सार्वजनिक/सरकारी संस्थाएंः निजीकरण और बेरोजगारी

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पिछले कुछ सालों से अक्सर ही देखने में आ रहा है कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते छात्रों की हताशा और निराशा उन्हें सड़कों पर उमड़ने को बाध्य कर दे रही है। इस हताशा और निराशा के कई कारण हैं। इसमें से मुख्य है- सरकारी या सार्वजनिक संस्थाओं में नौकरी की भर्ती के लिए या तो खाली पद (रिक्तियां) बेहद कम निकाले जाते हैं या फिर बेहद कम पद निकाले जाने के बावजूद परीक्षाएं काफी देर बाद आयोजित होती हैं। परीक्षा में सफल होने के बावजूद ज्वाइनिंग लेटर मिलने में लंबा वक्त गुजर जाता है या परीक्षा पेपर लीक की भेंट चढ़ जाती है और इस तरह सरकारी नौकरी पाने की उम्मीद सालों साल के लिए लटक जाती है। कुछ होते हैं जो मुश्किल से नौकरी हासिल कर पाते हैं।
    
आखिर सरकारी नौकरियों के लिए आकर्षण स्वाभाविक है। इसके लिए सोचना, तैयारी करना कहीं से भी गलत नहीं। कोई भी किसी रोजगार में पल-पल असुरक्षा, अपमान, किसी भी पल नौकरी से बाहर किए जाने के डर और ठीक वेतन के लिए तरसने को मजबूर क्यों हो! बुढ़ापे में जब शरीर जवाब दे जाये तब कोई क्यों किसी और के आगे हाथ फैलाने को मजबूर हो। इसलिए सरकारी रोजगार आम तौर हर बेरोजगार युवा का ख्वाब है। 
    
एक दौर और जमाना था जब रोजगार का सवाल व्यक्तिगत मामला नहीं माना जाता था। रोजगार के सवाल को सामाजिक मामला माना जाता था। रोजगार उपलब्ध ना होना आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था का दोष माना जाता था। आज जमाना दूसरा है। आज के लंपट शासक वर्ग इसे व्यक्तिगत मामला बना रहे हैं और बेरोजगारी के लिए आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था को नहीं बल्कि व्यक्ति को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। व्यक्ति को इसके लिए जिम्मेदार ठहराकर अपनी जवाबदेही और जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ ले रहे हैं।
    
तब सोवियत संघ जैसे समाजवादी देश में जहां हर नागरिक को रोजगार उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी थी, गारंटी थी; रोजगार पाना हर नागरिक का मौलिक अधिकार था; यहां बेरोजगारी कुछ सालों में ही खत्म कर दी गई। इस सबने पूंजीवादी आर्थिक-समाजिक व्यवस्था को खत्म करके समाजवादी अर्थव्यवस्था के निर्माण की प्रेरणा दुनिया की आम जनता को दी थी। इसी के प्रभाव में पूंजीवादी देशों में भी सरकारें रोजगार के सवाल से आज की तरह पल्ला नहीं झाड़ सकती थीं।
    
इस दौर में भारत जैसे देश भी थे जहां आजाद भारत में नेहरू के समाजवाद के नाम पर बेहद कमजोर कल्याणकारी पूंजीवादी राज्य खड़ा किया गया। इन्होंने रोजगार देने की सरकार की जिम्मेदारी केवल नैतिक तौर पर घोषित की; नीति निर्देशक तत्वों के हिस्से में डालकर। जिसे कोर्ट में चुनौती देकर सरकार को रोजगार देने को बाध्य नहीं किया जा सकता था। हां! यह जरूर हुआ कि जब बड़ी पूंजी के और पूंजीवादी विकास के लिए सार्वजनिक उपक्रम खड़े किए गए। सरकारी विभाग खड़े किए गए। तब इनमें कुछ आम नागरिकों को रोजगार भी मिला। हालांकि यहां भी कई जगह सुरक्षित और स्थाई रोजगार के लिए कामगारों को जुझारू संघर्ष करना पड़ा, जैसे रेलवे।
    
इस तरह सरकार तब रोजगार देने वाली सबसे बड़ी नियोक्ता बन गई। यह रोजगार ज्यादा सुरक्षित, स्थाई प्रकृति का था। यहां आम तौर पर अपमान, लांछन, किसी भी समय काम से निकाले जाने की भयानक असुरक्षा नहीं थी। 
    
