विविध

गाजियाबाद में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले बांग्लादेशियों पर हमला

झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले गरीबों पर हमला

बांग्लादेश में लंबे समय से आरक्षण विरोधी आंदोलन और प्रधानमंत्री शेख हसीना के इस्तीफे के बाद अराजकता का माहौल बना हुआ है। क्योंकि ये आंदोलन केवल आरक्षण तक सीमित नहीं रहा ब

कांवड़ यात्रा : फासीवादी प्रयोगशाला में चूहा बना बेरोजगार मजदूर-मेहनतकश तबका

कांवड़ियों की यह ज्यादातर आबादी मजदूर-मेहनतकश वर्ग से आती है

जुलाई के महीने के साथ ही उत्तर भारत की सड़कों पर एक विभीषिका शुरू होती है। इस विभीषिका को कांवड़ यात्रा कहा जाता है। भगवा कपड़ों में उत्तर भारत के राजमार्गों पर चल रहे ये का

‘आरक्षण के भीतर आरक्षण’ : आमजन के लिए आज महज झुनझुने के भीतर झुनझुना

उच्चतम न्यायालय की सात सदस्यों की संविधान पीठ ने अपने बहुमत (6-1) से यह फैसला दिया कि ‘राज्य अनुसूचित जाति (एससी) व अनुसूचित जनजाति (एसटी) के भीतर एक तार्किक व्यवस्था के

मजदूर वर्ग पर ‘‘लेबर कोड्स’’ के हमले के खिलाफ प्रतिरोघ की शुरूआत ‘‘वर्ग सचेत मजदूरों’’ को करनी होगी

लेबर कोड्स : मजदूर वर्ग पर हमला

मजदूरों व मजदूर यूनियनों के बीच लेबर कोड्स का हमला प्रतिरोध का कोई विषय नहीं बन पा रहा है। मजदूर यूनियनें लेबर कोड्स को मजदूरों पर हमले के रूप में नहीं ले पा रही हैं। औद्

सड़ते हुए पूंजीवाद में जनता बेहाल

पूंजीवाद में मजदूर

आज के समाज में हम देख रहे हैं कि मेहनतकश जनता बेहाल है। अपने रोजमर्रा जीवन के लिए। एक तरफ इसी पूंजीवादी समाज में कुछ लोग ही खुश हैं जो लोग मेहनत नहीं कर रहे हैं जो सिर्फ

ओवरटाइम -भाग 1

हाड़-तोड़ मेहनत और ओवरटाइम

मानव के श्रम ने ही उसे पशुवत जीवन से ऊपर उठाकर उसे मानव समाज का रूप दिया। मानव श्रम ने औजारों का रूप लिया। औजारों ने जीवित मानव के हाथों से मिलकर धरती को छुआ तो धरती ने फ

मैं आजाद हूं?

मैं आजाद हूं?

मैं एक आम नागरिक हूं
मैं आजाद हूं?
वोट करने के लिए
टैक्स भरने के लिए
मगर मैं अपने नागरिक अधिकारों
की मांग नहीं कर सकता
वरना धर लिया जाऊंगा

बांग्लादेश : जनाक्रोश से हसीना भागी पर भगोड़ा सत्ता में

बांग्लादेश में जनाक्रोश

बांग्लादेश की सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक स्थिति इस बात को बार-बार रेखांकित कर रही है कि आम जनों, मजदूरों-मेहनतकशों, छात्र-युवाओं की बुनियादी समस्याओं का समाधान न तो शेख हसीना, न मोहम्मद यूनुस, न बेगम जिया के पास है। इसका समाधान उन्हें स्वयं करना होगा। पूंजीवादी निजाम का खात्मा और समाजवाद ही अंततः समाधान का रास्ता खोल सकता है। 

एक व्यक्ति, एक वोट और एक मूल्य

राजनीति में बराबरी होगी तथा सामाजिक व आर्थिक जीवन में गैर बराबरी

यह देखना कोई मुश्किल नहीं है कि शोषक और शोषित दोनों पर एक साथ एक व्यक्ति एक मूल्य का उसूल लागू नहीं हो सकता। गुलाम का मूल्य उसके मालिक के बराबर नहीं हो सकता। भूदास का मूल्य सामंत के बराबर नहीं हो सकता। इसी तरह मजदूर का मूल्य पूंजीपति के बराबर नहीं हो सकता। आम तौर पर ही सम्पत्तिविहीन का मूल्य सम्पत्तिवान के बराबर नहीं हो सकता। इसे समाज में इस तरह कहा जाता है कि गरीब अमीर के बराबर नहीं हो सकता।

आलेख

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।