दिमागी नक्सल से भेंट

Published
Fri, 10/16/2026 - 07:50
/dimaagi-naxal-se-bhent

पार्क में एक रोज बेंच पर बैठे एक व्यक्ति से भेंट हो गई। उसके बाद का वार्तालाप।

मैंः  हैलो! आपका नाम

व्यक्तिः दिमागी नक्सल

मैंः क्या? पागल

व्यक्तिः हां, ये भी कह सकते हो।

मैंः क्यों मजाक करते हो भाई? सही-सही बताओ ना, कौन हो भाई?

व्यक्तिः मां-बाप ने तो चंद्रशेखर नाम रखा था, गांव के लोग मुझे चंदू कहते थे।

मैंः अच्छा तो आपका नाम चंद्रशेखर है।

व्यक्तिः हां ये भी है मगर आजकल मुझे और कई नाम से भी जाना जाता है, कभी वामपंथी, कभी आंदोलनजीवी, कभी अरबन नक्सल तो कभी दिमागी नक्सल कहकर बुलाया जाता है।

मैंः आप रहते कहां हैं?

व्यक्तिः मैं स्कूल में रहता हूं, लायब्रेरी में रहता हूं, शहर में रहता हूं, गांव में रहता हूं, खेत-खलिहान मे रहता हूं। देश में रहता हूं और विदेश में रहता हूं। प्रेस में रहता हूं, कारखानों में रहता हूं और न्यायालयों मे भी रहता हूं।

मैंः आखिर आप करते क्या हैं?

व्यक्तिः मैं पढ़ता हूं पढ़ाता हूं, खेती-किसानी करता हूं, मैं कारखानों में मशीनें चलाता हूं, देश-विदेश में नौकरी करता हूं, कोर्ट में वकालत करता हूं, अखबार में लिखता हूं।

मैः फिर आपको इतने नामों से क्यों बुलाया जाता है?

व्यक्तिः क्योंकि मैं सोच सकता हूं, लिख सकता हूं और सरकारों की आंख में आंख डालकर सवाल पूछ सकता हूं। सबसे बड़ी बात मैं अंधभक्त नहीं हूं।
            -एक पाठक

आलेख

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।