8 घंटे कार्यदिवस को बढ़ाने में जुटी सरकारें

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काम के घंटे दिन में कितने होने चाहिए, पूंजीवादी व्यवस्था की शुरूआत से ही यह ऐसा प्रश्न रहा है जिसका पूंजीपति वर्ग एक तो मजदूर वर्ग दूसरा उत्तर देता रहा है। पूंजीपति वर्ग की चाहत इस कार्यदिवस पर किसी भी लगाम लगाने की विरोधी रही है वहीं मजदूर वर्ग इस पर लगाम लगाने और इसे कम करने की मांग करता रहा है। 
    
लगभग 200 वर्षों से कार्यदिवस की लंबाई के प्रश्न पर पूंजी व श्रम के बीच रस्साकसी जारी है। पिछली सदी में अपने संघर्षों के दम पर व समाजवादी सत्ताओं के कायम होने के दबाव में मजदूर वर्ग पूंजीवादी सत्ता को 8 घंटे के कार्य दिवस को स्वीकारने के लिए मजबूर करने में सफल हुआ था। किसी जमाने के 18-18 घंटे काम को देखते हुए मजदूर वर्ग की यह बड़ी जीत थी। हालांकि पूंजीपति वर्ग व उसकी सत्ता ने 8 घंटे कार्य दिवस को औपचारिक व कानूनी तौर पर ही स्वीकारा था वास्तविक तौर पर नहीं। इसीलिए तमाम क्षेत्रों-घरेलू उद्यमों, पिछड़े गुलाम देशों में जहां पूंजी को मौका मिलता था वह इसे तोड़ 12-12 घंटे काम कराती रहती थी। ओवरटाइम कराने की छूट एक ऐसा हथियार था जिसके दम पर कितने ही घंटे काम कराने पर भी मालिक कानून की मार से बचा रहता था। 
    
फिर भी जहां-जहां मजदूर संगठित हो कानून को व्यवहार में उतारने को लड़ते थे, पूंजीपति वर्ग को मजबूरन इसे लागू करना पड़ता था। पर बीते 4-5 दशकों में मजदूर वर्ग के संघर्ष कमजोर पड़ते गये। समाजवादी देशों में पूंजीवाद फिर से स्थापित हो गया। इसका लाभ उठा पूंजी ने श्रम पर नये सिरे से हमला बोल दिया। अब बाकी मामलों में छूटों के साथ काम के घण्टे बढ़ाने की भी पूंजीपति मांग करने लगे। 
    
पूंजीपतियों की इस मांग का सरकारें समर्थन करने लगीं। उनकी सीधे काम के घंटे बढ़ाने की हिम्मत नहीं पड़ी। इसलिए वे हफ्ते में 4 दिन काम का शिगूफा लेकर सामने आ गयीं। उन्होंने कहा कि हफ्ते में 48 घंटे से ज्यादा काम नहीं लिया जायेगा। इस तरह 4 दिन काम के नारे से रोज 12 घण्टे काम कराने की बातें की जानें लगीं। भारत में यह सब कुछ इतनी निर्लज्जता से होने लगा कि राज्य सरकारें पूंजीपतियों को लुभाने की होड़ में 9-10-11 घंटे काम कराने की छूटों के कानून बनाने लगीं। 
    
अभी हाल में ही बेंगलुरू के रागीगुड्डा मेट्रो स्टेशन पर एक मेट्रोकर्मी के साथ हुआ हादसा सामने आया। वह मेट्रोकर्मी एक सुरक्षा गार्ड था। वह प्लेटफार्म पर टहलते हुए अचानक पटरी पर गिर पड़ा। वह बीते 16 घंटे से लगातार ड्यूटी कर रहा था अतः टहलते-टहलते होश खोकर पटरी पर गिर पड़ा। तभी एक यात्री की नजर उस पर पड़ी जिसने उसे खींच कर बचाया। कुछ क्षणों की देर होने पर मेट्रो ट्रेन आने पर उसकी जान भी जा सकती थी। उक्त घटना का वीडियो वायरल होने पर अधिकारीगण घटना की जांच का नाटक करने को मजबूर हो गये। यद्यपि तय ड्यूटी नियमों के तहत वह 9 घंटे (1 घंटा ब्रेक के साथ) ही ड्यूटी कर सकता था पर वास्तव में वह 16 घंटे से नौकरी कर रहा था। 
    
स्पष्ट है कि काम के घंटे बढ़ने व काम का बोझ बढ़ने से औद्योगिक दुर्घटनायें-कार्यस्थलों पर दुर्घटनायें बढ़ेंगी। पर न तो सरकारों और न मालिकों को ही मजदूरों की जान की कोई फिक्र है। सबकी चिंता पूंजीपतियों को बढ़ता मुनाफा है। भले ही मजदूर जान गंवाते रहें। 
    
कहां तो तकनीकी उन्नति व बढ़ती बेकारी के आज के दौर में काम के घंटे 8 से घटा कर 6 व 5 घंटे किये जाने की बातें होनी चाहिए थीं, कहां इसे बढ़ाकर 12 घंटे किया जा रहा है। ऐसे में 8 घंटे के कार्य दिवस को बचाने की लड़ाई मजदूर वर्ग की फौरी लड़ाई बन जाती है। आज सरकारें व पूंजीपति शिकागो के मई दिवस के शहीदों की कुर्बानी से हासिल अधिकार मजदूर वर्ग से छीन लेता चाहती है। इसे बचाने के लिए क्रांतिकारी तेवरों के साथ मजदूर वर्ग को व्यापक एकजुटता से संघर्ष छेड़ना जरूरी है। 

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