शीर्ष अदालत का शीर्षासन

Published
Fri, 05/01/2026 - 15:50
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आजकल सबरीमाला मामले पर भारत के सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय बेंच सुनवाई कर रही है। यह पीठ केरल के तीर्थस्थल में माहवारी वाली महिलाओं के प्रवेश पर उठे विवाद पर इससे संबंधित व्यापक प्रश्नों पर भी सुनवाई कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सबरीमाला मंदिर मंे सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी। इस निर्णय ने माहवारी वाली उम्र वाली महिलाओं के मंदिर में प्रवेश की पहले से चली आ रही रुकावट को समाप्त कर दिया था। इसके बाद 2019 मंे सुप्रीम कोर्ट में उक्त निर्णय पर पुनर्विचार याचिका डाली गयी। अदालत ने इस मसले को उच्च पीठ के हवाले कर दिया। अब 9 सदस्यीय उच्च पीठ इस मसले पर सुनवाई कर रही है और अंतिम निर्णय लेगी। 
    
दरअसल भारतीय संविधान जहां एक ओर व्यक्तियों की स्वतंत्रता-समानता की बात करता है वहीं दूसरी ओर वह धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर धार्मिक समूहों को उनकी धर्म आधारित प्रथाओं को मानने की भी स्वतंत्रता देता है। ऐसे में उक्त दोनों बातें सबरीमाला प्रकरण की तरह परस्पर विरोधी भी कभी-कभी खड़ी हो जाती रही हैं। ऐसे मामलों में अदालतें कभी एक तो कभी दूसरे पक्ष में निर्णय देती रही हैं। 
    
अब 9 सदस्यीय पीठ इन दोनों स्वतंत्रताओं पर चर्चा करते हुए कभी एक तो कभी दूसरे के पक्ष में बातें कर रही है। कुछ दिन पूर्व उसने जजों को अपनी धार्मिक निष्ठा से स्वतंत्र रहकर अदालती निर्णय देने की बात कही। अब उसने धार्मिक स्वतंत्रताओं और राज्य के उनमें हस्तक्षेप करने की शक्ति को स्वीकार तो किया पर अदालतों के धार्मिक स्वतंत्रताओं में हस्तक्षेप को गैरजरूरी बताया। 
    
दरअसल किसी भी वास्तविक धर्मनिरपेक्ष समाज में धर्म व्यक्ति का निजी मामला होता है व धर्म को सार्वजनिक जीवन-राज्य में हस्तक्षेप से दूर कर दिया जाता है। ऐसे में किसी धर्म की प्रथा यदि उक्त समुदाय के किन्हीं व्यक्तियों की समानता को बाधित करती है तो कानून-राज्य व्यक्तियों की समानता के पक्ष में खड़ा होता है व धर्म को वह प्रथा बदलनी पड़ती है।
    
उदाहरण के तौर पर लें, हिन्दू धर्म में पत्नी पति को भगवान सदृश मानती है व उसकी लम्बी उम्र की प्रार्थना व्रत आदि करती है। अब यदि हिन्दू धर्म के गुरू इस व्रत व प्रार्थना को अनिवार्य कर दें और सारी महिलाओं पर थोप दें व एक भी महिला इसे न मानने के लिए अदालत की शरण ले ले तो अदालत उक्त धार्मिक मान्यता के उलट स्त्री के पक्ष में निर्णय देगी। इसी तरह सबरीमाला मन्दिर प्रकरण में 45 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं को मंदिर जाने से रोकने वाली प्रथा को समानता के आधार पर मंदिर को बदलने का 2018 में आदेश दे अदालत ने सही रुख अपनाया था। 
    
पर भारत जैसे देश में जहां धर्म का सभी मामलों में हस्तक्षेप बरकरार है। जहां हिन्दू धर्म के आधार पर फासीवादी निजाम कायम करने पर संघी उतारू हों, वहां अदालत उक्त दोनों स्वतंत्रताओं के बीच न्याय करने में फंस जाये तो यह आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। 
    
वर्तमान में पीठ के तर्क इसी बात के संकेत दे रहे हैं कि धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा का हवाला दे कर हो सकता है 45 वर्ष से कम उम्र की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश की छूट के 2018 के निर्णय को पलट दिया जाये। इस तरह धर्म को व्यक्ति की समानता के ऊपर वरीयता मिल जाये। आखिर संघी सरकार अदालत से यही चाहती भी है।  

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