पिछले दिनों भारत के पूर्व उप राष्ट्रपति ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की एक बात को उद्धत किया। नेहरू ने कहा था, ‘भारत के लिए खतरा, ध्यान रहे, कम्युनिज्म नहीं है, बल्कि हिन्दू दक्षिणपंथी विचारधारा है’। एक तो हामिद अंसारी का मुसलमान होना और ऊपर से नेहरू की बात का हवाला देना, इसने हिन्दू दक्षिणपंथी साम्प्रदायिकता के पैरोकारों को आग बबूला कर दिया। और फिर वही हुआ जो हमेशा होता है हिन्दू फासीवादी अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ हामिद अंसारी पर टूट पड़े। उन्हें मर्यादा के पाठ पढ़ाये जाने से ज्यादा औकात दिखायी जाने लगी।
क्या इसमें कोई शक है कि आज के भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा हिन्दू दक्षिणपंथी साम्प्रदायिकता है। वही सबसे बड़ा खतरा है। परन्तु इसका सही नामकरण करना जरूरी है। नेहरू काल में सबसे बड़ा खतरा हिन्दू दक्षिणपंथी साम्प्रदायिकता रही हो परन्तु आज इसने दक्षिणपंथी साम्प्रदायिकता से बहुत आगे बढ़कर हिन्दू फासीवाद का रूप धारण कर लिया है। आज मामला हिंदू या मुसलमान या सिक्ख दक्षिणपंथी साम्प्रदायिकता और इनके बीच चलने वाली होड़ और उसके फलस्वरूप होने वाले साम्प्रदायिक दंगे या राजनीति का नहीं है। बात बहुत आगे बढ़ चुकी है। मुसलमान या सिक्ख या अन्य किस्म की दक्षिणपंथी साम्प्रदायिकता का स्तर बेहद निम्न, स्थानीय और अप्रभावी बना हुआ है जबकि हिन्दू फासीवादी भारतीय राज्य के अंग-उपांग में अपनी पकड़ मजबूतत कर चुके हैं। और उनकी वर्चस्ववादी स्थिति ने भारत के सामने फासीवाद का वैसा ही खतरा उत्पन्न कर दिया है जैसा कि पिछली सदी के तीसरे-चैथे दशक में जर्मनी में हिटलर के नाजीवाद ने पैदा कर दिया था।
आज हमारे देश की स्थिति क्या है? भारत के चुनाव आयोग के बारे में हालिया खुलासे ने साबित कर दिया कि चुनाव आयोग हिन्दू फासीवादियों के हाथों का एक औजार बन चुका है। चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एस आई आर) के जरिये पूरे देश में हिन्दू फासीवादी चुनाव दल भाजपा को ऐसी स्थिति में पहुंचाने की कोशिश की है कि वह आसानी से चुनाव जीत सके। पं.बंगाल का चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन कर सामने आया है। ममता बनर्जी को अर्श से फर्श पर पटकने में चुनाव आयोग की चुनाव के समय से लेकर अब तक बहुत बड़ी भूमिका है। हालात ऐसे बना दिये गये हैं कि वहां के हालिया उप चुनाव में कोई भी भाजपा विरोधी प्रत्याशी चुनाव तक न लड़ सके।
हिन्दू फासीवादी चुनावी दल न केवल चुनाव आयोग के जरिये चुनावी प्रणाली को अपने मन मुताबिक चला रहा है बल्कि वह अपने लिए अपनी मनपसंद जनता भी चुन रहा है। पं.बंगाल से लेकर दिल्ली तक करोड़ों की संख्या में मतदाताओं के नाम काट दिये गये जिनमें सबसे बड़ी संख्या मुसलमानों की है। और कई दफा ऐसा हो चुका है खासकर उत्तर प्रदेश में जहां मुसलमानों को ‘‘वैध’’ मतदाता होने के बावजूद मत नहीं देने दिया गया।
हिन्दू फासीवाद निःसंदेह भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा है। और यह खतरा न केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों बल्कि बहुसंख्यक हिन्दू आबादी के लिए भी उतना ही है। और यह सब मोदी सरकार के पिछले 12 वर्ष के शासनकाल में साबित होता रहा है। पिछले 12 वर्षों में हर वर्ष के साथ महंगाई, बेरोजगारी, सामाजिक असमानता आदि लगातार बढ़ते गये हैं। महंगाई आसमान छू रही है तो बेरोजगारी पिछले पचास वर्षों में सबसे ज्यादा है। हर तीन युवा में एक युवा बेरोजगार है।
