गुड़गांव/ शिवम आटो टेक कंपनी बिनोला गुड़गांव में स्थित है। यह कंपनी हीरो मोटो कार्प के लिए कल-पुर्जे बनाती है। इस कंपनी के कई प्लांट हैं। इस कंपनी में तीन सौ बीस स्थाई मजदूर हैं, और लगभग 5-6 सौ ठेका मजदूर काम करते हैं। यहां पर मालिक/मैनेजमेंट मजदूरों में फूट डालो और शोषण करो व उनके श्रम अधिकारों में कटौती करने की नीति अपना रहा है। मजदूरों का कहना है कि कोरोना के समय से ही कंपनी मालिक ने आपदा को अवसर में बदलने का काम करना शुरू कर दिया था। उस समय से कंपनी ने घाटे का बहाना बनाना शुरू कर दिया था। उसके बाद से ही कंपनी मालिक/मैनेजमेंट मजदूरों के दिमागों में भरता आ रहा है, कि कंपनी को काम के आर्डर कम आ रहे हैं। जिस वजह से कंपनी पहले जैसी सुविधाएं देने में असमर्थ रहेगी। और काम कम होने की वजह से कंपनी को घाटा हो रहा है। कंपनी की इस सबके पीछे चाल यह थी कि मजदूर कंपनी के इस झांसे में आ जाएं और कंपनी से निर्धारित देय सुविधाओं की मांग के लिए किसी भी प्रकार का दबाव न बनाएं और न ही उम्मीद करें।
कंपनी ने अपने षड्यंत्र में कामयाब होने के लिए मजदूरों में गुटबाजी पैदा कर दी। मजदूरों की आपसी गुटबाजी से मालिक अपने मकसद में कामयाब होता रहा। और इस प्रकार मालिक मजदूरों के अधिकारों में कटौती करता रहा। मैनेजमेंट भी इस कटौती को बरकरार रखने के लिए मजदूरों में फूट के बीज बोता रहा। मजदूर भी मैनेजमेंट से लड़ने के बजाए अपने भाईचारे को खराब करने में लगे रहे। लेकिन साथ ही मजदूर लम्बे समय से अपने ऊपर मैनेजमेंट द्वारा निरंतर हमलों को पहचान रहे थे।
कंपनी मैनेजमेंट चाह रहा था कि उनके इस तरह का माहौल बनाने से मजदूर हिसाब लेकर चले जाएंगे। इसके लिए मैनेजमेंट ने पूरी कोशिश की भी। सभी कंपनियों की भांति इस कंपनी में भी स्थाई मजदूर इनकी नजरों में खटक रहे हैं। कंपनी मालिक चाहता है कि महंगे स्थाई मजदूरों की जगह सस्ते ठेका मजदूरों को रखा जाए। कंपनी मालिक मजदूरों पर सीमित मात्रा में खर्च करना चाहता है। जितना एक स्थाई मजदूर को वेतन दिया जाता है उतने में चार ठेका मजदूर रखे जा सकते हैं। एक तरफ तो मजदूरों की सुविधाओं में कटौती यह कह कर की जाती है कि कंपनी घाटे में चल रही है दूसरी तरफ मैनेजमेंट के लोग अपने वेतन भत्तों में 10-12 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी करते जाते हैं। लेकिन जब मजदूरों को देने की बारी आती है तो उनको देने के लिए घाटे का बहाना होता है। कंपनी मैनेजमेंट कहता है कि काम नहीं है जबकि मजदूर काम करने को तैयार हैं। कंपनी में मजदूर काम करने के लिए भर्ती होते हैं न कि कंपनी के लिए काम के आर्डर लाने के लिए। काम का आर्डर लाने का काम तो कंपनी का है।