आंकड़े बताते हैं कि पिछली सदी के नब्बे के दशक (1995-97) तक तकरीबन 1 करोड़ 95 लाख लोग सभी सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी संस्थानों में कार्यरत थे। तब निजी क्षेत्र में संगठित रोजगार 86 लाख था। इस तरह कुल 2.81 करोड़ संगठित रोजगार था। निजी संगठित क्षेत्र में भी एक हद तक श्रम कानून लागू हो जाते थे हालांकि यह संगठित रोजगार कुल रोजगार का केवल 7 प्रतिशत था जबकि अधिकांश 93 फीसदी कामगार अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य कर रहे थे।
    
90 के दशक में निजीकरण, उदारीकरण और वैश्वीकरण की नीतियां जब देश की एकाधिकारी पूंजी के हितों के अनुरूप लागू की गई। तब पाया यह गया कि संगठित क्षेत्र के रोजगार का आकार सिकुड़ने लगा है विशेषकर सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्रों में। एक ओर सार्वजनिक संस्थाओं और सरकारी विभागों में निजी क्षेत्र के बड़े खिलाड़ियों की घुसपैठ की गई तो दूसरी ओर सरकारी पदों पर भर्तियों की रफ्तार कम भी कर दी गई या जबरन लोगों को बाहर किए जाने की स्कीम बनने लगी जैसे स्वैच्छिक (अनिवार्य) सेवानिवृति योजना। एक ओर देश में बेहतर रोजगार की चाहत में शिक्षा ग्रहण करने वालों की तादाद बढ़ रही थी वहीं दूसरी ओर सरकार स्थाई रोजगार खत्म कर रही थी। इसका परिणाम शिक्षित बेरोजगारों की भारी तादाद के रूप में सामने आना ही था। आज चंद नौकरियों के लिए लाखों आवेदन स्थिति की भयावहता को सामने ला देते हैं। बेरोजगारी विस्फोटक स्तर तक बढ़ चुकी है। 
    
कवि हृदय हिंदू राष्ट्रवादी संघी वाजपेई के प्रधानमंत्रित्व काल के दौरान इस दिशा में तेज गति से कदम बढ़ाए गए। अरुण शौरी की अगुवाई में सार्वजनिक संस्थाओं को परोक्ष तौर पर उद्योगपतियों को हस्तांतरित करने के लिए विनिवेश मंत्रालय ही खोल दिया गया। इसी तरह स्वास्थ्य, शिक्षा आदि में बजट में कटौती की गई और इन्हें मुनाफा कमाने के अड्डे में तब्दील करने के काम हुए। फिर इसके बाद 10 साल मनमोहन सिंह की अगुवाई में यू पी ए की सरकार बनी। तब भी निजीकरण, विनिवेशीकरण और सरकारी रोजगार को कम करने की नीति आगे बढ़ती रही। 
    
नतीजा यह हुआ कि 2012 में केंद्र सरकार के अधीन सरकारी रोजगार 1994 के 12.4 फीसदी से घटकर 8.5 प्रतिशत हो गए। यह लगभग 4 प्रतिशत की गिरावट थी। जबकि केंद्र सरकार की नियमित नौकरी में काम करने वाले कुल तकरीबन 40 लाख कर्मचारियों की संख्या 2024 तक घटकर 35 लाख रह गई। यह गिरावट न केवल सापेक्षिक थी बल्कि निरपेक्ष भी थी। राज्य सरकारों का और भी ज्यादा बुरा हाल रहा।
    
2014 के बाद इस मुहिम में बहुत तेजी आई। इन सरकारी-सार्वजनिक संस्थाओं को अलग-अलग तरीकों से एकाधिकारी पूंजी के मालिकों को स्थानांतरित करने का खेल जैसे-जैसे तेजी से आगे बढ़ता गया, वैसे-वैसे सरकारी रोजगार का दायरा भी तेजी से सिकुड़ता गया। हद तो यह हुई कि सरकार ने बेरोजगारी के आंकड़े जारी करने ही बंद कर दिए। सरकारी रोजगार का सपना इस तरह पकौड़ा रोजगार के उपदेश में बदल दिया गया।
    