हिन्दू फासीवाद न केवल देश के लिए बल्कि भारत के पड़ोस के देशों के लिए भी खतरा है। किसी भी देश की विदेश नीति उसकी गृहनीति का ही विस्तार होती है। और जब देश में हिन्दू फासीवादी राजनीति शासन की नीति का हिस्सा हो तो इसकी स्वाभाविक झलक विदेश नीति में भी दिखायी देती है। भारत के अपने पड़ोसी देशों से खासकर पाकिस्तान, बांग्लादेश से सम्बन्ध रसातल में हैं। भारत में मुसलमानों की की जा रही घेराबंदी व उन्हें आतंकित करने का स्वाभाविक नतीजा इन देशों में हिन्दुओं जो कि वहां अल्पसंख्यक हैं पर अत्याचार के रूप में सामने आता है। भारत में दक्षिणपंथी हिन्दू साम्प्रदायिकता या हिन्दू फासीवाद का उभार इन देशों में दक्षिणपंथी मुस्लिम साम्प्रदायिकता या इस्लामिक फासीवाद को आगे बढ़ाता है। और इस तरह पूरा दक्षिण एशिया इस तरह की राजनीति की क्रिया-प्रतिक्रिया स्वरूप एक खतरनाक क्षेत्र में बदल गया है। राज्य द्वार प्रायोजित आतंकवाद का साया इन सभी देशों में अक्सर दिखाई देता है जिसमें इन देशों का परस्पर हाथ होता है। भारत और पाकिस्तान में अधिकांश आतंकी घटनाओं में इन देशों का ही परस्पर हाथ होता है।
भारत में जिस तेजी से हिन्दू फासीवाद का उभार हाल के दशकों में हुआ है उसने एक रूप में नेहरू को सही साबित कर दिया परन्तु क्या कम्युनिज्म (साम्यवाद) भी भारत के लिए कोई खतरा है।
नेहरू के जमाने में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (साम्यवादी दल) साम्यवादी क्रांति की राह छोड़कर क्रमशः कांग्रेस की पिछलग्गू हो चुकी थी। जिस पार्टी के नेतृत्व में ठीक आजादी के समय महान तेलंगाना आंदोलन लड़ा गया था वह पार्टी एक दशक में वहां पहुंच गयी कि वह कांग्रेस के स्वर में स्वर मिलाने लगी। इसीलिए नेहरू ने पूरे दम ठोेंक कर कहा कि कम्युनिज्म भारत के लिए कोई खतरा नहीं है और फिर क्या वाकई कम्युनिज्म भारत के लिए खतर है?
यह सच्चाई है कि साम्यवाद भारत के लिए कोई खतरा नहीं है। वह भारत का अवश्यम्भावी भविष्य है। साम्यवाद वैसे ही भारत का भविष्य है जिस प्रकार वह पूरी दुनिया का भविष्य है। जैसे पूरी दुनिया को पूंजीवाद से समाजवाद और फिर समाजवाद से साम्यवाद की यात्रा पूरी करनी है ठीक इसी तरह से भारत को भी यह यात्रा पूरी करनी है। समाजवाद या आगे बढ़कर साम्यवाद भारत की जरूरत, रास्ता व भविष्य है।
फिर समाजवाद या साम्यवाद किसके लिए खतरा है। असल में यह खतरा भारत के शोषित-उत्पीड़ितों के लिए नहीं बल्कि उन लोगों के लिए है जो हिन्दू फासीवादी दलों व संगठनों को पालते-पोसते हैं। हिन्दू फासीवाद भारत के शासक वर्ग के एक हिस्से खासकर एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग (अडाणी-अम्बानी) की सेवा करता है। उसे ही साम्यवाद से सबसे बड़ा खतरा महसूस होता है। नेहरू हिन्दू साम्प्रदायिकता के खिलाफ थे परन्तु वे स्वयं भी पूंजीवाद, निजी सम्पत्ति व मुनाफे की व्यवस्था के पैरोकार थे। और नेहरू से लेकर मोदी तक सभी भारत के मजदूरों, किसानों के शोषण-उत्पीड़न व दमन करने वाली पूंजीवादी व्यवस्था के रहनुमा रहे हैं। नेहरू व मोदी में फर्क यह है कि एक पूंजीवादी-जनवादी थे तो दूसरे महोदय घोर हिन्दू फासीवादी हैं। और समय के साथ जिस तरह पूंजीपति वर्ग प्रतिक्रियावादी से घोर प्रतिक्रियावादी होता गया है ठीक उसी तरह से उसकी राजनीति नेहरू से मोदी की ओर खिसकती गयी है। और इस रूप में उनमें भारी भिन्नता के बावजूद काफी समानताएं भी हैं। और फिर नेहरू के वंशजों ने हिन्दू फासीवाद को पनपने के लिए पर्याप्त अवसर व स्थान भी उपलब्ध कराया है। इस रूप में जो खतरा आज भारत का सबसे बड़ा खतरा है उसको प्रश्रय देने में नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह तक का अपना ही विशिष्ट योगदान है। और इस रूप में भारत के सबसे बड़े खतरे का मुकाबला भारत के मौजूदा चुनावी दल यहां तक कि राहुल की कांग्रेस भी कुछ खास नहीं कर सकती है। सिर्फ और सिर्फ मजदूर वर्ग के नेतृत्व में ही शोषित-उत्पीड़ित जन ही वह ताकत बनते हैं जो भारत को सबसे बड़े वर्तमान खतरे से निकालकर उसका भविष्य सुरक्षित कर सकते हैं। जब भारत में ऐसा होगा तो पूरे दक्षिण एशिया में भी एक नयी सुबह का आगाज होगा।