बंगाल: हिंसा-तांडव से नई प्रयोगशाला बनाते संघी

Published
Thu, 07/16/2026 - 08:52
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पश्चिम बंगाल में जबसे भाजपा सत्तासीन हुई है उसने हिंसा-तांडव का जो नंगा नाच शुरू किया है उसके आगे तृणमूल शासन व माकपा शासन की सारी गुण्डागर्दी छोटी पड़ गयी है। संघ-भाजपा अपने फासीवादी तांडव से बंगाल को संघ की नयी प्रयोगशाला बनाने पर उतारू है। इस प्रयोगशाला में भीड़ की हिंसा, बुलडोजर राज और मुठभेड़ में हत्या सभी का इस्तेमाल किया जा रहा है। अभी भले ही निशाने पर तृणमूल के नेता, मुसलमान अधिक नजर आ रहे हैं पर वास्तव में इनके निशाने पर हर वो इंसान है जो संघ-भाजपा से अलग सोच रखता है। 
    
बंगाल भारत के उन कुछेक राज्यों में है जहां पूंजीवादी राजनैतिक पार्टियां भी परस्पर हिंसा व मारकाट में लिप्त रही हैं। जहां राजनैतिक दल भी एक हद तक हथियारबंद रहे हैं। ऐेसे में जब बंगाल चुनाव में सारी तीन तिकड़म से भाजपा सत्तासीन हुई तो शुरूआती कुछ दिन हिंसामय रहे तो लोगों को लगा कि भाजपाई तृणमूल के लंपटों से जमीनी स्तर पर सत्ता हथिया रहे हैं। पर जब ये हिंसा-तांडव लगातार जारी रहा तब यह स्पष्ट हुआ कि मामला महज जमीनी स्तर पर सत्ता हथियाने का नहीं है; यह मामला संघी संगठनों-लम्पट वाहिनी के एक ऐसे फासीवादी वर्चस्व को स्थापित करने का है जिसके खिलाफ कोई जुबान खोलने की हिम्मत न कर सके। 
    
इस सबमें भाजपाई तब अधिक जोश से भर गये जब उन्हें तृणमूल कांग्रेस में भारी विभाजन कराने में सफलता मिल गयी। लगभग तीन चैथाई तृणमूल कांग्रेस के विधायकों-सांसदों ने संघ-भाजपा के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। इस तरह इनके फासीवादी तांडव का विरोध करने वाली कोई बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं रही। ऐसे में ये जबरन अपने प्रतीकों को स्थापित करने और दूसरे धार्मिक प्रतीकों पर हमला बोलने लगे। अब इन्हें हिन्दू आबादी को सहमत करके अपने साथ नहीं लाना था बल्कि लोगों के दिलों में डर-भय बैठाकर साथ खड़ा करना था। इस सबके लिए पुलिस इनके साथ खड़ी थी तो बुलडोजर कुछ भी ढहाने को तैयार था। इन हालातों में आम बंगाली जन इस बात का अफसोस करने से अधिक कुछ नहीं कर सकता था कि उसने किन दुष्टों को सत्ता में पहुंचा दिया। 
    
हालत यह हो गयी कि एक लड़की से बलात्कार पर जब भीड़ सड़कों पर उतरी तो उसने एक युवक की पीट-पीट कर हत्या कर दी। न्याय के नाम पर घटना के एक आरोपी युवक की पुलिस ने फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी। कयास लगाया जा रहा है कि इस कृत्य को असली दोषी भाजपा-संघ से जुड़े लोगों को बचाने के लिए किया गया। इससे आगे बढ़कर बुलडोजर मुस्लिम बस्तियों के साथ बाजारों-दुकानों को रौंदने लगा। मस्जिदें व चर्च तोड़ी जाने लगीं या उन पर भगवा लहराया जाने लगा। पुलिस संघी लम्पट भीड़ को रोकने के बजाय मूकदर्शक बन गयी। तृणमूल नेताओं के घरों पर अंडे फेंके जाने लगे। पुलिस विपक्षी सांसदों तक को बचाने के लायक नहीं बची। मछली खाकर चुनाव प्रचार करने वाले संघी अब मिड डे मील से अंडा तक प्रतिबंधित करने लगे। मुसलमान मीट कारोबारियों की दुकानों पर हमला बोला जाने लगा। 
    
तृणमूल की सत्ता के खिलाफ ‘पहले राम फिर वाम’ का नारा देने वाले संसदीय वामपंथी भी अब संघी तांडव के आगे अफसोस करने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं। पहले ये इसलिए खुश थे कि इन्होंने तृणमूल के कब्जे वाले अपने कई दफ्तर मुक्त करा लिए थे। पर जब संघी हिंसा लेनिन की मूर्ति ढहाने, लाल झण्डा जलाने तक जा पहुंची तो इन्हें समझ में आया कि छोटे नाग की जगह सत्ता पर बड़े नाग काबिज हो चुके हैं। अब हालत यह है कि फासीवादी ताकतों की सरकार सामान्य विरोध प्रदर्शन तक को बेरहमी से कुचल रही है। वह अपने खिलाफ एक शब्द भी सुनने को तैयार नहीं है। सड़कों-कालेजों हर जगह विरोधी लोग पीटे जा रहे हैं। कुल मिलाकर संघ-भाजपा बंगाल को अपनी नयी उन्नत प्रयोगशाला बनाने पर उतारू हैं। वे विरोध की हर आवाज को कुचलने पर उतारू हैं। शुवेन्दु दरअसल योगी और हेमंत विस्वा सरमा से प्रतियोगिता कर कुछ महीनों में ही उन्हें पछाड़ना चाहता है। बांग्लादेश वापस भेजने के लिए संदिग्ध बांग्लादेशी नागरिकों के लिए 11 हिरासत केन्द्र, इमारतों-सड़कों के नाम बदलने की कवायद कर शुवेन्दु अधिकारी संघ की पहली पसंद बनने की तीखी होड़ में उतर चुके हैं।
    
इन फासीवादी हालातों में बंगाल के आम जन का शीघ्र ही संघ-भाजपा के तांडव से मोहभंग पैदा होगा और वह इनके द्वारा कायम किये जा रहे डर-दहशत के माहौल का मुकाबला करने सड़कों पर उतरने की ओर बढ़ेगी। इनकी सत्ता का क्रूर दमन भी जनता के बढ़ते कदमों को रोक नहीं पायेगा। 

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