अमेरिकी साम्राज्यवादियों का व्यापार युद्ध : कारण व परिणाम

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
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इस समय भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते की बहुत चर्चा है। यह चर्चा ज्यादातर भारत के अमेरिका के सामने आत्मसमर्पण की है जिसे तथाकथित राष्ट्रवादी सरकार ने अंजाम दिया है। छप्पन इंच सीना वाले संघी प्रधानमंत्री के इस शर्मनाक समर्पण की वजहें खोजी जा रही हैं जो निहायत व्यक्तिगत वजहों तक भी पहुंच रही हैं।     
    
लेकिन इस समझौते के दूसरे पहलू की चर्चा नहीं हो रही है। वह पहलू है अमेरिका या ज्यादा बेहतर कहें तो अमरीकी साम्राज्यवादियों का व्यवहार। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादियों को व्यापार के मामले में इस तरह के व्यवहार पर क्यों उतरना पड़ रहा है? क्यों वे केवल भारत ही नहीं, दुनिया के सभी देशों के साथ व्यापार के मामले में इस तरह की जोर जबर्दस्ती पर उतर रहे हैं?
    
यह सवाल बहुत वाजिब है। अमेरिका यानी संयुक्त राज्य अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत है। दुनिया के सकल उत्पाद का एक चौथाई अमेरिका से आता है। विज्ञान-तकनीक के मामले में भी वह सबसे अग्रणी देश है, खासकर आधुनिकतम तकनीक के मामले में। ऐसे में उसे व्यापार के मामले में दुनिया के दूसरे देशों की बाहें क्यों मरोड़नी पड़ रही हैं? क्यों वह बाजार की प्रतियोगिता के जरिये ही अपना काम नहीं चला पा रहा है? 
    
इतिहास में अभी तक यही रहा है कि ज्यादा विकसित पूंजीवादी देश अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मामले में मुक्त व्यापार के समर्थक रहे हैं जबकि पिछड़े देश संरक्षण के। उन्नीसवीं सदी में तब का सबसे विकसित देश इंग्लैण्ड मुक्त व्यापार का समर्थक था जबकि जर्मनी, सं.रा.अमेरिका इत्यादि संरक्षणवादी नीतियां अपना रहे थे जिससे अपने घरेलू उद्योगों को इंग्लैण्ड के ज्यादा सस्ते और अच्छे मालों से बचा सकें। इतिहास में यही रहा है कि औद्योगिक विकास के रास्ते पर आगे बढ़ते देशों ने संरक्षणवादी कदमों से अपने घरेलू उद्योगों की रक्षा की जबकि ज्यादा विकसित देशों ने मुक्त व्यापार का नारा बुलंद कर उन बाजारों में घुसपैठ करने का प्रयास किया। उन्नीसवीं सदी के सबसे विकसित पूंजीवादी देश के अर्थशास्त्रियों ने तो मुक्त व्यापार को सिद्धांत का दर्जा दे दिया। उन्होंने कहा कि दुनिया के सभी देशों के लिए सबसे अच्छा यही होगा कि दुनिया में मुक्त व्यापार हो। इससे जो देश जिस माल के उत्पादन में सबसे बेहतर स्थिति में होंगे उसका बाकियों को निर्यात करेंगे। अन्य मालों का वे आयात कर लेंगे। इस सिद्धान्त का तब व्यावहारिक मतलब यह था कि इंग्लैण्ड सारी दुनिया को औद्योगिक मालों का निर्यात करता जबकि बाकी देश इंग्लैण्ड को कच्चे मालों और कृषि उत्पादों का। यह स्थिति हमेशा बनी रहती। इंग्लैण्ड औद्योगिक देश बना रहता जबकि बाकी देश पिछड़े व कृषि प्रधान। स्वभावतः ही बाकी देशों को इंग्लैण्ड का यह मुक्त व्यापार का सिद्धान्त स्वीकार नहीं था और उन्होंने इसके बदले संरक्षणवादी नीतियां अपनाईं जिससे वहां औद्योगिक विकास हो सके। 
    
बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में यह सब नये सिरे से दोहराया गया। बस अब मसला पश्चिम के देशों के बीच का नहीं बल्कि पश्चिमी देशों और बाकी देशों के बीच का बन गया। नये-नये आजाद हो रहे देशों ने अपने औद्योगिक विकास के लिए संरक्षणवादी नीतियां अपनाईं जबकि साम्राज्यवादी देशों ने उन्हें मुक्त व्यापार का पाठ पढ़ाया। इतना ही नहीं, संरक्षणवादी नीतियों में सेंध लगाने के लिए उन्होंने हर संभव प्रयास किये। अभी हाल तक अमरीकी साम्राज्यवादी यह करते रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन के तहत अमेरिका और अन्य साम्राज्यवादी देशों की मूल दिशा यही थी यानी मुक्त व्यापार के नाम पर पिछड़े पूंजीवादी देशों के बाजारों को खुलवाना और उन्हें अपने मालों से पाटना। 
    
पर अब अमेरिकी साम्राज्यवादी इसका उल्टा कर रहे हैं। अब वे मुक्त व्यापार का राग भूलकर धौंस-पट्टी के जरिये अपने निर्यात को बढ़ाना तथा आयात को घटाना चाहते हैं। वे अपने यहां आयात पर भारी तटकर लगा रहे हैं जबकि अपने निर्यात पर दूसरे देशों का तटकर घटवाकर शून्य तक पहुंचा रहे हैं। यानी अब संरक्षण अमरीकी बाजार को चाहिए जबकि पिछड़े देशों के बाजार को अमरीकी मालों के लिए पूरी तरह खुला होना चाहिए। आखिर अमरीकी साम्राज्यवादी यह उलटी ंगंगा क्यों बहा रहे हैं? 
    
इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना होगा। दोनों विश्व युद्धों के दौरान साम्राज्यवादी देशों के बीच एक तीखा व्यापार युद्ध छिड़ा था। खासकर 1929 से छाई महामंदी से उबरने के लिए हर देश ने अपना माल दूसरे बाजार में झोंकने की कोशिश की। इसके लिए मुद्राओं का अवमूल्यन भी किया गया जिससे विदेशी बाजार में माल सस्ता हो सके। 
    
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों ने जो नयी व्यवस्था कायम की उसमें इस तरह के व्यापार युद्ध से बचने का भी प्रावधान किया गया। इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन का प्रस्ताव किया गया जिसे व्यापार से संबंधित सारे मामलों को देखना था। लेकिन ब्रेटनवुड्स सम्मेलन में तय चार अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में यही संस्था थी जो अस्तित्व में नहीं आ सकी। अन्य तीन- संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक- स्थापित हो गये। 
    
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन के अस्तित्व में न आने की वजह ये ही अमेरिकी साम्राज्यवादी थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सं.रा.अमेरिका सबसे बड़ी पूंजीवादी ताकत के रूप में उभरा था। जहां बाकी साम्राज्यवादी देश युद्ध से तबाह हो गये थे वहीं अमेरिका न केवल युद्ध से तबाह नहीं हुआ था बल्कि उसने इससे फायदा भी उठाया था। युद्ध इसकी मुख्य भूमि पर लड़ा ही नहीं गया था जबकि इसने इंग्लैण्ड, फ्रांस इत्यादि को युद्ध के साजो-सामान की आपूर्ति की थी। अब पूंजीवादी दुनिया में अमेरिका की वही स्थिति थी जो एक सदी पहले इंग्लैण्ड की थी। दुनिया का लगभग आधा औद्योगिक उत्पादन वहां हो रहा था। 
    
ऐसी स्थिति में अमेरिकी साम्राज्यवादी अपने को किसी बंधन में बांधने को तैयार नहीं थे। वे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन के ढीले-ढाले प्रस्तावों को भी स्वीकारने करने को तैयार नहीं थे। उनकी वजह से ही अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन स्थापित नहीं हो सका। इसके बदले गैट (जनरल एग्रीमेंट आन टैरिफ एण्ड ट्रेड यानी व्यापार और तटकर पर आम समझौता) अस्तित्व में आया। यह कोई स्थायी संस्था नहीं थी बल्कि समय-समय पर होने वाला समझौता मात्र था। इन समझौतों को चक्र का नाम दिया गया। 
    
