करीब पौने दो सौ वर्ष पहले कम्युनिस्ट पार्टी के घोषणापत्र में माक्र्स-एंगेल्स ने लिखा था कि सारी दुनिया के शासकों को कम्युनिज्म का भूत सता रहा है। आज इतने वर्षों बाद भी माक्र्स-एंगेल्स की बात कितनी सत्य थी इसे हाल ही में ट्रम्प द्वारा अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम के 250 वर्ष पूरे होने के अवसर पर दिये भाषण से समझा जा सकता है।
ट्रम्प ने अपने भाषण में अमेरिका में पल-बढ़ रहे ‘कम्युनिस्ट खतरे’ पर हमला बोला और कम्युनिज्म के समर्थकों को 4 जुलाई 1776 का यानी अमेरिकी स्वतंत्रता दिवस का दुश्मन बताया। उसने कहा कि कोई व्यक्ति या तो कम्युनिस्ट हो सकता है या देशभक्त हो सकता है पर दोनों एक साथ नहीं हो सकता। अंत में ट्रम्प ने ‘कम्युनिस्ट खतरे’ को शीघ्र-अतिशीघ्र अमेरिका से बाहर निकलवाने का संकल्प लिया। ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका कभी भी कम्युनिस्ट देश नहीं बनेगा।
ट्रम्प का यह भाषण एक ऐसे वक्त में सामने आया जब समूची दुनिया में एक भी समाजवादी देश नहीं है। पिछली सदी में क्रांति की पहली श्रंखला के दौरान कायम हुए समाजवादी मुल्कों में पूंजीवादी पुनस्र्थापना हो चुकी है। कम्युनिस्ट आंदोलन वैश्विक पैमाने पर टूट-फूट बिखराव का शिकार है। इन हालातों में अगर ट्रम्प को कम्युनिज्म का भूत सता रहा है तो यह आश्चर्यजनक सा प्रतीत होता है।
पर थोड़ा ही गौर से देखने पर समझ में आने लगता है कि भले ही कम्युनिस्ट क्रांतिकारी ताकतों को क्रांति व समाजवाद करीब नजर न आता हो पर शासक वर्गों को यह खतरा बेहद करीब नजर आ रहा है। इसीलिए वे न केवल कम्युनिज्म पर हमलवार हैं बल्कि ‘अमेरिका कभी भी कम्युनिस्ट नहीं बन सकता’ के झूठे दावे कर रहे हैं। कम्युनिस्ट खतरे को देश से निकालने का ट्रम्प दावा कर रहा है।
आखिर ऐसा क्या है कि शासकों को कम्युनिज्म का भूत सताने लगा है। इसका जवाब वैश्विक अर्थव्यवस्था के संकट में है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी इस संकट से अछूती नहीं है। साथ ही इस संकट का पूंजीवादी बुद्धिजीवियों को कोई हल नजर नहीं आ रहा है। उनके द्वारा सुझाये गये सारे नुस्खे संकट दूर करना तो दूर उसे और गहराते जा रहे हैं। ऐसी हालातों में कम्युनिज्म का भय शासकों को सताना स्वाभाविक है। ट्रम्प को भी इसीलिए यह भय सता रहा है।
अमेरिकी साम्राज्यवाद की वर्चस्वकारी स्थिति को चीनी साम्राज्यवादी कड़ी चुनौती दे रहे हैं। ऐसे में बौखलाहट में ट्रम्प इस वर्चस्व को बनाये रखने के लिए हाथ-पैर मार रहा है। उसकी तटकर घोषणायें, अमेरिका प्रथम की दक्षिणपंथी बातें और मनमाने युद्ध अभियान अमेरिकी साम्राज्यवाद के संकट को हल करने के बजाय बढ़़ा ही रहा है। ऐसे में इनकी कोई भी बड़ी हरकत दुनिया में उथल-पुथल पैदा करने के साथ-साथ उसे क्रांतियों की ओर भी ठेल सकती है। इसीलिए कम्युनिस्ट क्रांति कभी भी सुदूर की बात नहीं तात्कालिक व्यवहारिक कार्यवाही का प्रश्न बन सकती है।