हिंदू फासीवादी और लद्दाख

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
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केंद्र सरकार ने लद्दाख को नया झुनझुना थमाने की कोशिश की है। काफी पहले हिंदू फासीवादियों ने जम्मू कश्मीर के विभाजन और 370 के खात्मे से पहले भी इस इलाके की जनता को ढेरों झूठे सपने दिखाए थे। जिसका हश्र यहां की जनता के सामने है। 
    
लद्दाख को लेकर केंद्र सरकार का यह नया झुनझुना है- अनुच्छेद 371 में एक नया अध्याय 371(K) जोड़कर इसके तहत लद्दाख को विशेष राज्य का दर्जा देने का प्रस्ताव। यह और कुछ नहीं लद्दाखियों की भावनाओं से खिलवाड़ है और उन्हें अपने जाल में फंसाए रखने की रणनीति है।
    
हाल ही में गृह मंत्रालय की उप समिति की बैठक में इस सम्बन्ध में यह प्रस्ताव रखा गया। इसके मुताबिक लद्दाख के लिए एक सीधे निर्वाचित संघ राज्य क्षेत्र स्तरीय निकाय होने की बात की गई साथ ही भूमि, संस्कृति, पर्यावरण की रक्षा की संवैधानिक गारंटी की बात कही गई। लेकिन लद्दाख के नेतृत्व को इसका कोई लिखित मसौदा नहीं सौंपा गया। दावा किया जा रहा है यह निकाय सबसे ऊपर होगा और आम जनता से सीधे चुनाव के जरिए इसका गठन होगा। जाहिर है इसके लिए निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या तय करनी होगी और परिसीमन करना होगा। प्रस्ताव के हिसाब से पुलिस प्रशासन इसके अधीन नहीं होगा। 
    
जाहिर है यह भी लद्दाख की जनता के संघर्ष और मांग के दबाव में ही करना पड़ा मगर अभी भी मोदी सरकार धूर्तता से पीछे नहीं हटी है। 
    
लद्दाख के लिए छठी अनुसूची में डालने और इसे अलग पूर्ण राज्य का दर्जा देने की मांग की जा रही थी। साथ ही भूमि, नौकरियों, संस्कृति और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए ठोस संवैधानिक गारंटी की मांग थी। इसके अलावा लेह और कारगिल के लिए अलग लोकसभा सीटें गठित करने की मांग थी।
    
इसीलिए पिछले साल उग्र प्रदर्शन लद्दाख में हुए। संघर्ष की अगुवाई लेह एपेक्स बाडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) ने की। मगर इस कथित प्रस्ताव में न तो राज्य का दर्जा हासिल हुआ, न ही केंद्र शासित प्रदेश की तर्ज पर विधानसभा। लेह एपेक्स बाडी लद्दाख स्वायत्त हिल काउंसिल से तो कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) कारगिल स्वायत्त हिल काउंसिल से संबंधित है। लद्दाख इन दो हिस्सों में बंटा हुआ है जिसमें से प्रत्येक में तीन जिले हैं। 
    
लेह एपेक्स बाडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) ने लिखित मसौदा नहीं होने की बात की है। और इस तरह के कथित प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है। एक समय के सोनम वांगचुक जो 370 के विरोधी थे और अलग लद्दाख की बात करते थे और 2019 में 370 के निष्प्रभावी होने और दो हिस्सों में जम्मू-कश्मीर को बांट देने के कट्टर प्रशंसक थे वह भी हताश-निराश हैं। इस मामले में मोदी के आलोचक हो चुके हैं। 2019 में अनुच्छेद 370 हटाते समय लद्दाख को राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करने का वादा किया गया था। इसे विधानसभा के बिना अधिकारहीन केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। जाहिर है इसके खिलाफ आक्रोश तो होना ही था।
    
लेह एपेक्स बाडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) की ओर से सोनम वांगचुक ने कहा कि एक हफ्ते के भीतर ठोस आश्वासन नहीं मिला तो सितंबर में नया आंदोलन शुरू होगा। उन्होंने केंद्र सरकार के सामने यह शर्त रखी है कि भविष्य में बनने वाला निर्वाचित निकाय नौकरशाही से ऊपर होना चाहिए और उसके पास कानून-व्यवस्था पर नियंत्रण का अधिकार होना चाहिए।
    
