बेल्जियम : कटौती कार्यक्रम के विरोध में हड़ताल

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बेल्जियम की एरिजोना सरकार मजदूर वर्ग पर नये हमले बोल रही है। एक ओर सरकार सैन्यीकरण पर खर्च बढ़ा रही है तो दूसरी ओर मजदूरों-कर्मचारियों के पेंशन, वेतन पर हमले के साथ सार्वजनिक सेवाओं पर खर्च में कटौती कर रही है। इस हमले के खिलाफ 24-25-26 नवम्बर को मजदूरों ने जगह-जगह हड़ताल कर-प्रदर्शन कर सरकार के प्रति अपने गुस्से का इजहार किया और उसे हमले रोकने की चेतावनी दी। 
    
इससे पूर्व अक्टूबर माह में इन्हीं हमलों के विरोध में लाखों लोगों ने ब्रुसेल्स मार्च आयोजित किया था। पर सरकार पीछे हटने को तैयार नहीं हुई। अंततः ट्रेड यूनियन फेडरेशन को हड़ताल का आह्वान करना पड़ा। मजदूरों के गुस्से की बड़ी वजह वेतन सूचकांकीकरण पर सीमा थोपना है। सरकार ने इस वर्ष के बजट में इसकी घोषणा की थी। वेतन सूचकांकीकरण वह व्यवस्था है जिसमें महंगाई के अनुरूप एक सूचकांक बढ़ता है और उसी अनुरूप मजदूरों का वेतन बढ़ता है। अब सरकार ने इस सूचकांक को बढ़ाने की सीमा तय कर दी है। इससे पेंशन पाने वालों व वेतन भोगियों की आय बढ़ना बंद हो जायेगी। लाखों कर्मचारी वे पेंशन भोगी इससे प्रभावित होंगे। 
    
सरकार इस कदम के लिए कम धन होने का हवाला दे रही है। एक ओर सरकार पर कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने को धन नहीं है दूसरी ओर सरकार यूरोप के सैन्यीकरण अभियान के तहत रक्षा क्षेत्र में निवेश बढ़ा रही है। 2018 में सरकार ने 34 लड़ाकू विमान खरीदे थे। अब वह 11 और एफ-35 लड़ाकू विमान खरीद रही है। इस तरह सरकार का धन की कमी का दावा महज एक झूठा बहाना है। 
    
ट्रेड यूनियनें अमीरों पर कर बढ़ाने, निगमों को दी जा रही सब्सिडी में कटौती कर सरकार से धन जुटाने की मांग कर रही हैं। 
    
सरकार न केवल कर्मचारियों के वेतन-भत्ते पर हमला बोल रही है बल्कि वह सामाजिक मदों में भी खर्च कटौती कर रही है। मजदूरों-कर्मचारियों को तमाम मदों में दी जा रही सब्सिडी छीनी जा रही है। 
    
इस हड़ताल में बेल्जियम के विभिन्न शहरों में जगह-जगह प्रदर्शन हुए और सरकार को अपने कटौती कार्यक्रमों को रोकने की चेतावनी दी गयी।
    
दरअसल ट्रेड यूनियनों में पूंजीवादी पार्टियों का प्रभाव ही उन्हें किसी वास्तविक जुझारू संघर्ष की ओर ले जाने में बड़ी बाधा है। ये पूंजीवादी पार्टियां कुछ रस्मी आह्वान से आगे बढ़ वास्तविक संघर्ष को तैयार नहीं हैं। इन आह्वानों से वे मजदूरों का गुस्सा भी सड़कों पर उतार लेती हैं और सरकारें अपनी मन का करने में भी सफल हो जाती हैं। मजदूरों को अपनी क्रांतिकारी यूनियनें कायम कर संघर्ष आगे बढ़ाना पड़ेगा तभी वे सरकार के हमलावर कदम रोक सकते हैं। 

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