फासीवाद और लोकतंत्र-संविधान के बीच पिसता मजदूर वर्ग

Published
Thu, 10/01/2026 - 15:50
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देश में फासीवादी हमलों ने लोकतंत्र-संविधान की बहस को तीखा कर दिया है। इस पूरी बहस में अगर कोई गायब है तो वह है मजदूर वर्ग। जैसे मानो लोकतंत्र में मजदूर वर्ग का कहीं कोई स्थान ही नहीं है। इस पूरी बहस को कैसे देखें और कैसे समझें यह मजदूर वर्ग को काफी हद तक परेशान करता रहा है। अपने आप को मजदूर वर्ग का हितैषी बताने वाली तथाकथित वामपंथी पार्टियां और उनके जनसंगठन भी इसी बहस में खुद का बचाव करते नजर आ रहे हैं। ये वामपंथी पार्टियां और उनके जनसंगठन फासीवाद के खिलाफ इण्डिया गठबंधन बनाकर ‘‘लोकतंत्र बचाओ’’ अभियान में कूद गये हैं। इस ‘‘लोकतंत्र बचाओ’’ अभियान में कहीं से भी मजदूर वर्ग पर हो रहे हमलों का जिक्र तक नहीं है। इस अभियान में समाज के तमाम शोषित-उत्पीड़ित तबकों का जिक्र है, लेकिन मजदूर वर्ग से इस अभियान ने पूरी तरह से मुंह मोड़ रखा है। किसानों का जिक्र है, छात्रों का जिक्र है, अल्पसंख्यकों का जिक्र है और यहां तक कि जल, जंगल, जमीन का जिक्र है बस पर्यावरण की दृष्टि से, लेकिन मजदूर वर्ग इनके ‘‘लोकतंत्र बचाओ’’ के अभियान से बिलकुल गायब है। 
    
सत्तारूढ़ पार्टियों के साथ बने गठबंधन में तमाम तथाकथित वामपंथी पार्टियां शामिल हैं। इण्डिया गठबंधन का यह ‘‘लोकतंत्र बचाओ’’ अभियान भाजपा के खिलाफ है। वामपंथी पार्टियों ने वैसे तो बहुत समय पहले माक्र्सवाद का विर्सजन कर दिया था, लेकिन बची-खुची निशानियों को बीजेपी के सत्ता में आने के बाद तिलांजलि दे दी है। अपनी जमीन को छोड़कर तमाम वामपंथी दलों का मकसद सिर्फ कांग्रेस काल को पुनः बहाल करना बन गया है। 
    
इसलिये आज कांग्रेस से लेकर उदार, लोकतंत्रवादी व वामपंथी भी ‘‘लोकतंत्र बचाओ’’ अभियान की वकालत हर प्लेटफाॅर्म पर कर रहे हैं। मीडिया का बड़ा हिस्सा- प्रिंट मीडिया से लेकर, टेलिविजन व सोशल मीडिया तक इस बहस से अछूता नहीं है। पहले सी.ए.ए. विरोधी आंदोलन, उसके बाद किसान आंदोलन और हाल ही के छात्रों-नौजवानों के इस आंदोलन ने जैसे ‘‘लोकतंत्र बचाओ’’ आंदोलन को आक्सीजन देने का काम किया है। लोकतंत्र की चैहद्दी से बाहर जाते देख शासक वर्ग तुरंत लोकतंत्र का चोला ओढ़ कर आंदोलन को फिर वहीं खींच कर ले आता है जिसका वह पिछले 75 वर्षों से ढिंढ़ोरा पीट रहा है। 
    
‘‘लोकतंत्र बचाओ’’ के इस अभियान को मजदूर वर्ग को किस नजरिये से देखना चाहिए? यह बहुत ही मौजूं सवाल बन जाता है। इसके लिए इस ‘‘लोकतंत्र बचाओ’’ अभियान व फासीवादी हमलों की जांच-पड़ताल मजदूर वर्ग के दृष्टिकोण से करनी व समझनी पड़ेगी। 
    