हालत यह है कि युवा बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत बेरोजगारी दर से लगभग तीन गुना है। देश का सबसे बड़ा नियोक्ता होने के बावजूद, सरकार ने लाखों रिक्तियों को नहीं भरा है। कुछ साल पहले 60 लाख पद केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर रिक्त होने की बात उजागर हुई थी। यहां सार्वजनिक क्षेत्र में रिक्त पदों की संख्या पर करीब से नजर डालने पर एक बिल्कुल अलग कहानी सामने आती है। यहां शिक्षकों और डाक्टरों से लेकर वैज्ञानिकों और सुरक्षाकर्मियों तक, कर्मचारियों की कमी ने किसी भी क्षेत्र को नहीं छोड़ा है।
    
एक उदाहरण समग्र तस्वीर को समझने के लिए पर्याप्त है कि रेलवे के 64,000 पदों के लिए लगभग 2 करोड़ लोगों ने आवेदन किया था। इसी रेलवे में 2015 से 21 के बीच 72 हजार पद ग्रुप सी और डी के खत्म कर दिए गए। एक आरटीआई जवाब के अनुसार, रेलवे में केवल सुरक्षा श्रेणी में ही 1.5 लाख से अधिक रिक्तियां मौजूद हैं। कर्मचारियों की भारी कमी के चलते कम कर्मचारियों पर ज्यादा काम का बोझ होने से रेल दुर्घटनाओं में 6.7 प्रतिशत की वृद्धि (2023 में) हुई है।
    
इस तरह मोदी सरकार 2047 तक सचमुच सरकारी रोजगार मुक्त विकसित भारत बनाने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है, शिक्षा के क्षेत्र में एक ओर भगवाकरण तो दूसरी ओर निजीकरण और व्यवसायीकरण से भारत को विश्वगुरू का खिताब दिलवाने को बेताब है। हालत यह है कि शिक्षा क्षेत्र में भारी संख्या में पद रिक्त हैं। केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय स्कूलों में 12,000 से अधिक पद रिक्त पड़े हैं। 1 लाख से अधिक स्कूल केवल एक ही शिक्षक के सहारे चल रहे हैं। इसके अलावा, केंद्रीय विश्वविद्यालयों में हर चौथा पद खाली है। इस कमी ने शिक्षक-छात्र अनुपात और शिक्षण की गुणवत्ता दोनों को प्रभावित किया है।
    
अनुसंधान और विकास में तो मोदी सरकार ने डींग हांकने में कोई कमी नहीं की है हालांकि बजट में लगातार कमी की जा रही है। सरकार चंद्रयान जैसे कुछ यान अंतरिक्ष में भेजकर साबित करने में तुली है कि वह इसमें रूस चीन से भी आगे निकल चुका है।
    
हकीकत यह है कि श्रीहरिकोटा अंतरिक्ष केंद्र में वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और प्रशासनिक कर्मचारियों के 20 फीसदी से अधिक पद रिक्त हैं। यह सीधे तौर पर दिखाता है कि क्यों भारत नवाचार, वैज्ञानिक प्रकाशनों और पेटेंट में अमेरिका और चीन जैसे देशों से बहुत ज्यादा पीछे है।
    
सबसे बुरी स्थिति स्वास्थ्य की है। देश के 20 एम्स जैसे अग्रणी संस्थानों में चिकित्सकों के 40 फीसदी पद रिक्त हैं। ग्रामीण भारत की तस्वीर और भी डरावनी है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञों के लगभग 80 फीसदी पद खाली पड़े हैं, जबकि डाक्टरों के 20 फीसदी पद भरे नहीं गए हैं। इसी तरह 20 फीसदी नर्सिंग स्टाफ के पद खाली पड़े हैं। सचमुच! ‘स्वस्थ और आत्मनिर्भर भारत’ के निर्माण की दिशा में मोदी सरकार सरपट भागी जा रही है।
    
कुल मिलाकर कम या ज्यादा रूप में ऐसे हालात सभी सार्वजनिक विभागों या संस्थाओं में बने हुए हैं।
    
