विविध

इजराइल से और भारतीय मजदूरों के लिए बुलावा

आत्मनिर्भर भारत पर रोजगार इजराइल में

एक तरफ जहां इजराइल की कम्पनियों द्वारा भारतीय कामगारों की कुशलता पर प्रश्न चिह्न उठाये जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर इजराइल के दूतावास ने एक्स (ट्विटर) पर लिखा है कि भारत और इ

मजदूर वर्ग के बच्चों की शिक्षा और लोकतंत्र

आज हकीकत यह है कि देश पर एकाधिकारी पूंजी का राज है

अमन 14 साल का मजदूर और छात्र है। अमन और उसका परिवार अगस्त महीने में बवाना (दिल्ली) में खेत मजदूरी करने के लिए आया। 8 सितंबर 2024 को पूठ खुर्द के साध मंदिर के सामने अमन से

सभ्यता की दुहाई और महिला अपराधों में वृद्धि

पूंजीपति वर्ग की पतित सभ्य संस्कृति महिलाओं को यौन वस्तु के रूप में पेश करती है

पूंजीवादी लोकतंत्र में पूंजीपति वर्ग और इसके समर्थक लोग सभ्यता की दुहाई देते नहीं थकते। यह वर्ग समाज में अपने आप को ही सभ्य मानता है। मेहनतकश वर्ग को असभ्य कहकर उससे घृणा

विभाजन

साइकिल से फैक्टरी पहुंचने में दस मिनट लगते हैं। 8 बजकर 10 मिनट ये वो अंतिम समय है जिस वक्त तक मजदूरों को फैक्टरी में पहुंच जाना होता है। उसके बाद लेट आने पर गेट पर रोका भ

हिंदू

हिंदू तो मैं इसलिए हूं  क्योंकि मुसलमान नहीं हूं

मैं हिन्दू नहीं हूँ? 
हजारों साल तक मुझे 
मंदिर में नहीं घुसने दिया, 
फिर भी मैं हिन्दू हूं 
क्योंकि मैं मुसलमां नहीं हूं।

आपका नजरिया - मजदूर मेहनतकश परिवार और पतित पूंजीवादी संस्कृति

आज हम जिस समाज में रह रहे हैं वह सड़ गल रहा है। समाज में नैतिकता, सामूहिकता का पतन हो रहा है। उससे मजदूरों-मेहनतकशों के परिवार भी अछूते नहीं हैं। तथाकथित आधुनिक जीवन शैली

राजनीति से बेरुखी ठीक नहीं

राजनीति सत्ता को प्राप्त करने अथवा उसे अपने हाथ में कायम रखने के लिए किया जाने वाला संघर्ष या आम भाषा में लड़ाई है

राजनीति के प्रति घृणा मजदूरों-मेहनतकशों में आम है। हर चुनाव में करीब-करीब एक तिहाई से एक चौथाई आबादी ऐसी है जो कभी वोट डालने ही नहीं जाती है। और कभी-कभी तो यह संख्या आधी तक हो जाती है। वोट न डालने वालों और चुने गये लोगों के खिलाफ वोट डालने वालों की संख्या को आपस में जोड़ दिया जाये तो यह बात सामने आयेगी कि चुनाव जीता हुआ व्यक्ति आबादी की बहुसंख्या का नहीं बल्कि एक बेहद छोटी अल्पसंख्या का प्रतिनिधि है। और यही बात मौजूदा सरकार पर भी लागू होती है। 

बलात्कार की संस्कृति और संस्कृति का पाखंड

बलात्कार की घटनाओं की इतनी विशाल पैमाने पर मौजूदगी की जड़ें पूंजीवादी समाज की संस्कृति में हैं

इस बात को एक बार फिर रेखांकित करना जरूरी है कि पूंजीवादी समाज न केवल इंसानी शरीर और यौन व्यवहार को माल बना देता है बल्कि उसे कानूनी और नैतिक भी बना देता है। पूंजीवादी व्यवस्था में पगे लोगों के लिए यह सहज स्वाभाविक होता है। हां, ये कहते हैं कि किसी भी माल की तरह इसे भी खरीद-बेच के जरिए ही हासिल कर उपभोग करना चाहिए, जोर-जबर्दस्ती से नहीं। कोई अपनी इच्छा से ही अपना माल उपभोग के लिए दे दे तो कोई बात नहीं (आपसी सहमति से यौन व्यवहार)। जैसे पूंजीवाद में किसी भी अन्य माल की चोरी, डकैती या छीना-झपटी गैर-कानूनी या गलत है, वैसे ही इंसानी शरीर व इंसानी यौन-व्यवहार का भी। बस। पूंजीवाद में इस नियम और नैतिकता के हिसाब से आपसी सहमति से यौन व्यभिचार, वेश्यावृत्ति, पोर्नोग्राफी इत्यादि सब जायज हो जाते हैं। बस जोर-जबर्दस्ती नहीं होनी चाहिए। 

नये आपराधिक कानून : अधिक क्रूर-अधिक दमनकारी तंत्र की संहिता

तीन आपराधिक कानून ना तो ‘ऐतिहासिक’ हैं और ना ही ‘क्रांतिकारी’ और न ही ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति दिलाने वाले

ये तीन आपराधिक कानून ना तो ‘ऐतिहासिक’ हैं और ना ही ‘क्रांतिकारी’ और न ही ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति दिलाने वाले। इसी तरह इन कानूनों से न्याय की बोझिल, थकाऊ अमानवीय प्रक्रिया से जनता को कोई राहत नहीं मिलने वाली। न्यायालय में पड़े 4-5 करोड़ लंबित मामलों से भी छुटकारा नहीं मिलने वाला। ये तो बस पुराने कानूनों की नकल होने के साथ उन्हें और क्रूर और दमनकारी बनाने वाले हैं और संविधान में जो सीमित जनवादी और नागरिक अधिकार हासिल हैं ये कानून उसे भी खत्म कर देने वाले हैं।

सूचना : वार्षिक सेमिनार

‘नागरिक’ पाक्षिक की ओर से इस वर्ष वार्षिक सेमिनार का आयोजन वाराणसी में किया जा रहा है। सेमिनार का विषय ‘बदलता मीडिया एवं जनसरोकार’ है। 
    

आलेख

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।