देश में हिन्दू फासीवाद का खतरा लगातार बढ़ रहा है। वर्ष 2014 से पहले कांग्रेस की गठबंधन की सरकार थी। हिन्दू फासीवादियों के सत्ता में आने के बाद मजदूर-मेहनतकश जनता पर हमले तेज हो गए हैं। जो कांग्रेस आज हाथ में संविधान की किताब लेकर संसद के अन्दर ‘‘संविधान बचाने की बात कर रही है और कह रही है कि देश को दो लोग (अंबानी, अडाणी) चला रहे हैं तो इसमें कोई सन्देह नहीं किया जा सकता कि आज अम्बानी-अडाणी, टाटा-बिडला जैसों की एकाधिकारी पूंजी का आकार बढ़ाने में उदारीकरण-नीजिकरण की नीतियों का बड़ा हाथ है और उन नीतियों की प्रस्तोता तो खुद कांग्रेस सरकार थी। आज मोदी सरकार उन्हीं नीतियों को तेजी से आगे बढ़ा कर अम्बानी-अडाणी जैसे एकाधिकारी पूंजीपतियों की दौलत में तेजी से वृद्धि कर रही है। वर्ष 2020 में लाये गए काले कृषि कानून, मजदूरों के 29 केन्द्रीय श्रम कानूनों को खत्म कर लाए गए लेबर कोड्स इन्हीं उदारीकरण की नीतियों का परिणाम है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस, एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की चहेती पार्टी नहीं है। लम्बे वक्त तक तो कांग्रेस पूंजीपति वर्ग की पहली पसंद रही है। और देश की आजादी के बाद देशी पूंजी को फलने-फूलने में कांग्रेस ने जो रोड़ मैप पूंजीपति वर्ग को दिया उसी की बदौलत 1991 आते-आते भारत के पूंजीपति वर्ग का आकार इतना बड़ा हो गया कि अब उसमें बुनियादे ढ़ांचे से लेकर सार्वजनिक उद्यम तक को अपने कब्जे में लेने की होड़ लग गई। 
    
एकाधिकारी पूंजी की बढ़ती मुनाफे की लालसा को कांग्रेस पूरा नहीं कर सकती थी। इसलिए एकाधिकारी पूंजी ने आर.एस.एस.-भाजपा पर दांव पर लगाया और वर्ष 2014 में हिन्दू फासीवादी गिरोह को सत्ता तक पहुंचा दिया। पिछले 12 सालों में हिन्दू फासीवादियों ने एकाधिकारी पूंजी की दौलत में बेतहाशा वृद्धि की है। आर.एस.एस. और एकाधिकारी पूंजी का गठजोड़ तमाम लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को धता बता रहा है। लोकतंत्र ने एकाधिकारी पूंजी के फलने-फूलने के लिए जमीन तैयार की और आज जरूरत पड़ने पर एकाधिकारी पूंजी उसके खुद के लोकतंत्र को किनारे लगाने से भी गुरेज नहीं करेगी। 
    
वैसे पूंजीवादी लोकतंत्र में पूंजीपति वर्ग की तानाशाही ही होती है जिसे वह जनवाद का स्वांग रच कर उसकी तानाशाही को जनवाद से ढंकने का काम करता है। और कहता है कि लोकतंत्र सबके लिए समान है। लोकतंत्र में मजदूर-मेहनतकश के लिए कितना जनवाद है यह हम कांग्रेस के शासन काल के दौरान भी देख चुके है जहां 1975 में जेपी आंदोलन को कुचलने के लिए कांग्रेस की इंदिरा शासन ने आपातकाल लागू कर जनता के सभी जनवादी अधिकारों को फौजी बूटों तले रौंद दिया था। आपातकाल का यह प्रावधान भी मजदूर-मेहनतकशों के खिलाफ इसी संविधान में है। पिछले 12 वर्षों से मोदी काल का अघोषित आपातकाल मजदूर-मेहनतकश जनता झेल रही है। 
    
हिन्दू फासीवादी निर्मम होकर मजदूर- मेहनतकशों की लूट की खुली छूट पूंजीपति वर्ग को दे रहे हैं और हिन्दू फासीवादियों का हमला जैसे-जैसे तीखा हो रहा है तो कांग्रेस से लेकर तमाम वाम-उदारवादी अब लोकतंत्र की शरण में हिन्दू फासीवाद का समाधान देख रहे हैं। जबकि एकाधिकारी पूंजी और पूंजीपति वर्ग इस पूरे सीन से गायब है। यानी मजदूर-मेहनतकश जनता हिन्दू फासीवादियों और लोकतंत्र-संविधान बचाने के बीच लगातार पिस रही है। मजदूर मेहनतकशों के जनवाद पर जब हिन्दू फासीवादी हमला कर रहे हैं तो उसका समाधान सिर्फ संविधान या लोकतंत्र की चारदीवारी के भीतर देखना यह पूंजीपति वर्ग की रक्षा पंक्ति के अलावा और कुछ नहीं है।  
    
दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देशों में लोकतांत्रिक अधिकारों को स्थापित करने व विस्तारित करने का काम मजदूर-मेहनतकशों के संघर्षों ने ही किया है। आज जब दुनिया के पैमाने पर फासीवादी हुकूमत कायम हो रही है और जनवाद पर हमले बढ़ रहे हैं तो इसके पीछे का सबसे बड़ा और बुनियादी कारण मजदूर वर्ग को और ज्यादा निचोड़ना है। एकाधिकारी पूंजी ने दुनिया के पैमाने पर फासीवादी सत्ताओं को सत्ता के दरवाजे पर पहुंचाया है। दुनिया की खाक छानती एकाधिकारी पूंजी उन तमाम बंदिशों को अपनी ताकत से रौंद रही है जिसको मजदूर वर्ग ने अपने वर्ग संघर्ष के जरिये उसके ऊपर लगाया था। अफ्रीकी महाद्वीप में साम्राज्यवादी पूंजी की छीना-झपटी वहां की मजदूर-मेहनतकश जनता को गृहयुद्धों में धकेल कर उन्हें भूखों मरने पर मजबूर कर रही है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का दम्भ भरने वाले अमेरिका और यूरोपीय साम्राज्यवादियों ने तमाम मुल्कों को खंडहरों में तब्दील कर दिया है। गाजा में जारी नरसंहार के आगे क्या तो यू.एन. और क्या अंतर्राष्ट्रीय कानून सबको अमेरिकी साम्राज्यवादी धता बता रहे हैं और गरीब व पिछड़े देशों के लोकतंत्र को अपने ताकतवर हथियारों से मिट्टी में मिला रहे हैं। यहां तक कि मानवीय संवेदना से परे होकर एकाधिकारी पूंजी के लूट-पाट का खूनी रथ सरपट दौड़ रहा है और इस लूट-पाट का सबसे ज्यादा मुनाफा एकाधिकारी पूंजी बटोर रही है। 
    
मजदूर-मेहनतकश जनता को अपने लम्बे संघर्षों के अनुभव से अब लोकतंत्र-संविधान की उस अन्तर्वस्तु को समझना होगा जिसका वह अपने संघर्षों में प्रत्यक्ष अनुभव करती है। यह संविधान मालिकों की निजी सम्पत्ति की रक्षा के लिये सबसे पहले उसकी पैरवी करता है। मारूति आंदोलन 2012 का उदाहरण हमारे सामने मौजूद है कि जब हाईकोर्ट ने मजदूरों की जमानत याचिका को यह कहकर खारिज कर दिया कि इससे विदेशी निवेश प्रभावित होगा। यही भारत के संविधान की मूल आत्मा है कि निजी सम्पत्ति (निजी सम्पत्ति से मतलब पूंजीपति वर्ग की सम्पत्ति से है) की रक्षा करना न कि श्रम के साथ न्याय करना। मजदूर वर्ग को न्याय उनके वर्गीय संघर्षों की स्थिति से मिलता है। लेकिन पूंजी का चरित्र संविधान को पुनः बहाल करने से नहीं बदल सकता। फासीवाद संविधान में दर्ज मजदूर-मेहनतकशों के उन थोड़े अधिकारों को भी कुचल देता है। दोनों सूरत (पूंजीवादी लोकतंत्र और फासीवाद) में मजदूर वर्ग के श्रम की लूट बंद नहीं हो सकती। दोनों निजाम (जो दरअसल पूंजीवादी शासन के ही दो रूप हैं) मजदूर वर्ग के दुश्मन हैं। 
    
पूंजीवादी लोकतंत्र पूंजी की श्रम पर तानाशाही के सिवा कुछ नहीं है वहीं फासीवाद को मजदूर-मेहनतकशों पर एकाधिकारी पूंजी के नग्न-क्रूर हमले से काटकर नहीं समझा जा सकता। फासीवादी ताकतों का मुकाबला व इनके हमले से मजदूर वर्ग की रक्षा पूंजीवादी लोकतंत्र या संविधान बचाने की मांग करने वाली पूंजीवादी-सुधारवादी ताकतें नहीं कर सकतीं। फासीवाद का मुकाबला क्रांतिकारी मजदूर वर्ग बाकी मेहनतकश तबकों को साथ लेकर ही कर सकता है और उसका लक्ष्य लोकतंत्र या संविधान बचाने के बजाय पूंजी के राज का खात्मा और मजदूर राज-समाजवाद की स्थापना ही हो सकता है।  

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