21 नवम्बर को मोदी सरकार ने जबरदस्त इश्तिहारबाजी के साथ चार नई श्रम संहिताओं (लेबर कोड्स) के लागू होने की घोषणा की। ये श्रम संहिताएं वर्ष 2019 व 2020 में संसद द्वारा पारित की गयी थीं परन्तु इनको लागू अब जाकर किया गया है। लागू में देरी की वजह मोदी सरकार की अपनी आशंकाओं के साथ मजदूरों का एक विरोध भी रहा है।
मोदी सरकार ने इन श्रम संहिताओं के लागू होने की घोषणा ऐसे की कि मानो अब भारत के मजदूर वर्ग के जीवन में नया सवेरा आ जायेगा। कि मानो भारत के मजदूरों का शोषण-उत्पीड़न खत्म हो जायेगा। उनकी रोजी-रोटी की चिंता मिट जायेगी। जो कोई भी मजदूर इन श्रम संहिताओं को गौर से पढ़ेगा तो वह पायेगा कि हकीकत एकदम उलट है। मोदी भले ही ‘‘श्रमेव जयते’’ की बात कर रहे हों परन्तु श्रम संहिताएं अपनी हर धारा में ‘पूंजी जिन्दाबाद!’ का नारा लगा रही हैं।
मोदी सरकार ने इन नई श्रम संहिताओं को लागू किये जाने की घोषणा के नाम पर करोड़ों रुपये अखबारी इश्तिहारों से लेकर सोशल मीडिया में प्रचार में फूंक डाले। इन इश्तिहारों में घोषणा की गयी है कि ‘‘भारत के कार्यबल के लिए नए युग का शुभारम्भ हो गया है’’। बात-बात पर मोदी अपने नाम पर गारण्टी देते रहते हैं। अब इन इश्तिहारों के अनुसार ‘मोदी सरकार की गारण्टी है कि ‘सभी के लिए न्यूनतम और समय पर वेतन’; ‘नियुक्ति पत्र अनिवार्य’; ‘सभी महिला श्रमिकों को समान अवसर और समान वेतन’; ‘40 करोड़ श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित’; ‘निश्चित अवधि के कर्मचारियों को एक वर्ष की सेवा के बाद ग्रेच्युटी’; ‘श्रमिकों के लिए निःशुल्क वार्षिक स्वास्थ्य जांच अनिवार्य’; ‘जोखिम भरे कार्य क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों के लिए 100 प्रतिशत स्वास्थ्य सुरक्षा’।
भला सा लगने वाला यह विज्ञापन भ्रामक है। लफ्फाजी से भरा हुआ है। ‘न्यूनतम व समय पर वेतन हो’ या ‘अनिवार्य नियुक्ति पत्र’ या ‘फिर महिला श्रमिकों को समान अवसर व समान वेतन’ हो या फिर इस विज्ञापन की अन्य बातें सिर्फ हवाबाजी है। मसलन जिस न्यूनतम वेतन की बात मोदी सरकार गारण्टी के नाम पर कर रही है उसे तो ‘‘भुखमरी वेतन’’ की संज्ञा दी जानी चाहिए। 2019 की वेतन संहिता में ‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’ (नेशनल फ्लोर वेज) महज 179 रुपये प्रतिदिन घोषित किया गया है। मसलन अगर एक मजदूर के परिवार में पांच सदस्य हों तो प्रति व्यक्ति के हिस्से महज 35 रुपये 80 पैसे आयेंगे। ‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’ को जितना न्यूनतम रखा जा सकता था उतना न्यूनतम रखा गया है। इस पर तुर्रा यह कि न्यूनतम वेतन की मोदी की गारण्टी है।
हर कोई जानता है कि पूंजीवाद में मजदूरों की श्रम शक्ति भी एक माल (कमोडिटी) है। इसे सस्ता माल बनाये रखकर, मोदी सरकार इस माल के खरीददारों (पूंजीपतियों-देशी व विदेशी दोनों की) की ‘‘ऐतिहासिक मदद’’ कर रही है। बाजार में हर उत्पादित माल के ऊपर उसका अधिकतम विक्रय मूल्य (डैच्) लिखा होता है। और उस उत्पादित माल को अधिकतम खुदरा मूल्य पर ही विक्रेता बेचता है परन्तु मजदूर को मजबूर किया जाता है कि वह अपनी श्रम शक्ति को न्यूनतम में बेचे। और मोदी सरकार इसी न्यूनतम वेतन की गारण्टी दे रही है। मोदी सरकार राष्ट्रीय स्तर पर न्यूनतम वेतन में समानता लाना चाहती है। इसका मतलब क्या होगा? इसका मतलब यह होगा जिन राज्यों या क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन अधिक है वहां उसे ‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’ के स्तर पर या तो लाया जाये या फिर उसमें वृद्धि के लिए किसी भी संघर्ष को कानून के नाम पर खत्म कर दिया जायेगा। अभी भारत में सबसे अधिक न्यूनतम वेतन (अकुशल मजदूर के लिए) दिल्ली में (709 रुपये प्रतिदिन) तो सबसे कम बिहार (160 रुपये प्रतिदिन) में है। ये दीगर बात है कि यह भी मिलता है या नहीं।
मोदी सरकार की गारण्टी जिस तरह से न्यूनतम वेतन के मामले में छल से भरी व मजदूर विरोधी है, ठीक वही बात अन्य संदर्भों में भी लागू हो जाती है।