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन के तहत कायम हुई व्यवस्था करीब तीन दशकों तक चली पर 1970 के दशक से इसकी सीमाएं उजागर हो गयीं। अब साम्राज्यवादी देश इसे त्यागकर एक नयी दिशा- उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण की दिशा- में चल पड़े। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के मामले में भी साम्राज्यवादी देशों ने एक नयी दिशा पकड़ ली। उन्होंने गैट की आठवें चक्र की वार्ता, जो उरुग्वे में शुरू हुई थी और जिस कारण उसे उरुग्वे चक्र भी कहा जाता है, को एकदम नया स्वरूप दे दिया। उन्होंने कुतर्क के जरिये विदेशी पूंजी निवेश को भी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से जोड़ दिया और तथाकथित मुक्त व्यापार सहित पूंजी के बेलगाम प्रवाह को भी नयी व्यवस्था का हिस्सा बना लिया। इसका मुख्य निशाना गैर-साम्राज्यवादी देशों के बाजार थे जिन्हें पूंजी निवेश और माल के लिए खोला जाना था। अब पहले त्याग दिये गये अंतर्राष्ट्रीय व्यापार संगठन को पुनजीर्वित किया गया तथा उसे विश्व व्यापार संगठन का नाम दिया गया। यह संगठन 1 जनवरी, 1995 को अस्तित्व में आया। 
    
विश्व व्यापार संगठन में अमरीकी साम्राज्यवादियों का दबदबा था। पिछड़े देशों के मुकाबले बाकी साम्राज्यवादी देश भी फायदे की स्थिति में थे। पिछड़े देशों के बाजार में इन्हें पहले के मुकाबले काफी पैठ हासिल हो गयी थी। 
    
इतना कुछ हासिल करने के बाद भी साम्राज्यवादियों की भूख शांत नहीं हुई थी। बल्कि कहें तो भूख बढ़ गयी थी। इसीलिए कुछ साल बाद ही बाजारों में और ज्यादा पैठ बनाने के लिए दोहा चक्र की वार्ता शुरू हुई। इस चक्र में निशाना पिछड़े देशों के वे बाजार थे जिन्हें पहले कुछ छूट मिल गई थीं- खासकर कृषि क्षेत्र। लेकिन काफी प्रयासों के बाद भी दोहा चक्र की वार्ताएं किसी नतीजे तक नहीं पहुंची। इसकी मुख्य वजह खुद साम्राज्यवादी देशों के आपसी अंतर्विरोध थे। 
    
साम्राज्यवादी देश स्वयं अपने यहां के कृषि क्षेत्र को दांव पर लगाने को तैयार नहीं थे। न तो वे इस क्षेत्र को खोलना चाहते थे और न ही अपने किसानों को दी जा रही सरकारी सहायता को कम करना चाहते थे। इससे उनकी आपसी सहमति बन पाना मुश्किल हो गया। इसी के साथ चीन, भारत, ब्राजील जैसे बड़े लेकिन पिछड़े देशों ने भी गठजोड़ कायम कर नये प्रस्तावों का विरोध किया। इन सबके फलस्वरूप दोहा चक्र अधर में लटक गया। जो कुछ सहमतियां बनी भी उनका व्यवहार में उतरना टलता रहा। 
    
इस बीच चीन के तेज उभार ने तथा बाद में उसके एक साम्राज्यवादी देश के रूप में घुसपैठ ने सारे मामले को उलट-पुलट दिया। चीन 2001 में विश्व व्यापार संगठन में शामिल हुआ था और जल्दी ही वैश्विक मूल्य श्रृंखला के केन्द्र में आ गया। साम्राज्यवादी देशों की कंपनियों ने सस्ते माल उत्पादन के लिए उसे अपना आधार क्षेत्र बना लिया था। चीन ने इसे इस्तेमाल करते हुए आगे छलांग लगाई और जल्दी ही स्वयं इन कंपनियों को टक्कर देने लगा। 
    
चीजें अपने विपरीत में बदल जाती हैं। साम्राज्यवादियों ने उदारीकरण-निजीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां अपनी पूंजी के हित में सारी दुनिया पर थोपी थीं। उन्होंने विश्व व्यापार संगठन के तहत इन नीतियों को संस्थाबद्ध किया था। इसी का एक उत्पाद था वैश्विक मूल्य श्रृंखला का निर्माण जिसके जरिये साम्राज्यवादी पूंजी सब जगह से कच्चे माल व सस्ते श्रम का फायदा उठाकर अपना मुनाफा बढ़ा रही थी। लेकिन इसके तहत साम्राज्यवादी देशों में किसी हद तक विऔद्योगीकरण भी हो रहा था क्योंकि कई सारे उद्योग (खासकर भारी उद्योग और श्रम सघन उद्योग) पिछड़े पूंजीवादी देशों में स्थानांतरित किये जा रहे थे। शुरू में तो इस विऔद्योगीकरण का बहुत खराब परिणाम नहीं दिखा पर समय गुजरने के साथ यह नजर आने लगा। चीन के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा इसमें से एक था। 
    
