उठता है कि वह क्या चीज है जो महिलाओं को समाज में वह जीवन जीने से रोकती है जिस पर हर इंसान का सहज, स्वाभाविक हक होना चाहिए।
इस सवाल की गहराई में उतरने पर हम पाते हैं कि एक तो समाज में हर महिला की स्थिति एक समान नहीं है। किसी के लिए समाज में वह सब कुछ हासिल करना एकदम आसान है जो कुछ पुरुषों को हासिल है। कई-कई महिलाओं के लिए गैर बराबरी कुछ खास बड़ा मुद्दा नहीं है। इनमें से कई तो कह सकती हैं कि उनके अपने जीवन में उन्होंने अपने घर-परिवार से लेकर अपने जीवन स्तर के अनुरूप सामाजिक जीवन में कोई भेदभाव, उत्पीड़न व दमन नहीं झेला। इन चंद महिलाओं के उलट हुयी सामाजिक हैसियत व स्तर की कुछ महिलाएं कह सकती हैं कि हां कुछ-कुछ उन्होंने अपने औरत होने के नाते झेला है। जाहिरा तौर पर ये महिलाएं वे हैं जो समाज के शीर्ष स्तर पर बैठी हैं। शासक वर्ग की हिस्सा हैं। पूंजीपति -भूस्वामी वर्ग की सदस्य हैं। यहां शहरी व ग्रामीण का कुछ फर्क हो सकता है। परन्तु कुल मिलाकर इस वर्ग की महिलाएं उन सवालों से रोज-ब-रोज नहीं जूझतीं जिससे हमारी दुनिया व हमारे देश में करोड़ों-करोड़ महिलाएं जूझती हैं। इसलिए इन अमीर घरों की महिलाएं आम तौर पर अपने घरों के पुरुषों जैसी ही हैं। सम्पत्ति से लेकर सामाजिक जीवन में करीब-करीब एकदम बराबर।
शासक या उच्च वर्ग की महिलाओं के इतर करोड़ों-करोड़ महिलाओं का जीवन और उनके व्यक्तिगत अनुभव व संघर्ष एकदम अलग ही हैं। यहां भी एक बड़ा फर्क उनके बीच है जो मध्यम वर्ग व मजदूर-मेहनतकश वर्ग से अलग-अलग संबंधित है। मध्यम वर्ग की स्त्रियों को भेदभाव, उत्पीड़न, अपमान तब अधिक झेलना पड़ता है जब वे आत्मनिर्भर नहीं होती हैं। धर्म, पारिवारिक प्रतिष्ठा व हैसियत, जाति व सम्प्रदाय बोध व भाषायी श्रेष्ठता या हीनता बोध उनके जीवन को अलग-अलग ढंग से संचालित करता है। धर्म, परिवार, जाति, सम्प्रदाय, सम्प्रदाय की मूल्य-मान्यताएं, रीति-रिवाज पूरी उम्र उनका पीछा करते हैं। एक सही व आदर्श नारी का बेताल उनके कंधे पर चढ़ा रहता है। बेताल का उनके कंधे से एक क्षण के लिए भी उतरना उनके लिए लांक्षन या आत्महीनता का कारण बन सकता है। ये बेबस औरतें अपने से ऊपर वालों से जलन व अपने से नीचे वालों के लिए घृणा व नफरत रखती हैं। इनका मध्यम वर्ग का होना इनके औरतपने पर हावी होता है। औरत होने का एहसास उस वक्त इन पर हावी होता है जब ये भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न का कम या ज्यादा सामना करती हैं। अन्यथा ये मध्यम वर्ग के जीवन का हर सम्भव भरपूर आनंद लेती हैं। आजादी, बराबरी, मुक्ति, न्याय जैसे शब्द इनके यहां व्यक्तिपरक महत्व रखते हैं न कि सामाजिक व राजनैतिक महत्व रखते हैं। इनके लिए वर्तमान सामाजिक-राजनैतिक-सांस्कृतिक ढांचे से बाहर सोचना व जाना न तो आसानी से सम्भव है और न अक्सर वह जाना चाहती हैं। एक अच्छा पिता, अच्छा भाई, अच्छा पति व अच्छा बेटा ही इनके जीवन की जरूरत, आशा व आकांक्षा है। जब यही नहीं मिलता तब इनके जीवन की विपदा व समस्यायें उठ खड़ी होती हैं।