लेह एपेक्स कमेटी के वरिष्ठ नेता थुपस्तान छेवांग (जिन्होंने इस कमेटी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था) वही हैं जो भाजपा के झंडे से चुनाव लड़कर लद्दाख से सांसद बने थे। काफी बाद में ये पार्टी से अलग हो गए। इस कमेटी के भीतर भी आंतरिक मतभेद हैं। थुपस्तान छेवांग ने मौजूदा कथित प्रस्ताव का समर्थन किया है। जबकि कारगिल कमेटी के नेता सज्जाद करगिली इस प्रस्ताव के विरोधी हैं। के डी ए और एल ए बी दोनों चाहते हैं कि प्रस्तावित निकाय के पास कानून-व्यवस्था और पुलिस जैसी वास्तविक शक्तियां हों, जैसा कि पुडुचेरी माडल में है। केंद्र का प्रस्ताव दिल्ली माडल के करीब है, जहां कानून-व्यवस्था के मामले उपराज्यपाल के पास रहते हैं, और यह मुख्य अड़चन है।   
    
इनका मानना है कि सरकार ‘बड़े कारपोरेट्स और औद्योगिक लाॅबी’ के दबाव में छठी अनुसूची का वादा तोड़ रही है, साथ ही केंद्रीय नियंत्रण बनाए रखना चाहती है ताकि लद्दाख के संसाधनों की लूट को आसान बनाया जा सके। यही सच्चाई भी है। एकाधिकारी पूंजी के निरंकुश नियंत्रण और संसाधनों की नग्न लूट खसोट के लिए सांप्रदायिक उन्माद और ध्रुवीकरण सबसे ज्यादा मुफीद है। 
    
जम्मू-कश्मीर के मामले में इसके विभाजन और स्टेटस को खत्म करने से पहले हिंदू फासीवादियों ने सांप्रदायिक उन्माद, ध्रुवीकरण और अंधराष्ट्रवाद का जो खेल खेला था वह अब भी जारी है। जम्मू-कश्मीर में यह एक तरीके से तो लद्दाख में यह दूसरे तरीके से खेला जा रहा है।  
    
एक रूप में लद्दाख की स्थिति कुछ-कुछ मणिपुर सी बनाने की कोशिश हो रही है। 1970 के दशक में लद्दाख को दो जिलों में बांट दिया गया। लेह और कारगिल। लेह वाले क्षेत्र में बौद्ध आबादी ज्यादा थी जबकि कारगिल में मुस्लिम आबादी। कारगिल के एक हिस्से में जांस्कर बौद्ध ज्यादा थे। इसके अलावा एक छोटा हिस्सा हिंदुओं का था जबकि सिक्ख और ईसाई भी हैं मगर बेहद कम। हिंदू फासीवादी पहले जम्मू-कश्मीर को धर्म के आधार पर जम्मू, कश्मीर और लद्दाख में बांटने के मंसूबे रखते थे। जम्मू हिंदू बहुल, कश्मीर मुस्लिम बहुल जबकि लद्दाख बौद्ध बहुल होता। हालांकि ऐसा नहीं किया गया। 
         
लेह-कारगिल के रूप में जिले के बंटवारे ने इस क्षेत्र को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का आसान शिकार बना दिया। इस बंटवारे को बौद्धों को ‘‘अल्पसंख्यक बनाने की साजिश’’ बताकर संघ परिवार ने इसका खूब इस्तेमाल किया। विशेषकर जांस्कर बौद्धों के बीच। जांस्कर क्षेत्र में बौद्ध और मुस्लिम जांस्करी के रूप में पहचान रखते थे। इनके बीच अंतरधार्मिक विवाह भी होते थे। यहां ईसाई भी हैं। आज यही जांस्कर बौद्ध एसोसिएशन बनाकर भाजपा और संघ के खुले समर्थक के बतौर काम कर रहे हैं। ये अलग पूर्ण राज्य और छठी अनुसूची की मांग के भी विरोधी हैं। लव जिहाद और धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। यह हिंदू फासीवादियों की सांप्रदायिक उन्माद और ध्रुवीकरण की राजनीति का ही नतीजा है। संघ परिवार (RSS) ने लद्दाख में ‘‘सिंधु दर्शन’’ जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से बौद्ध परंपरा को हिंदू धार्मिकता से जोड़ने की कोशिश की है जो जारी है। यह उत्सव 1997 में तत्कालीन भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी द्वारा शुरू किया गया था। RSS लेह में एकल विद्यालय और सेवा कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी उपस्थिति बढ़ा रहा है, जिनके जरिए वह स्थानीय युवाओं तक अपनी विचारधारा पहुंचा रहा है। इन गतिविधियों का असली मकसद लद्दाख की बौद्ध पहचान को हिंदू राष्ट्रवादी ढांचे में समाहित करना है, ताकि केंद्र सरकार की नीतियों को वैचारिक समर्थन मिल सके।
    
