अमेरिका में ‘नो किंग्स’ प्रदर्शनों की नई लहर

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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अमेरिका में 17 अक्टूबर को नो किंग्स प्रदर्शनों की चौथी लहर देखने को मिली। मध्यावधि चुनाव से ठीक पहले होने वाले ये प्रदर्शन दिखा रहे हैं कि जनता ट्रम्प के शासन से नाराज है। ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन इससे पहले जून 25, अक्टूबर 25 और मार्च 26 में आयोजित हुए थे। अमेरिका के 50 राज्यों में लाखों लोग इन प्रदर्शनों में शामिल हुए थे।
    
इस बार के ‘नो किंग्स’ प्रदर्शनों की थीम ‘अर्ली वोट’ है। यानी जब चुनाव होंगे तो मतदाताओं को जल्दी से जल्दी वोट डालने का आह्वान किया जा रहा है। ऐसा करने के पीछे यह कहा जा रहा है कि सभी लोग मतदान करने के अधिकार का प्रयोग करते हुए मतदान स्थल पहुंचें और किसी भी गड़बड़ी को होने से रोकें। ‘अर्ली वोट’ से मतलब उनका साफ है कि कहीं ऐसा न हो कि ट्रम्प जीतने के लिए कोई गड़बड़ी कर दें।  
    
अमेरिका में मध्यावधि चुनाव 3 नवंबर को हैं। नो किंग्स के प्रदर्शन की तैयारी 3000 से अधिक स्थानों में करने की योजना इसके आयोजकों द्वारा बनाई जा रही है। इसके मुख्य आयोजकों में इंडिविजबल, मूव आन, ‘अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन’, ‘ब्लैक वोटर्स मैटर फंड’, ‘अमेरिकन फेडरेशन आफ टीचर्स’, वोट लतीनो, पब्लिक सिटीजन, 50501 मूवमेंट (यह आंदोलन फरवरी 2025 में डोनाल्ड ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने और उनकी शुरुआती नीतियों जैसे बड़े पैमाने पर निर्वासन और सरकारी फंड में कटौती के विरोध में उभरा। यह 50 राज्यों में 50 विरोध प्रदर्शन और 1 साथ के नाम पर था) हैं। 
    
जब ट्रम्प 2024 में राष्ट्रपति के पद के लिए दूसरी बार खड़े हुए थे उस समय इजराइल और फिलिस्तीन युद्ध चल रहा था। उस समय ट्रम्प ने ऐसा व्यवहार किया मानो वे अब युद्ध को रुकवा ही देंगे। इसी तरह रूस-युक्रेन युद्ध को भी वे बंद करवाने की बात करते थे लेकिन दरअसल वे यह सब अपनी शर्तों पर करवाना चाहते थे। वे ‘अमेरिका प्रथम’ की नीति के तहत इन युद्धों को बंद करवा कुछ हासिल करना चाहते थे। जब वे ‘अमेरिका प्रथम’ कहते हैं तो उसमें अमेरिका के मेहनतकश शामिल नहीं होते हैं। उसमें अमेरिका के पूंजीपति शामिल होते हैं। युद्ध बंद करवाने का उनका ढोंग धीरे-धीरे उजागर हो गया। 
    
इसके अलावा जब ट्रम्प राष्ट्रपति बने तो एलन मस्क को उन्होंने डिपार्टमेंट आफ गवर्नमेंट एफिसियेंसी (Department of Government Efficiency- DOGE) का प्रमुख बना दिया जिसका काम अमेरिकी सरकार के खर्चों में कटौती करना था। यह एक अलग विभाग था जो नया बनाया गया था। इसके अलावा सरकारी नियमों और लाल फीताशाही को खत्म करना भी इसका काम था ताकि पूंजीपतियों के लिए कोई रुकावट न पैदा हो। एलन मस्क ने सरकारी बचत में कमी के लिए काफी सरकारी नौकरी खत्म कर दीं। हालांकि बाद में जनता के विरोध प्रदर्शन ने मस्क और ट्रम्प के बीच मतभेद पैदा कर दिये और मस्क ट्रम्प सरकार से मई 25 में अलग हो गये। रोजगार खत्म होने से एक बड़ी आबादी ट्रम्प के खिलाफ हो गयी। 
    
इसके साथ ही ट्रम्प ने अप्रवासियों को अमेरिका से बाहर निकालने का एक अभियान चलाया। इसके लिए खुफिया एजेंसियों को भी खुली छूट दी गयी। ट्रम्प ने अप्रवासियों को जिस तरह बाहर भेजना शुरू किया तो ट्रम्प की अप्रवासी नीति का वहां की जनता ने काफी विरोध किया। 
    
युद्ध बंद करवाने और शांति का नोबेल पुरुस्कार पाने की चाहत रखने वाले ट्रम्प के शासन काल में युद्ध कभी बंद ही नहीं हुए। और हद तो तब हो गयी जब ट्रम्प ने इजरायल के साथ मिलकर बिना किसी ठोस कारण ईरान पर हमला कर दिया। इस युद्ध के कारण अरब देशों में अमेरिकी सैन्य अड्डों और उसकी छवि को भी काफी नुकसान पहुंचा। 
    
ऐसे में जब अमेरिका के अंदर बेरोजगारी बढ़ रही है, महंगाई बढ़ रही है और बजट का बड़ा हिस्सा सैन्य खर्चों में हो रहा है तो जनता का नाराज होना स्वभाविक है। और यह नाराजगी बार-बार होने वाले प्रदर्शनों में दिख रही है। 
    
लेकिन इसका हल ‘अर्ली वोट’ जैसे आह्वानों से नहीं होगा। इसके लिए तो पूंजीवादी समाज का तख्ता पलटने का आह्वान और उसकी तैयारी करनी होगी।

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