बस्ती बचाओ संघर्ष समिति के कार्यकर्ताओं पर लगे झूठे मुकदमों का अंत

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हल्द्वानी/ बनभूलपुरा बस्ती को रेलवे द्वारा अतिक्रमण बताए जाने के विरोध में कई स्तर पर संघर्ष चलता रहा है। इसमें ही बस्ती बचाओ संघर्ष समिति के जरिये इसे सामाजिक मुद्दा बनाते हुए धरना-प्रदर्शन आदि तरीकों से बस्तीवासियों का पक्ष समाज में रखा गया। जिसके खिलाफ रेलवे के पक्ष से पीआईएल लगाने वाले रवि शंकर जोशी के द्वारा चार कार्यकर्ताओं पर फर्जी मुकदमा दर्ज कराया गया। सिविल न्यायालय, हल्द्वानी में यह मामला चारों कार्यकर्ताओं के दोषमुक्त होने के साथ समाप्त हुआ।
    
यह मुकदमा बस्ती के पक्ष को समाज में ले जाने वाले प्रगतिशील महिला एकता केंद्र, क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, परिवर्तनकामी छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं पर लगाया गया। मुकदमे के जरिये यह कोशिश की गई कि सामाजिक कार्यकर्ताओं को ‘आपराधिक प्रवृत्ति’ का प्रचारित कर संघर्ष को बदनाम किया जा सके। और इस तरह बनभूलपुरा की मेहनतकश जनता के अपनी बस्ती बचाने के हर प्रयास को समाज में गलत साबित किया जा सके।
    
रवि शंकर जोशी ने 10 जुलाई 2022 को एफआईआर में आरोप लगाया कि चार कार्यकर्ताओं ने उसके घर में जबरन घुसकर धमकाया, उसके परिजनों और उसको डराया। कि उसे और उसके परिजनों को इनसे जान का खतरा है। इन आरोपों के बावजूद वह और उसके परिजन लगातार अपनी सामान्य गतिविधियां करते रहे। और समय ने दिखाया कि उसे या उसके परिजनों को न तो इन कार्यकर्ताओं से कोई खतरा था, न बनभूलपुरा की मेहनतकश जनता से। साफ हो गया कि उसके द्वारा दर्ज यह मुकदमा सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं के बनभूलपुरा बस्ती को बचाने के प्रयासों को समाज में कलंकित करने की कोशिश भर थी। यह पीड़ितों को ही समाज के सामने अपराधी बताने की घटिया चाल थी।
    
10 जून 2025 को सिविल न्यायालय ने चारों कार्यकर्ताओं को दोषमुक्त कर दिया। लेकिन तीन साल इस मुकदमे में संगठन और कार्यकर्ता उलझाए गए। इस पूरे दौर में बनभूलपुरा बस्ती की न्यायिक लड़ाई हाईकोर्ट से आगे बढ़कर सुप्रीम कोर्ट में उलझी हुई है। जिसमें नहीं पता है कि क्या नतीजा आएगा। तारीख पर तारीख का खेल चल रहा है।  
    
इसी तरह लगभग 8 वर्ष पहले 16 जुलाई 2017 को हल्द्वानी के बनभूलपुरा में रेलवे ट्रैक पर एक स्थानीय निवासी दर्जी की ट्रेन की चपेट में आने से मौत हो गई। इस दौरान उसके परिचित, बस्ती के अन्य लोग रेलवे ट्रैक के आसपास बॉडी को लेने के लिए एकत्र हो गये।
    
इस दौरान एकत्र हुए लोगों के ऊपर IPC (भारतीय दंड संहिता) की धारा 147 (दंगे करने (rioting) का अपराध), धारा 153 (दंगा भड़काने के इरादे से जानबूझकर उकसाने की कोशिश), धारा 341 (गलत तरीके से रोकने) और धारा 353 (लोक सेवक को उसके कर्तव्य के निर्वहन में बाधा डालने या उसे रोकने के लिए उस पर हमला करने या आपराधिक बल का प्रयोग करना) जैसी आपराधिक धाराएं लगा दी गईं। बस्ती के लोगों सहित इसमें क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन के केन्द्रीय कार्यकारिणी सदस्य टीकाराम और कार्यकर्ता नसीम भी थे। चार लोगों पर झूठे मुकदमे दर्ज कर दिए गए।
    
पिछले लगभग 8 साल से ये न्याय पसंद लोग अपने झूठे मुकदमों के खिलाफ लड़ रहे थे। 24 अप्रैल 2025 को कोर्ट ने कहा पुलिस ने गलत मुकदमा दर्ज कर दिया है। यह कहकर मुकदमा खारिज कर दिया। इन आठ सालों में ये लोग वकील, कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटते रहे। 
    
जनता की समस्याओं शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बिजली, पानी, आवास, उनके अधिकार आदि मामलों को जो भी उठाता है, उनके ऊपर पूंजीवादी सरकारों का यही रुख होता है। तात्कालिक तौर पर मामले को दबाने के लिए, उनका दमन कर उन पर झूठे मुकदमे दर्ज कर दिए जाते हैं। कई मामलों में लोग सालों साल झूठे मुकदमों में जेलों में सड़ने को मजबूर होते हैं। जिसमें वह अपने जीवन के बहुमूल्य दिनों को खो देते हैं।
    
बस्ती बचाओ संघर्ष समिति बनभूलपुरा के कार्यकर्ता दोनों मुकदमों से दोषमुक्त हुए लेकिन बस्ती अभी बस्तीवासियों की होना बाकी है। 
        -हल्द्वानी संवाददाता

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