‘समय पर वेतन’ असंगठित क्षेत्र के लिए एकदम सफेद झूठ है। और यहां तक कि संगठित क्षेत्र में कुछेक उद्यमों या संस्थानों को छोड़ दिया जाये तो कभी भी समय पर वेतन नहीं मिलता। खुद मोदी सरकार और उसकी पाटियों या अन्य पार्टियों वाली राज्य सरकारों में सरकारी कर्मचारियों, संविदा कर्मियों या भांति-भांति के स्कीम वाले कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं मिलता। आये दिन कर्मचारी अपने वेतन के लिए सड़कों पर उतरे रहते हैं। श्रीमान मोदी ‘समय पर वेतन’ की गारण्टी को सरकारी क्षेत्र में भी लागू करवा दें तो भी बड़ी बात होगी। ‘हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख’, ‘हर साल दो करोड़ रोजगार’, ‘2022 तक हर किसान की आय दुगुनी’ जैसे वायदों (या जुमलों) की तरह ‘समय पर वेतन’ एक जुमला ही साबित होगा।
यही बातें ‘सभी को नियुक्ति पत्र’ पर लागू हो जाती हैं। कौन धनी किसान या कौन ठेकेदार या कौन ईंट-भट्टे का मालिक अपने मजदूरों को नियुक्ति पत्र देगा। वहां अपने काम की मजदूरी ही समय पर मिल जाये तो मजदूर अपने आप को तसल्ली में पायेगा। धन्य समझेगा।
सभी महिला श्रमिकों को ‘समान अवसर और समान वेतन’ भी एक झूठी गारण्टी है। मोदी सरकार से बहुत-बहुत साल पहले इंदिरा सरकार ने 1974 में एक ऐसा ही कानून बनाया था। उस कानून का न तो इंदिरा, न राजीव, न अटल और न मोदी सरकार कभी हकीकत में बदल सकी।
हकीकत में मोदी सरकार ने महिला श्रमिकों के सस्ते श्रम की अबाध लूट के लिए उन्हें रात्रिपाली में भी काम करने को मजबूर करने की गारण्टी पूंजीपतियों के फायदे के लिए कर दी है। मोदी जी की बला से महिला मजदूरों का जीवन हराम हो जाये। उनका स्वास्थ्य चौपट हो जाये। उनकी सुरक्षा खतरे में पड़ जाये या फिर एक मजदूर औरत के छोटे-छोटे बच्चे अपनी मां के लिए तरस जायें। मोदी सरकार को तो महिला मजदूर की सिर्फ व सिर्फ सस्ती मजदूरी दिखाई दे रही है। न तो उसका जीवन, न उसका स्वास्थ्य, न उसकी सुरक्षा और न उसका परिवार दिखाई दे रहा है। ‘समान अवसर’ के नाम पर मोदी सरकार ने महिला श्रमिकों को रात को भी काम पर जाने को मजबूर कर दिया है। कहां तो बेहद आवश्यक कार्यों के अलावा हर तरह के रात की पाली में काम करवाने पर रोक लगनी चाहिए थी। पुरुषों का भी स्वास्थ्य व जीवन रात की पाली में काम करने से चौपट होता है। वहां अब ‘समान अवसर’ के नाम पर रात की पाली में औरतों को भी काम करने को मजबूर कर दिया गया है।
हकीकत यह है मोदी सरकार की चार श्रम संहिताओं में पहली दो संहिताएं ‘वेतन’ व ‘औद्योगिक संबंध’ संहिता देशी-विदेशी पूंजी के हितों को साधने के लिए मजदूरों के निर्मम अबाध शोषण व उत्पीड़न का बंदोबस्त करती हैं। और बाकी दो श्रम संहिताएं - ‘व्यावसायिक संरक्षा स्वास्थ्य और कार्यदिशा संबंधी संहिता’ व ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता’ शोषित-उत्पीड़ित मजदूरों को कुछ राहत देने व उनके जख्मों पर मलहम लगाने का ढोंग रचती है।
श्रम कानून हमेशा से (जब से ये बनने शुरू हुए हैं) सामाजिक उत्पादन व वितरण में पूंजी और श्रम के संबंधों को नियमित करने का काम करते रहे हैं। और इन कानूनों में श्रम का पलड़ा कितना भारी होगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि मजदूर वर्ग कितना एकजुट है और कितना संघर्ष के मैदान में उतरा हुआ है। क्योंकि काफी समय से मजदूर वर्ग, एक वर्ग के तौर पर न तो संगठित है और न संघर्ष के मैदान में जुझारू ढंग से उतरा हुआ है तो पूंजीपति वर्ग और उसके राज्य को मजदूरों को लगातार झुकाने का मौका मिला हुआ है। भारत में 2014 से जब से मोदी सरकार भारत के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग और हिन्दू फासीवाद के गठजोड़ से सत्ता में आयी है तब से मजदूर वर्ग पर हमला ज्यादा तीखा और क्रूर हो गया है। ये चारों श्रम संहिताएं उसी नये हमले का एक नया कानूनी रूप है। अपने धमाकेदार प्रचार में मोदी सरकार इन संहिताओं के असल चरित्र पर पर्दा डाल रही है।
भारत के मजदूर वर्ग के सामने इसके सिवा और क्या विकल्प है कि वह एकजुट हो, संगठित हो और संघर्ष के मैदान में उतरे। पूंजीपति वर्ग के पास पूंजी और राजसत्ता की ताकत है। मजदूर की ताकत उसकी एकजुटता, उसके संगठन और संघर्ष में है। पूरी दुनिया ही नहीं भारत के मजदूरों का इतिहास भी इंकलाबी संघर्षों से भरा रहा है। आज अतीत से प्रेरणा लेकर नये भविष्य के संकल्प के साथ एकजुट हो संघर्ष करने की जरूरत है।