भविष्य निधि ( पी एफ ) निकासी के नियमों में बदलाव

इस हमले का प्रतिरोध करना होगा

मोदी सरकार द्वारा मज़दूरों पर एक और बड़ा हमला बोला गया है। इस बार श्रम और रोजगार मंत्रालय ने भविष्य निधि अर्थात प्रोविडेंट फंड (पी एफ) की निकासी से संबंधित नियमों में मज़दूर विरोधी बदलाव करके यह हमला बोला है।

दरअसल 13 अक्टूबर, 2025 को श्रम और रोजगार मंत्री मनसुख मांडविया की अध्यक्षता में संपन्न हुई केंद्रीय भविष्य निधि संगठन (EPFO) की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था केंद्रीय न्यासी बोर्ड (CBT) की 238 वीं बैठक में फैसला हुआ कि अब कोई पी एफ खाताधारक मज़दूर अथवा कर्मचारी बेरोजगार हो जाने पर अपने पी एफ खाते में जमा राशि एक साल बाद ही निकाल सकता है। इसमें भी वह जमा राशि का 75 प्रतिशत ही निकाल सकता है और शेष 25 प्रतिशत राशि उसे न्यूनतम शेष (मिनिमम बैलेंस) के रूप में रखनी होगी, जो कि वह रिटायर होने के बाद ही निकाल सकेगा। इसके अलावा अपने पेंशन खाते में जमा राशि अब वह बेरोजगार होने के 3 साल बाद ही निकाल सकता है।

गौरतलब है कि कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) में मज़दूर अथवा कर्मचारी के दो खाते होते हैं। एक, पी एफ का खाता और दूसरा, पेंशन का खाता। उसके मूल वेतन की 12 प्रतिशत राशि वेतन से कटकर प्रतिमाह उसके पी एफ खाते में जमा होती है; जबकि 12 प्रतिशत नियोक्ता अथवा मालिक द्वारा जमा की जाती है, जो कि दो हिस्सों में बंटकर अर्थात 8.33 प्रतिशत पेंशन खाते में और 3.67 प्रतिशत पी एफ खाते में जमा होती है। इस तरह मज़दूर अथवा कर्मचारी के पी एफ खाते में उसके मूल वेतन की 15.37 प्रतिशत और पेंशन खाते में 8.33 प्रतिशत; कुल 24 प्रतिशत राशि प्रतिमाह जमा होती है।

नये बदलावों के तहत अब मज़दूर अथवा कर्मचारी बेरोजगार होने पर अपने पी एफ खाते से अपने मूल वेतन की 15.37 प्रतिशत प्रतिमाह जमा होने वाली इस राशि का 75 प्रतिशत ही निकाल सकता है और वो भी एक साल बाद। जबकि पहले वह एक साल नहीं बल्कि बेरोजगार होने के 2 महीने बाद ही, वह भी 75 प्रतिशत नहीं बल्कि शत प्रतिशत राशि निकाल सकता था। और इस शत प्रतिशत में पेंशन खाते में जमा होने वाली शेष 8.33 प्रतिशत प्रतिमाह जमा होने वाली राशि की निकासी भी शामिल थी, जिसे कि अब वह बेरोजगार होने के 3 साल बाद ही निकाल सकेगा।

हालांकि विरोध के बाद सरकार ने नया बयान देते हुए कहा कि बेरोजगार होने पर बेरोजगार व्यक्ति पी एफ का 75 प्रतिशत तुरंत व शेष 25 प्रतिशत 1 वर्ष बाद निकाल पायेगा। पेन्शन फंड से निकासी 3 वर्ष बाद ही की जा सकेगी।

इन बदलावों के पीछे सरकार के तर्क हैं कि खाताधारक मज़दूरों अथवा कर्मचारियों द्वारा बेरोजगारी की स्थिति में अपनी पी एफ और पेंशन की पूरी राशि निकाल लेने पर उनके पास बाद के लिये खासकर रिटायर होने के बाद कोई बचत नहीं रह जाती अथवा बहुत कम बचत रह जाती है। श्रम मंत्री का कहना है कि सरकार चाहती है कि लोग बचत की आदत डालें और पी एफ व पेंशन की इस बचत पर मिलने वाले ब्याज और चक्रवृद्धि ब्याज का भी लाभ उठायें।

