बंगाल जीतने की हिन्दू फासीवादियों की घृणित कवायद

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
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पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का सफाया करने का जाल हिंदू फासीवादियों ने चुनाव आयोग के जरिए नग्न और षड्यंत्रकारी तरीके से बुना है। चुनाव आयोग द्वारा संचालित विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) ने चुनावी लोकतंत्र को बिल्कुल खोखला बना देने में कोई कोर कसर यहां शेष नहीं रखी है।
    
पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा संचालित विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) हिंदू फासीवादी शक्तियों की उस घृणित कवायद का जीवंत प्रमाण है जिसके तहत संवैधानिक संस्थाओं को इन्होंने अपने औजार में बदल दिया है। यहां तृणमूल कांग्रेस के परंपरागत मतदाता आधार को नेस्तनाबूद करने का प्रयास चुनाव आयोग के जरिए किया गया।
    
बंगाल में एसआईआर की प्रक्रिया के पश्चात प्रकाशित प्रारूप मतदाता सूची में प्रथम चरण के रूप में अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत एवं डुप्लीकेट (एएसडीडी) श्रेणी के अंतर्गत लगभग 58 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए, जिसमें फार्म-7 के माध्यम से अतिरिक्त 5,46,053 मतदाताओं का विलोपन भी सम्मिलित था। इसके पश्चात अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की गई, जिसमें विलोपन का कुल आंकड़ा बढ़कर 63 लाख से अधिक हो गया, और अंततः 7 अप्रैल को चुनाव आयोग द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार राज्य की कुल लगभग 7.66 करोड़ की मतदाता सूची से 90.82 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए, जो कुल मतदाताओं का लगभग 12 प्रतिशत है।
    
यहां 63 लाख हटाए गए मतदाताओं के बाद तकरीबन 60 लाख मतदाता अनिर्णीत मतदाता सूची में डाल दिए गए थे। ऐसा कैसे सम्भव हुआ? यह सीधे-सीधे चुनाव आयोग और हिंदू राष्ट्रवादियों के षड्यंत्र से हुआ। यहां ई आर ओ के कम होने आदि आदि का तर्क देकर एस आर ओ और माइक्रोआब्जर्वर तैनात किए गए। यह सीधे केंद्र सरकार की ओर से चुनाव आयोग द्वारा तय किए गए। यहां विशेष गहन पुनरीक्षण के नियमों को ठंडे बस्ते में डालकर इन्हें ठेंगे पर रखकर 8100 एस आर ओ और माइक्रोआब्जर्वर तैनात किए गए और इन्हें ई आर ओ के ऊपर अधिकार दिए गए। यानी कि अब किसे प्रारूप मतदाता सूची से हटाना है किसे मतदाता बनाना है, अब ई आर ओ नहीं बल्कि मोदी सरकार के इन एजेंट को तय करना था। 
    
इस प्रशासनिक अनियमितता के साथ-साथ ईसीआई नेट पोर्टल में भी गंभीर तकनीकी हेराफेरी के प्रमाण मिले हैं। डोला सेन ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि अधिकारी ईसीआईनेट पोर्टल में उन स्थानों से लागिन कर रहे थे जहां वे वास्तव में तैनात नहीं थे, और पोर्टल पर अपलोड किए गए दस्तावेज कुछ समय पश्चात ‘‘धुंधले’’ हो जाते थे, जिससे साक्ष्य नष्ट हो जाते थे। सर्वाधिक गंभीर आरोप यह था कि 14 फरवरी 2026 के पश्चात पोर्टल से ईआरओ और एईआरओ के लिए दस्तावेज अपलोड करने का विकल्प ही हटा दिया गया था, जिससे इन वैधानिक प्राधिकारियों की कार्य करने की क्षमता ही समाप्त हो गई। सेन ने इस आशय के कथित स्क्रीनशाट भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए।
    
हिंदू फासीवादियों द्वारा ऐसा करने की बुनियादी वजह यही थी कि एस आई आर की प्रथम प्रकाशित प्रारूप सूची में 58 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाने के बावजूद हिंदू फासीवादी  बंगाल चुनाव को जीतने के मकसद में कामयाब नहीं हो सकते थे। जो मतदाता कम हुए औसतन अधिकतर भाजपा के मतदाता मसौदा सूची से हटे हुए पाए गए। टी एम सी ने एस आई आर की प्रक्रिया में हिंदू फासीवादियों को मात दे दी थी।
    