भारी उद्योगों और श्रम सघन उद्योगों के स्थानांतरित हो जाने के कारण साम्राज्यवादी देशों में बेरोजगारी की समस्या गहरानी ही थी। इसकी वैश्विक मूल्य श्रृंखला के तहत आयात होने वाले सस्ते माल से भरपाई नहीं की जा सकती थी। बेरोजगार व्यक्ति के लिए बाजार में सस्ते माल की मौजूदगी बहुत मायने नहीं रखती। 
    
रही-सही कसर तब पूरी हो गयी जब चीन ने पूंजी निवेश और खासकर माल निर्यात के मामले में साम्राज्यवादी देशों को टक्कर देनी शुरू की। अब वह केवल निम्न गुणवत्ता के सस्ते मालों का निर्यातक नहीं रह गया था। बल्कि चीनी कंपनियां उच्च गुणवत्ता के माल से साम्राज्यवादी देशों में पैठ बनाने लगीं। विद्युत कारों के मामले में चीनी कंपनी बी वाई डी ने एलन मस्क की टेस्ला को पछाड़ दिया जबकि 5-जी तकनीक के यंत्रों के मामले में हुवेई ने अमरीकी कंपनियों को। यही चीज क्रमशः अन्य क्षेत्रों में भी दीखने लगी। 
    
ऐसे में साम्राज्यवादियों, खासकर अमेरिकी साम्राज्यवादियों का बदहवास हो उठना स्वाभाविक था। विश्व व्यापार संगठन पहले ही दोहा चक्र की वार्ताओं की असफलता के जरिये अपंगता की स्थिति में पहुंच रहा था। अब अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने उसे निष्क्रियता की स्थिति में धकेल दिया। विवादों के निपटारे वाला उसका ट्रिब्यूनल कई सालों से निष्क्रिय है क्योंकि उसमें नियुक्ति ही नहीं की जा रही है। इस निष्क्रियता के कारण विश्व व्यापार संगठन के प्रावधानों का उल्लंघन आम बात होने लगी। एक के बाद दूसरे देश इसका उल्लंघन करने लगे। अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस उल्लंघन को एकदम नये स्तर पर पहुंचा दिया है। उन्होंने अब अमेरिका के साथ बाकी देशों के व्यापार को दो देशों का द्विपक्षीय मामला बना दिया है। विश्व व्यापार संगठन व्यावहारिक तौर पर अप्रासंगिक हो गया है। 
    
ट्रम्प के नेतृत्व में अमेरिकी साम्राज्यवादियों का यह व्यवहार उनकी कमजोरी का सबसे बड़ा प्रमाण है। अमेरिका आज भी दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है। विज्ञान-तकनीक में भी वह अग्रणी है। पर उसे अब विश्वास नहीं रह गया है कि वह मुक्त प्रतियोगिता के जरिये अपनी वरीयता बनाये रख सकेगा। यही नहीं, उसे यह भी विश्वास नहीं है कि वह विश्व व्यापार संगठन के तहत अपनी वरीयता बनाये रख सकेगा। दुनिया में अपनी वरीयता बनाये रखने के लिए उसे अब धौंस-पट्टी पर उतरना पड़ रहा है। चीनी टक्कर से निपटने के लिए उसे प्रशासनिक उपायों का सहारा लेना पड़ रहा है। फर्जी बहाने से हुवेई पर प्रतिबंध इसका प्रमाण है। यहां तक कि उसे सैनिक उपायों का भी सहारा लेना पड़ रहा है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति का अपहरण लैटिन अमेरिका में चीनी पूंजी और मालों की पैठ को रोकने की एक बदहवास कोशिश है। 
    
दुनिया की सर्वप्रमुख साम्राज्यवादी ताकत का मुक्त प्रतियोगिता छोड़कर इस तरह की धौंस पट्टी पर उतरना हताशा भरी कोशिश तो है पर यह उसके दूरगामी पराभव को नहीं रोक सकती। बल्कि वक्ती सफलता के साथ ही वह उस पराभव को और तेज कर देगी। पुरानी कहावत के अनुसार अमेरिकी साम्राज्यवादी हर लड़ाई जीतने के बावजूद युद्ध हार जायेंगे। बल्कि वे युद्ध इसलिए हार जायेंगे क्योंकि वे इस समय हर लड़ाई जीत रहे हैं। चीनी साम्राज्यवादी उन्हें हर लड़ाई जीतने दे रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अंतिम परिणाम उनके हक में होगा। वक्त ही बतायेगा कि क्या उनकी यह रणनीति सही थी। 

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