एक हिन्दू खतरे में कैसे? -मृगया शोभनम्

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 करता है सवाल एक जेन-जी
    जो पैदा हुआ हिन्दू घर में
    एक हिन्दू खतरे में कैसे?
 
 देश का राष्ट्रपति : हिन्दू
 देश का उप राष्ट्रपति : हिन्दू
 देश का प्रधानमंत्री : हिन्दू?
 देश का मुख्य न्यायाधीश : हिन्दू?
    लोकसभा का अध्यक्ष : हिन्दू
    सेना का अध्यक्ष : हिन्दू
   फिर हिन्दू खतरे में कैसे! खतरे में हिन्दू कैसे!

 सेना में : हिन्दू
 पुलिस में : हिन्दू
 पी ए सी में : हिन्दू
 रेपिड एक्शन फोर्स में : हिन्दू
 आई बी में : हिन्दू
 सी बी आई में : हिन्दू
   फिर हिन्दू खतरे में कैसे! खतरे में हिन्दू कैसे!
 
 पक्ष का नेता : हिन्दू
 विपक्ष का नेता : हिन्दू
 सबसे अमीर आदमी : हिन्दू
 सबसे गरीब आदमी : हिन्दू
    वामपंथी : हिन्दू
    दक्षिणपंथी : हिन्दू
   फिर हिन्दू खतरे में कैसे! खतरे में हिन्दू कैसे!
 
 न्यायाधीश : हिन्दू
 वकील : हिन्दू
 पेशकार : हिन्दू
 आई ओ : हिन्दू
 जेलर : हिन्दू
 कैदी : हिन्दू
   फिर हिन्दू खतरे में कैसे! खतरे में हिन्दू कैसे!
 
 पहाड़ में : हिन्दू
 मैदान में : हिन्दू
 बाजार में : हिन्दू
 दुकान में : हिन्दू
 मंदिर में : हिन्दू
 शमशान घाट में : हिन्दू
   फिर हिन्दू खतरे में कैसे! खतरे में हिन्दू कैसे!
 
 फिर...फिर सच क्या है? क्या है सच?
 नहीं है, खतरे में हिन्दू! खतरे में नहीं है, हिन्दू!?
 खतरे में हैं वे जो करते हर वक्त, हिन्दू! हिन्दू!
 जेन-जी दिखायेगा, उनको दिन में तारे
 जो करते हैं, हर वक्त हिन्दू! हिन्दू!
   (साभार : ‘यह वक्त नहीं चुप रहने का’ कविता संग्रह से)

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।