इस स्थिति में हिंदू फासीवादियों को फासीवादी तृणमूल कांग्रेस से पार पाना जरूरी था। यह एस आर ओ, और माइक्रोआब्जर्वर के बलबूते किया गया। इनके द्वारा सर्वाधिक विवादास्पद और षड्यंत्रकारी पहलू ‘‘तार्किक विसंगति’’ (लाजिकल डिस्क्रिपेंसी) नामक एक विशिष्ट श्रेणी गढ़ी गई। ‘‘तार्किक विसंगति’’ के अंतर्गत सात प्रकार की विसंगतियों को परिभाषित किया गया, जिनमें छह से अधिक संतानों वाले मतदाता, माता-पिता के साथ 15 वर्ष से कम या 50 वर्ष से अधिक का आयु अंतर, दादा-दादी के साथ 40 वर्ष से कम का आयु अंतर, 45 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों का 2002 की सूची में अनुपस्थित होना, 2002 और 2005 की सूचियों के बीच पिता के नाम में असंगति, तथा 2002 की सूची के साथ लिंग असंगति जैसे मामले शामिल थे। इन्हीं अत्यधिक तकनीकी एवं पुरातन अभिलेखों पर आधारित श्रेणियों के माध्यम से लगभग 60.06 लाख मतदाताओं को संदेह के घेरे में लेकर ‘‘अधिनिर्णयाधीन’’ (अंडर एडजुडिकेशन) या अनिर्णीत श्रेणी में डाल दिया गया।
    
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। कोर्ट ने एस आई आर की प्रक्रिया की मनमानी पर कोई सवाल नहीं खड़े किए। इसे रद्द नहीं किया गया। लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों की तैनाती का आदेश दिया ताकि इन विसंगति वाले मतदाताओं को जांच की जा सके। इस जांच के पश्चात 32 लाख लोगों के नाम अंतिम मतदाता सूची में आ गये। जबकि 27 लाख फिर भी अनिर्णीत की स्थिति में रहे। अब इधर मतदाता सूची फ्रीज कर दी गई है यानी इसमें कोई जुड़ाव अब नहीं हो सकता है। इस तरह बड़े पैमाने पर विपक्ष के मतदाताओं को अलग-अलग तरीके से हटाकर चुनाव आयोग ने मोदी सरकार के लिए बंगाल का रास्ता फतह करने की घृणित कोशिश की है। 
    
यदि कुल हटाए गए मतदाताओं के हिसाब से देखा जाय तो सात अल्पसंख्यक बहुल जिलों- मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, बीरभूमि, नदिया, तथा उत्तर एवं दक्षिण 24 परगना- से कुल 46,83,583 मतदाताओं के नाम हटाए गए, जो कुल विलोपन का 51.5 प्रतिशत से अधिक है। इसी प्रकार मालदा जिले में 4,59,530 और अधिनिर्णय के तहत 2,39,375 मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिससे जिले की मतदाता संख्या 31,99,531 से घटकर 27,46,733 रह गई। बांग्लादेश सीमा से लगे 10 जिलों- कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, उत्तर एवं दक्षिण दिनाजपुर, मालदा, मुर्शिदाबाद, नदिया, तथा उत्तर एवं दक्षिण 24 परगना- से कुल 52.24 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए, जो कुल विलोपन का 57 प्रतिशत से अधिक हैं। इन सीमावर्ती जिलों में हटाए गए 70 प्रतिशत से अधिक मतदाता मुस्लिम समुदाय से संबंधित थे। इस तरह बड़े पैमाने पर प्रतिशत के लिहाज से मुस्लिमों का नाम बहुतायत में मतदाता सूची से गायब कर दिया गया है।
    
चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया हेतु केवल पश्चिम बंगाल में ही 8,100 केन्द्रीय सरकारी कर्मचारियों को माइक्रो-आब्जर्वर के रूप में तैनात किया, जो अन्य किसी राज्य या केन्द्र शासित प्रदेश में नहीं किया गया। यद्यपि चुनाव आयोग ने 4 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत अपने शपथ-पत्र में यह स्पष्ट किया था कि माइक्रो-आब्जर्वर की भूमिका ‘‘पूर्णतः सहायक’’ है और मतदाता की पात्रता स्वीकार या अस्वीकार करने का वैधानिक अधिकार केवल ईआरओ के पास है, तथापि तृणमूल कांग्रेस की सांसद डोला सेन ने 16 एवं 18 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत अपने आवेदनों में गंभीर आरोप लगाए कि माइक्रो-आब्जर्वर ईआरओ और एईआरओ द्वारा लिए गए निर्णयों की पुनः समीक्षा कर रहे थे और उन्हें पलट रहे थे, जो सुप्रीम कोर्ट के 9 फरवरी के आदेश का सीधा उल्लंघन था। सेन ने यह भी बताया कि केवल 9 से 11 फरवरी के बीच ही 7 लाख से अधिक मतदाताओं की माइक्रो-आब्जर्वरों द्वारा ‘‘पुनः समीक्षा’’ की गई, और ऐसे 13 विशिष्ट मामलों का उल्लेख किया गया जहां वैधानिक प्राधिकारियों द्वारा स्वीकृत मतदाताओं को माइक्रो-आब्जर्वरों द्वारा पुनः समीक्षा हेतु चिह्नित किया गया।
    
सुप्रीम कोर्ट ने खुलेआम बेशर्मी से यह सब हो जाने दिया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जायमाल्या बागची की पीठ ने मतदान के अधिकार को ‘‘लोकतांत्रिक भागीदारी और राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी अभिव्यक्तियों में से एक’’ बताते हुए भी लगभग 27 लाख मतदाताओं को बिना किसी अंतिम निर्णय के मतदान से वंचित रहने दिया। न्यायालय ने तृणमूल कांग्रेस और पश्चिम बंगाल सरकार की उन याचिकाओं को भी ‘‘समयपूर्व’’ बताकर खारिज कर दिया, जिनमें मतदाता सूचियों को स्थिर करने के निर्णय को चुनौती दी गई थी। न्यायमूर्ति बागची ने यह चिंता अवश्य व्यक्त की कि यदि 15 प्रतिशत मतदाता मतदान से वंचित रह जाएं और जीत का अंतर 2 प्रतिशत हो, तो यह एक गंभीर लोकतांत्रिक संकट होगा, परंतु इस चिंता के बावजूद न्यायालय ने कोई ठोस हस्तक्षेप नहीं किया।
    
इस चुनावी षड्यंत्र के विरुद्ध तृणमूल कांग्रेस के पास चुनाव जीतने का एक ही तरीका बचा  है। यह है बंगाली राष्ट्रीयता को भावनाओं को उभारने का कार्ड खेलना। ‘‘बांग्ला निजेर मेये के चाय“ (बंगाल अपनी बेटी को चाहता है) के नारे के साथ बंगाली राष्ट्रवाद और लैंगिक समानता का दांव चला, तथा ‘‘बांग्लार वोट रक्षा’’ जैसे अभियानों के जरिए ममता बनर्जी यही कर रही हैं। 
    
कुल मिलाकर एस आई आर के तौर-तरीके, प्रक्रिया, नियम आदि के साथ-साथ मौजूदा पूंजीवादी लोकतंत्र अपनी मौत मर रहा है और इस चुनावी लोकतंत्र को खत्म करने वाले एकाधिकारी पूंजी के मालिक और इनकी हिंदू फासीवादी पार्टी है जो इस तरह से खुद अपने ‘जनता का जनता द्वारा जनता के लिए’ की आड़ में छुपी हुई पूंजीवादी तानाशाही को नग्न तरीके से बेनकाब कर रहे हैं। इसमें मजदूर वर्ग सहित जनता के लिए जनवाद की जो कमजोर स्थिति थी वह तो बार-बार दिखी ही मगर अब इसमें अन्य पूंजीवादी पार्टियों के लिए भी गुंजाइश खत्म होते जा रही है।
 

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