सरकार की इन सुंदर दलीलों से उलट हकीकत क्या है ? असल में आज ज्यादातर मज़दूर बहुत कम वेतन (दस, बारह अथवा पंद्रह हज़ार) वाली अस्थायी अथवा ठेके की नौकरियों पर खट रहे हैं, जो कि बिल्कुल ही असुरक्षित हैं और कभी भी चली जाती हैं। ऐसे में बेरोजगार होने पर सामान्य खर्च चलाने को भी या तो उन्हें उधार लेना पड़ता है या फिर पी एफ ही उनका सहारा होता है। इसी तरह बीमारी, दुर्घटना, बेटी की शादी, महिला मज़दूरों में उनके खुद के गर्भवती होने इत्यादि अनेकों मामलों में बेरोजगार हो जाने पर पी एफ ही उनका एक बड़ा सहारा बनता है। ऐसे में, उन्हें पी एफ की 75 प्रतिशत राशि के लिये एक साल तक इंतजार कराना, शेष 25 प्रतिशत राशि को रिटायर होने तक और पेंशन की राशि को 3 साल तक अटका देना, उनके साथ सीधे-सीधे जुल्म है और इसका सख्ती से विरोध बेहद जरुरी है।

सरकार ने शिक्षा, शादी, मकान बनाने अथवा किसी प्राकृतिक आपदा इत्यादि के मामलों में सेवा में रहते हुये पी एफ की आंशिक निकासी हेतु सेवा अवधि एवं अन्य शर्तों को जो आसान बनाया है उनका बेहद कम आमदनी वाली, अस्थायी और ठेके वाली एकदम असुरक्षित नौकरी करने वाले मज़दूरों के लिये कोई मतलब नहीं बनता है।

मोदी सरकार ने 2016 में भी पी एफ निकासी के नियमों में मज़दूर विरोधी बदलाव किया था। उस समय बदलाव यह था कि मज़दूर पी एफ में अपने योगदान वाला हिस्सा तो बेरोजगार होने के 2 माह बाद निकाल सकते हैं लेकिन नियोक्ता वाले हिस्से, जिसका 3.67 प्रतिशत पी एफ खाते में और 8.33 प्रतिशत पेंशन खाते में जाता है, में से पी एफ वाले हिस्से को हासिल करने के लिये उन्हें 58 साल की उम्र अर्थात रिटायरमेंट तक इंतजार करना पड़ेगा और पेंशन वाले हिस्से से उन्हें पेंशन मिलेगी। तब बेंगलुरु के गार्मेंट सेक्टर के मज़दूर, जिनमें ज्यादातर महिला मज़दूर थीं, मानो सैलाब बनकर सड़कों पर उतर आई थी और मोदी सरकार को 24 घंटे के भीतर इस बदलाव को वापस लेने पर मज़बूर होना पड़ा था। वे सड़कों पर इसलिये उतर आई थीं क्योंकि उनकी जीवन परिस्थितियां और जीवन की जरुरतें उन्हें अपनी मेहनत के पैसे को हासिल करने के लिये 58 साल की उम्र तक इंतजार करने की इजाजत नहीं देतीं। दूसरे, 58 साल की उम्र के बाद मिलने वाली बेहद मामूली पेंशन का उनके लिये रत्ती भर भी आकर्षण नहीं बनता।

अब मोदी सरकार ने करीब एक दशक बाद अधिक तैयारी और चिकनी-चुपडी बातों के साथ एक बार फिर मज़दूरों के प्रोविडेंट फंड पर हमला बोला है। निश्चित ही, 7 करोड़ से अधिक पी एफ खाताधारकों की मेहनत की कमाई पर आंखे गढ़ायें बैठी इस अडानी-अम्बानी की सरकार के, इस घोर मज़दूर विरोधी फैसले का मज़दूर प्रतिरोध करेंगे।

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