एक इंसान की चुनौती से घबराये संघी

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
/ek-insaan-ki-chunauti-se-ghabaraye-sanghi

उत्तराखण्ड को हिन्दुत्व की प्रयोगशाला बनाने पर उतारू संघी आजकल घबराये हुए हैं। सत्ता पर संघी मुख्यमंत्री धामी के काबिज होने, सारी शासन सत्ता अपने हाथ में होने के बावजूद ये घबराये हुए हैं। ये घबराये हुए हैं क्योंकि एक आम इंसान ने आगे बढ़कर संघी लम्पटों के कारनामों का मुंहतोड़ जवाब दे दिया। 
    
कोटद्वार में दीपक के बजरंग दल के लम्पटों से एक मुस्लिम कारोबारी को बचाने के लिए सीना तान के खड़े हो जाने ने संघी लम्पटों को हतप्रभ कर दिया। खुद का नाम मोहम्मद दीपक घोषित कर इस जिम ट्रेनर युवा ने संघी लम्पटों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। बजरंग दल के लम्पट मुस्लिम कारोबारी पर बाबा नाम की दुकान का नाम बदलने का दबाव डाल रहे थे। दीपक और उसके एक साथी ने बजरंग दल के लोगों का मुकाबला करते हुए उन्हें लौटने को मजबूर कर दिया। 
    
फिर क्या था अपनी शासन-सत्ता के रहते हुए अदने से युवक की इस हरकत पर समूची संघी ब्रिगेड तिलमिला उठी। पहले बजरंग दल के लम्पटों ने पूरे प्रदेश और उत्तर प्रदेश से आकर दीपक के जिम के बाहर हंगामा किया। फिर 12 फरवरी को बदनाम हिंदू रक्षा दल के पिंकी चौधरी ने कोटद्वार पहुंच दीपक को सबक सिखाने की घोषणा कर डाली। खैर! पुलिस ने हिन्दू रक्षा दल के लोगों को रोक कर टकराव को टाल दिया। 
    
दीपक व उसके साथी ने अपनी बहादुरी से दिखा दिया कि संघी लम्पटों के घृणित कारनामों के खिलाफ आम इंसान भी डटकर खड़ा हो सकता है। इसके बाद जब रुद्रपुर के जिम संचालक मोहित चोपड़ा ने भी दीपक के समर्थन में बयान दिया तो संघियों ने उसके जिम के बोर्ड पर कालिख पोत डाल। 
    
अपने लम्पटों के इन कारनामों पर मौन साधे संघी मुख्यमंत्री धामी के इस मुद्दे पर शुरू में तो कोई बोल ही नहीं फूटे। अंत में जब उन्होंने मुंह खोला तो दीपक के अपने नाम के आगे मोहम्मद लगाने पर घृणापूर्वक कहा कि हर किसी को आजादी है। साथ ही कांग्रेस पर हमला बोलते हुए दीपक को हीरो बनाने की निन्दा के साथ सनातन धर्म की रक्षा की बातें कर डालीं। यानी धामी इस मसले पर भी जहर ही बोते नजर आये। 
    
दीपक को डराने-धमकाने के संघी प्रयास जारी हैं। पुलिस ने उन पर फर्जी मुकदमा दर्ज कर लिया है तो संघी लम्पट जान से मारने की धमकी, मुल्ला बनाने की खुलेआम धमकी दे रहे हैं। संघी शासन अपने लम्पटों की हर हरकतों पर कान में तेल डाले बैठा है तो पुलिस लम्पटों को जानबूझकर गिरफ्तार नहीं कर रही है। दीपक को डराने के संघी कारनामों के उलट उसके समर्थन की आवाज भी पूरे देश से सामने आ रही है। 
    
दीपक को आर्थिक तौर पर नुकसान पहुंचाने के लिए उसके जिम में जा रहे युवाओं की संख्या घटवायी जा चुकी है। उसकी बच्ची का इस सारे माहौल में स्कूल जाना बंद हो चुका है। इसके बावजूद उसने अपना हौंसला नहीं खोया है। और बहादुरी के साथ वह न्याय की आवाज के साथ खड़ा है। 
    
संघी इसलिए घबराये हुए हैं कि एक अदने से युवक ने अगर आज उनके सामने खड़े होने का साहस कर दिया तो कल को ढेरों बहादुर हर जगह इनके खिलाफ खड़े होने लगेंगे। इनकी नफरत की राजनीति ध्वस्त हो जायेगी। 
    
संघियों का डर जायज है। नफरत की राजनीति करने वाले बहादुर नहीं डरपोक ही होते हैं। सारी शासन-सत्ता के साथ होने के बावजूद जनता के अपने खिलाफ खड़े होने से ये डरते हैं। झूठ व कुतर्क की इनकी राजनीति इनके डर को और बढ़ाती ही है। 
    
अगर एक युवा संघियां को मुंहतोड़ जवाब दे सकता है तो संगठित हो हिन्दू फासीवादियों के खिलाफ आम जन इन्हें मुकम्मल जवाब दे सकता है। जरूरत है कि जनता को इनके काले कारनामों के खिलाफ संगठित किया जाये। लव जिहाद-लैण्ड जिहाद-गौरक्षा आदि के नाम पर नफरत फैलाने के इनके कारोबार को जनता में उजागर किया जाये। इनके हर हमले का मुंहतोड़ जवाब दिया जाये। 
    
हिन्दू फासीवादियों की घृणित राजनीति के खिलाफ हिन्दू-मुसलमान सबको एक साथ उठ खड़े होने की जरूरत है। अभी इस एकजुटता की कमी के चलते ही गाजियाबाद में बैठकर पिंकी चौधरी दीपक को हड़काने की हिम्मत कर पा रहा है तो पुलिस बजरंगी लम्पटों को गिरफ्तार करने से बच रही है। जनता के इनके खिलाफ उठ खड़े होने से इनका भय कई गुना बढ़ जायेगा और तब इनके पालनहार बने केन्द्र-राज्य के सत्ताधीश भी इन्हें बचा नहीं पायेंगे। 
    
आज दीपक के साथ मजबूती के साथ खड़े होते हुए नफरती बयान देने वाले बजरंगियों-पिंकी चौधरी पर कार्यवाही की मांग उठायी जानी चाहिए। दीपक से फर्जी मुकदमा वापस लेने की व संघी लम्पटों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग की जानी चाहिए। 

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।