अमेरिकी तटकर और भारत का शासक वर्ग

ट्रम्प द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत तटकर थोपने के बाद से भारत सरकार सकते में है। मोदी के प्रिय मित्र ट्रम्प द्वारा किये गये इस व्यवहार से बड़बोले मोदी-शाह को सांप सूंघ गया है। वे न तो ट्रम्प की बुराई कर पा रहे हैं और न ही ट्रम्प को कोई जवाब दे पा रहे हैं। उन्हें उम्मीद ही नहीं थी कि अमेरिकापरस्ती की दिन-रात वकालत करने का उन्हें यह सिला मिलेगा और वह भी मोदी के परम मित्र ट्रम्प से।

अगर यह तटकर लागू हो जाता है तो भारत द्वारा अमेरिका को निर्यात किये जाने वाले मालों की मात्रा में गिरावट आना तय है। भारत अमेरिका को इंजीनियरिंग सामान, इलेक्ट्रोनिक्स, ज्वैलरी, रेडीमेड कपड़ा, एल्युमिनियम-स्टील, दवायें आदि कई चीजें निर्यात करता रहा है। भारत के निर्यात का 18 प्रतिशत अमेरिका को होता रहा है। बीते वर्ष यह निर्यात लगभग 80 अरब डालर का रहा। अनुमान लगाया जा रहा है कि तटकर लागू होने पर इस निर्यात का 67 प्रतिशत तक प्रभावित हो सकता है।

निर्यात में इस गिरावट का असर भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरे से प्रभावित करेगा। विभिन्न क्षेत्रों में अमेरिकी मांग कम होने से इनके उत्पादक भारतीय उद्योग प्रभावित होंगे और अनुमानतः कई लाख नौकरियां समाप्त होंगी। हीरा उद्योग में अमेरिकी सौदे रद्द होने से अभी से 1 लाख नौकरियां समाप्त होने की बात आ रही है। वस्त्र उद्योग व दवा उद्योग भी गम्भीर रूप से प्रभावित होंगे।

ट्रम्प द्वारा थोपे गये इस तटकर के पीछे तीन प्रमुख बातें पेश की जा रही हैं जिनकी वजह से ट्रम्प भारत से नाराज था। पहली यह कि भारत अमेरिका के कहने के बावजूद रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदना जारी रखे हुए है। दूसरी यह कि भारत अमेरिकी कृषि व डेयरी उत्पादों के लिए भारत का बाजार खोलने को तैयार नहीं है व तीसरी हालिया भारत-पाक युद्ध विराम का श्रेय भारत ट्रम्प को देने को तैयार नहीं है जबकि ट्रम्प लगातार दावा करता आया है कि यह युद्ध उसने रुकवाया है।

अब भारतीय शासक वर्ग को इस परिस्थिति से निकलने की जो राह पूंजीवादी अर्थशास्त्री सुझा रहे हैं वो भी अलग-अलग तरह की हैं। एक धड़ा अमेरिका को उसकी भाषा में जवाब देकर निर्यात में कमी की भरपाई अन्य देशों से करने व इस हेतु ब्रिक्स को मजबूत करने की मांग कर रहा है। दूसरा धड़ा तीन कृषि कानूनों को फिर से लागू करने व इस रूप में भारतीय बड़ी पूंजी के दम पर कृषि व डेयरी को इस हद तक सशक्त करने की मांग कर रहा है कि वे अमेरिकी उत्पादों का मुकाबला कर सकें। जाहिर है यह धड़ा अमेरिका के आगे झुक कर अमेरिकी कृषि व डेयरी उत्पादों के भारत में आने की छूट देने की बात कर रहा है। इस झुकने से उसे लगता है कि अमेरिका भारी-भरकम तटकर हटा देगा। कोई भी धड़ा रूस से कच्चा तेल खरीद कम करने की बात नहीं कर रहा है।

अब मोदी सरकार भले ही दावा कर रही हो कि किसानों के हितों से समझौता नहीं करेंगे। पर भारत का बड़ा पूंजीपति वर्ग उस पर कृषि-डेयरी मुद्दे पर झुककर कम तटकर करवाने का दबाव डाल रहा है। साथ ही तीन कृषि कानून चोर दरवाजे से लागू करने का दबाव वह सरकार पर पहले से ही डालता रहा है।

ऐसे में मोदी सरकार की अमेरिका परस्ती को देखते हुए इसकी कम संभावना है कि वो ट्रम्प को उसकी भाषा में जवाब दे। जो मोदी संसद में ट्रम्प को झूठा बोलने की हिम्मत नहीं कर पाये, उनसे अमेरिका को जस का तस जवाब देने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

ज्यादा संभावना यही है कि भारत सरकार सारी हेकड़ी के बावजूद अमेरिका परस्ती की राह पर ही आगे बढ़ेगी और अमेरिकी कृषि उत्पादों व डेयरी उत्पादों को भारत में आने की छूट दे देगी व बदले में भारी भरकम तटकर कम करवा लेगी। मोदी ट्रम्प के आगे झुककर अपनी ‘मित्रता’ बनाये रखेंगे।

स्पष्ट ही है कि यह समझौता भारत के करोड़ों किसानों व छोटे दुग्ध उत्पादकों के पहले से संकटमय जीवन को और संकट में ले जायेगा। अमेरिकी जीन संवर्धित बीज, खाद और अनाज, डेयरी उत्पाद भारतीय छोटे-मझौले किसानों की तबाही को और तेज करेंगे। यह बड़ी पूंजी को इस क्षेत्र में घुसपैठ की राह को सुलभ बनायेंगे।

किसान संगठन उचित ही इस खतरे को भांप कर मोदी सरकार का विरोध पहले से ही कर रहे हैं। उन्हें अपना संघर्ष और तेज करने की जरूरत है।

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