सार्वजनिक उपक्रमों (पी एस यू) की स्थिति को समझें। ऊर्जा, दूरसंचार, कोयला, इस्पात, दूरसंचार, रेलवे, बैंक, बीमा आदि अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यहां रोजगार सुरक्षित था और यहां से होने वाली आय जन हित में लग सकती थी। निजीकरण, विनिवेशीकरण के जरिए इन लाभकारी उपक्रमों को कई तरह के हथकंडे अपनाकर एकाधिकारी पूंजी के हवाले औने-पौने दाम पर बेच दिया जाता है साथ ही यहां से होने वाले लाभ (मुनाफे) को भी अप्रत्यक्ष ढंग से इन्हीं को हस्तांतरित किया जाता है। विनिवेश के जरिए सरकार अपनी हिस्सेदारी यहां से बेचकर कुछ लाख करोड़ रुपए बटोरती है और इसके बड़े हिस्से से अपने इन्हीं आकाओं को और खुद को भी फायदा पहुंचाया जाता है।
    
इस सबका सीधा असर कर्मचारियों पर भी पड़ना ही है। कर्मचारियों की संख्या में भारी कटौती की जाती है, सेवा शर्तें बदल दी जाती हैं। कर्मचारियों को जबरन सेवानिवृत्त करके घर बिठा दिया जाता है। 2019 में वीआरएस के तहत कम से कम 79 हजार कर्मचारियों की छंटनी कर दी गई इसके बाद में 30 हजार अनुबंध पर काम करने वालों को बाहर किया गया जबकि 20 हजार अनुबंध वाले कर्मचारियों को बाहर करने की योजना बन चुकी थी।
    
तस्वीर साफ है कि 1990 के दशक में बेहतर जीवन का ख्वाब दिखाकर जो नये आर्थिक सुधार लागू किए गए वह एक ओर सुरक्षित रोजगार को निगलने और बेहद मामूली वेतन पर असुरक्षित रोजगार के रूप में सामने आया है तो वहीं दूसरी ओर बड़ी और एकाधिकारी पूंजी की नग्न लूट-खसोट के रूप में भी सामने आया है। साफ है कि यह एक ही प्रक्रिया के दो भिन्न नतीजे हैं। 
    
ऐसा नहीं कि 90 के दशक से पहले सब खुशनुमा था। तब भी एकाधिकारी पूंजी के हितों से देश संचालित होता था। तब इसकी जरूरत कुछ सार्वजनिक उपक्रमों वाले पूंजीवादी राज्य की थी। इसका थोड़ा-बहुत फायदा कुछ हद तक आम नागरिकों या जनता को भी मिल जाता था। मगर बाद में इस नाममात्र के कल्याणकारी राज्य के चोले को उतारकर निजीकरण-उदारीकरण के जरिए लंपट पूंजीवाद की ओर बढ़ जाया गया। जिसका असर रोजगार के अधिकार से लेकर नागरिक अधिकारों पर भी बड़े स्तर पर पड़ना ही था।
      
2014 तक धीमी गति से चल रही नए आर्थिक सुधार की प्रक्रिया ने अब तेज गति पकड़ ली है। ऐसा एकाधिकारी पूंजी ने हिंदू फासीवाद से गठजोड़ कर और उसे सत्ता पर बिठाकर किया। तब से हिंदू राष्ट्रवाद के जहरीले शोर तले नग्न लूट-खसोट धड़ल्ले से चल रही है। यहां नियम कानून और संवैधानिक प्रावधान, सब ताक पर रख दिया गए हैं। ‘हर साल दो करोड़ को रोजगार’ देने के वादे की मिट्टी पलीद हो चुकी है। इसका जवाब सरकारी नौकरियों के प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते नौजवान सड़कों पर उमड़कर छिट-पुट आंदोलनों की शक्ल में दे रहे हैं। अभी इनकी मांग कहीं परीक्षाएं समय पर कराने, कहीं पेपर लीक को रोकने आदि की हैं। मगर देर-सबेर नौजवानों का यह संघर्ष व्यापक होगा और अपनी दिशा निजीकरण और नए आर्थिक सुधार के खिलाफ मोड़ देगा। फिर यहां से पूंजीवाद के खिलाफ संघर्ष की यात्रा ज्यादा लंबी नहीं है। दरअसल इस संघर्ष के दौरान ही समझ में आ जाएगा कि पूंजीवाद के खिलाफ धारदार संघर्ष के बिना इन नीतियों को भी रद्द नहीं कराया जा सकता है।

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