मजदूर लम्बे समय से देरी से वेतन दिए जाने से परेशान थे। मजदूरों को श्रम कानूनों के अनुसार 7 से 10 तारीख के बीच वेतन दिए जाने का प्रावधान है लेकिन यहां पर 25 तारीख हो जा रही थी। मजदूर शुरू-शुरू में जैसे-तैसे, लेट-सेट वेतन लेने के लिए मजबूर होते रहे। लेकिन कंपनी ने देरी से वेतन देने के साथ-साथ मजदूरों पर अन्य हमले भी शुरू कर दिए। जिसमें मजदूरों को बिना ट्रेनिंग के नयी मशीनों पर ट्रांसफर करने के रूप में हमला, जूते-वर्दी न दिए जाने और ट्रांसपोर्ट के पैसों में कटौती का हमला बोला गया। ट्रांसपोर्ट के पैसों में जब कटौती की गई थी उस समय प्लांट की स्थिति खराब होने का बहाना बनाया गया था। लेकिन अब स्थिति ठीक है फिर भी यह कटौती जारी है। कैंटीन में खाने की गुणवत्ता खराब है। मैनेजमेंट ने वेतन समझौता वार्ता 16-17 महीनों से लटका कर रखी हुई है। इन हमलों से परेशान मजदूरों ने अपनी मांगों को लेकर 16 सितंबर को बैठकी हड़ताल कर दी।
A और B शिफ्ट के मजदूर कंपनी के अंदर और C शिफ्ट के मजदूर गेट के बाहर हड़ताल पर बैठ गये। हड़ताल के शुरू होने के साथ ही मालिक ने अपनी मित्र पुलिस को भी तैनात कर दिया। मजदूरों ने हड़ताल के दौरान धूप-बारिश और रात को सोने इत्यादि का इंतजाम तिरपाल लगाकर कर रखा था। अमानवीय मैनेजमेंट ने अपनी मित्र पुलिस से उस टेंट/तिरपाल को उखाड़वा दिया। लेकिन मजदूरों ने भी बिना टेंट के अपनी हड़ताल को जारी रखा। कंपनी हर हथकंडे अपना कर हड़ताल को समाप्त करने की कोशिश करती रही। लेकिन मजदूर भी मैनेजमेंट के हथकंडों को लम्बे समय से देख और सहते आ रहे थे। मजदूरों ने भी भांति-भांति के हमलों के बावजूद अपनी हड़ताल को जारी रखा। मजदूरों की एकता भाईचारे के सामने मैनेजमेंट ने मजदूरों की मांगों पर वार्ता करना शुरू कर दिया। इस प्रकार दो तीन दौर की त्रिपक्षीय वार्ता में कुछ मांगों पर मजदूर प्रतिनिधि और मैनेजमेंट के बीच सहमति बनी। जिन बिंदुओं पर सहमति बनी वह इस प्रकार है- मजदूरों को 15 से 20 तारीख के बीच में वेतन दिया जाएगा। जूते-वर्दी पर भी सहमति बनी। मजदूरों के विभाग बदलने पर उन्हें ट्रेनिंग दी जाएगी। मैनेजमेंट मजदूरों के प्रति किसी भी प्रकार की द्वेष भावना नहीं रखेगा। इस तरह मजदूरों ने आंशिक जीत के साथ तीसरे दिन हड़ताल को समाप्त कर दिया।
इस हड़ताल की सबसे बड़ी कमी ठेका मजदूरों की भागीदारी न कराना रहा। कंपनी पर हड़ताल का तभी असर होता है जब कंपनी में काम जीरो हो जाए। अगर कंपनी चल रही है और मजदूर हड़ताल पर बैठे हैं, तो कंपनी पर ज्यादा असर नहीं होता। इसलिए मजदूरों को प्रबंधन को अपनी मांगों के सामने झुकाने के लिए प्लांट पूर्ण रूप से बंद कराने पर जोर देना चाहिए। यह तभी सम्भव है जब स्थाई और ठेका मजदूर एकजुट होकर मालिकों को चुनौती पेश करेंगे। मालिकों को चुनौती देने में आज के समय में स्थाई मजदूर संख्या बल के तौर पर पर्याप्त नहीं है। अगर इस कंपनी के मजदूर और तैयारी व ठेका मजदूरों को अपने साथ लेकर हड़ताल करते तो और बेहतर समझौता होता। अगुवाई करने वाले मजदूरों को भविष्य में इन बातों को ध्यान में रखने की जरूरत है। -गुड़गांव संवाददाता