होरमुज की अमेरिकी घेराबंदी व बढ़ता तनाव

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
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पाकिस्तान में अमेरिका-ईरान के बीच पहले चक्र की वार्ता के विफल हो जाने के बाद अमेरिका ने होरमुज पर अपनी घेरेबंदी की घोषणा कर दी। इस घेरेबंदी के लागू होने से अमेरिका ने होरमुज के रास्तों पर अपने जहाज तैनात कर दिये हैं। अमेरिका ने ईरान से तेल लाने वाले सभी जहाजों को रोकने की घोषणा कर दी है। इस कदम से एक बार फिर दुनिया भर में तेल-गैस की किल्लत बढ़ते की संभावना पैदा हो गयी है। 
    
अमेरिकी घेरेबंदी का सबसे ज्यादा असर चीन पर पड़ने की संभावना है। चीन ईरान से बड़ी मात्रा में तेल का खरीददार रहा है। ऐसे में ईरान से चीन को जाने वाले जहाज ही अधिक रोके जाने की संभावना है। अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने शुरूआती 2 दिनों में चीन को जाने वाले 8 जहाज रोकने का दावा किया है। इसके साथ ही इस घेरेबंदी से अमेरिका ईरान को आर्थिक तौर पर ध्वस्त करने की मंशा पाले हुए है। ईरान की अर्थव्यवस्था में तेल बिक्री से प्राप्त आय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। 
    
चीन के साथ-साथ भारत व एशिया के अन्य देशों की तेल आपूर्ति भी इस घेरेबंदी से प्रभावित होने का अनुमान है। चीनी साम्राज्यवादी अमेरिका की इस हरकत के खुलकर विरोध में सामने भी आ गये हैं। वे अमेरिका के इस सुझाव पर अपना विरोध दर्ज करा चुके हैं कि चीन अमेरिका या वेनेजुएला से तेल खरीद अपनी भरपाई करे। चीनी साम्राज्यवादी होरमुज की अमेरिकी घेरेबंदी पर अधिकाधिक विरोध में खड़े हो रहे हैं। 
    
ईरानी हुकूमत अमेरिका द्वारा की गयी घेरेबंदी पर दुनिया भर में पैदा होने वाली उथल-पुथल के प्रति सचेत करने का काम कर रही है। उसने तेल के दामों में पैदा होने वाले उछाल को भुगतने के लिए देशों को तैयार रहने को कहा है। साथ ही उसने अमेरिका को चेतावनी भी दी है कि अगर ईरानी बंदरगाहों को नुकसान पहुंचा तो अरब देशों का कोई बंदरगाह सुरक्षित नहीं रहेगा। 
    
इस सबके बीच पाकिस्तान दूसरे चक्र की अमेरिका-ईरान वार्ता आयोजित करने का प्रयास कर रहा है। साथ ही वह 15 दिनी युद्ध विराम को 22 अप्रैल की सीमा के आगे बढ़ाने के लिए दोनों पक्षों को राजी करने में जुटा है। 
    
अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने होरमुज की घेरेबंदी व युद्ध के आगे बढ़ने पर दुनिया भर में मंदी के खतरे के प्रति आगाह किया है। तेल-गैस संकट के चलते पहले ही अर्थव्यवस्थायें भारी संकट से गुजर रही हैं। 
    
ऐसे में बड़बोला ट्रम्प कभी शांति का प्रलाप कर रहा है तो कभी ईरान को ध्वस्त करने का दावा कर रहा है। उसके यूरोपीय सहयोगी उसका साथ छोड़ चुके हैं। उसे इजरायल के अलावा ईरान से युद्ध करने में किसी का भी समर्थन नहीं मिल रहा है। खुद अमेरिका में संसद में ट्रम्प के युद्धोन्माद पर लगाम कसने की विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी प्रयास कर रही है। 
    
चीनी साम्राज्यवादी युद्ध रुकवाने के लिए नये तरीके का प्रस्ताव पेश कर अपनी सक्रियता बढ़ा रहे हैं। वे पश्चिम एशिया में अपनी सक्रियता बढ़ा अमेरिकी प्रभुत्व को कमजोर कर रहे हैं। अब वे खुलेआम विश्व व्यवस्था के नियम आधारित संचालन की बातें कर अमेरिका को आंखे दिखा रहे हैं। 
    
अमेरिकी सरगना ट्रम्प चाहे जितने भी मनगढ़न्त दावे कर ले हकीकत यही है कि ईरान पर बोले गये हमले में उसे मुंह की खानी पड़ी है। ईरानी सत्ता व जनता के पलटवार ने उसके घमण्ड को चूर कर दिया है। ईरान में तख्तापलट के उसके मंसूबे ध्वस्त होते गये हैं। इसी के चलते ट्रम्प युद्ध विराम व वार्ता को मजबूर हुआ है। वार्ता में भी अमेरिका अपने मन की बातें थोप पाने में विफल रहा है। इस सबके चलते ट्रम्प की बौखलाहट बढ़ रही है व अमेरिकी साम्राज्यवाद का वर्चस्व कमजोर पड़ रहा है। 
    
खुद दुनिया भर की जनता पहले से ही अमेरिका-इजरायल के द्वारा ईरान पर थोपे युद्ध के विरोध में रही है। अमेरिका के भीतर भी बड़े पैमाने पर जनता के युद्ध विरोधी प्रदर्शन ट्रम्प को और बेचैन कर रहे हैं। पर आदत से मजबूर अमेरिकी साम्राज्यवादी यूं ही अपनी हार नहीं मान सकते। वे बौखलाहट में इस युद्ध को और खींचने की ओर बढ़ सकते हैं। 
    
युद्ध का आगे बढ़ना जहां पहले से युद्ध की दुश्वारियां झेल रही दुनिया की जनता की तकलीफें और बढ़ायेगा वहीं दुनिया में शासकों की आपसी टकराहटों को भी बढ़ाने का काम करेगा। अपनी बारी में अमेरिकी चाह कर भी अपनी चौधराहट को और कमजोर पड़ने से रोक नहीं पायेंगे। 
    
बौखलाये अमेरिकी साम्राज्यवादियों व इजरायली शासकों के प्रति दुनिया भर में नफरत बढ़ रही है। उनकी करतूतें व युद्धोन्माद उन्हें और अधिक नफरत की ओर ले जा रहे हैं। 

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