जहां तक सवाल दुनिया या देश की करोड़ों-करोड़ मजदूर मेहनतकश स्त्रियों का है यहां जीवन नारकीय है। शोषण, उत्पीड़न, दमन, अत्याचार, अन्याय यहां विविध रूप रख के पल-पल सामने आते रहते हैं। जितना विपदा के मारे मजदूर-मेहनतकश पुरुष हैं उतने ही या उससे अधिक विपदा की मारी औरतें-बच्चे और बूढ़े हैं। औरत होना यहां अक्सर अतिरिक्त विपदा या अभिशाप का कारण या वाहक बन जाता है। नारकीय जीवन परिस्थितियों के साथ भूख, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, अभाव, बीमारी मनुष्यों के साथ जो न करें। जो कुछ उनके साथ होता है उसका अनुभव या उसकी समझ ऊपर के दोनों वर्गों को न तो हो सकती है और न वे इसकी कल्पना कर सकते हैं। और इसमें ऊपर के वर्ग के लोग हों अथवा मजदूर-मेहनतकश हों वे इन बुरी परिस्थितियों के लिए व्यक्तियों में दोष ढूंढते हैं। वे आसानी से यह नहीं समझ सकते कि यह व्यक्तियों के जीवन या सोच के कारण नहीं बल्कि वर्तमान मानव द्रोही पूंजीवादी व्यवस्था के कारण है। इस व्यवस्था का संचालन व नियंत्रण पूंजीपति वर्ग के हाथ में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ढंग से सम्पूर्ण रूप में है। चुनाव में वोट डालने से बस इतना होता है कि पूंजीपति वर्ग की कौन सी पार्टी या नेता उनके ऊपर शासन करेगा। और ये पार्टी या गुट सत्ता हासिल करने के लिए रंग-बिरंगे झूठ, लफ्फाजी व नकली-असली योजनाएं पेश करते हैं। इसके ही एक हिस्से के तौर पर सरकार, राजनैतिक दल, महिला उत्थान व कल्याण के नाम पर कुछ करने वाली सरकार-गैर सरकारी संस्थाएं ऐसी योजनाएं पेश व कार्यक्रम चलाते हैं जिनके जरिये दावा किया जाता है मजदूर-मेहनतकश महिलाओं का जीवन बदल जायेगा। वे गरीबी, अभाव, अशिक्षा, कुस्वास्थ्य आदि के दलदल से बाहर आ जायेंगी। क्योंकि उनकी उपेक्षा अब संभव नहीं है इसलिए उन्हें सम्बोधित करना या उन तक पहुंच बनाना इनकी जरूरत व मजबूरी है।
आठ मार्च का दिन मजदूर-मेहनतकश महिलाओं का ऐसा दिन है जब वे तसल्ली से इस बात पर विचार करती हैं कि सही क्या और गलत क्या है। मुक्ति क्या और गुलामी क्या है। उनका अतीत क्या व भविष्य क्या है। कौन उनका साथी है और कौन उनकी मुक्ति की राह में रोड़ा है।
आठ मार्च का दिन मजदूर-मेहनतकश महिलाओं का ऐसा दिन है जब वे अपने अतीत के संघर्षों को याद करती हैं और भविष्य के संघर्षों की तैयारी करती हैं। आठ मार्च का दिन मानव जाति की महान क्रांतियों और उसमें निभायी गयी महिलाओं की भूमिका को याद करने का दिन है। महान फ्रांसीसी क्रांति, पेरिस कम्यून, महान अक्टूबर समाजवादी क्रांति जैसी गौरवशाली क्रांतियों को याद करते हुए ही आगे का रास्ता तय हो सकता है।
आठ मार्च का दिन सिर्फ औरतों का ही नहीं उन मर्दों का भी दिन है जो अच्छे से जानते हैं कि मजदूर-मेहनतकश औरतों के जागे और आगे आये बगैर मानव मुक्ति का एक भी कदम नहीं उठाया जा सकता है। यह औरतों की मुक्ति में हर उस मर्द के सहयोग व संकल्प लेने का दिन है जो मानता है कि मानव मुक्ति औरतों की मुक्ति के बिना संभव नहीं है।
आठ मार्च का दिन हर उस शहीद को याद करने का दिन है जिन्होंने शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष में अपने प्राणों का बलिदान किया। यह दिन रोजा लक्जम वर्ग से लेकर भगतसिंह तक सभी शहीदों को याद करने का दिन है।