इसी प्रकिया में पहले लद्दाख को छठी अनुसूची में डालने और अलग राज्य का सपना दिखाया गया। फिर बाद में जब संघी बेनकाब हो गए तब लद्दाख में अलग पूर्ण राज्य तथा अन्य मांगों को लेकर आंदोलन शुरू हो गया। पिछले साल उग्र प्रदर्शन हुआ जिसमें गोलियां चलीं और 4 प्रदर्शकारियों की हत्या कर दी गई और कई घायल हुए। 
    
सांप्रदायिक उन्माद और ध्रुवीकरण फिर जोर-शोर से आगे बढ़ने लगा। अप्रैल 2026 में लद्दाख को दो से सात जिलों में बांटकर यह प्रक्रिया और तेज कर दी गई। नुब्रा, शम, चांगथांग, जांस्कर और द्रास नामक पांच नए जिलों के गठन को मंजूरी दी गयी जिससे कुल जिलों की संख्या सात हो गई। नए जिलों के गठन के बाद पांच जिले- जांस्कर, शम, नुब्रा, चांगथांग और लेह- बौद्ध बहुल हो गए, मुस्लिम बहुल केवल कारगिल और द्रास ही रह गए। इससे मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो गया। भले ही लद्दाख में मुस्लिम और बौद्ध आबादी लगभग बराबर है। इसका मकसद लेह और कारगिल की एकता को तोड़ना  है।
    
यह सांप्रदायिक विभाजन लद्दाख की जनता के अलग राज्य की चार सूत्रीय मांग को लेकर प्रदर्शनों को ‘बांटो और राज करो’ के तहत खत्म या कमजोर करना था।
    
इसी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के साथ-साथ लद्दाख की भूमि और प्राकृतिक संसाधनों पर कारपोरेट कब्जे की प्रक्रिया भी तेज हो रही है। लेह में 13 गीगावाट की सौर ऊर्जा परियोजना के लिए हजारों एकड़ चरागाह भूमि सोलर एनर्जी कारपोरेशन आफ इंडिया (SECI) को हस्तांतरित की जा चुकी है। यह भूमि चांगपा चरवाहों की पारंपरिक चरागाह है, जो दुनिया की सबसे महीन पश्मीना ऊन पैदा करते हैं।  इसके लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हो चुके हैं। 300 एकड़ भूमि पावर ग्रिड कारपोरेशन आफ इंडिया (PGCIL) को बिजली निकासी बुनियादी ढांचे के लिए पहले ही हस्तांतरित की जा चुकी है।  इस परियोजना में  जे एस डब्लू ऊर्जा, अडाणी हरित ऊर्जा, एज्युर पावर जैसी बड़ी निजी कंपनियां भाग ले रही हैं, जबकि सार्वजनिक कंपनियां उनके लिए मंच तैयार कर रही हैं।
    
यही नहीं लद्दाख के ग्लेशियरों, चूना पत्थर व यूरेनियम जैसे खनन, जल स्रोतों और ग्रेनाइट, लिथियम खनिज भंडारों का ‘‘बेतहाशा’’ दोहन किया जा रहा है। लद्दाख की अर्थव्यवस्था पर्यटन पर निर्भर है, लेकिन श्रीनगर, जम्मू और चंडीगढ़ के ठेकेदारों ने नौकरशाही से बेहतर संबंधों के दम पर स्थानीय बाजार पर कब्जा कर लिया है, जिससे लद्दाखी व्यवसायी हाशिये पर धकेल दिए गए हैं।
    
मौजूदा आंदोलन इसी के खिलाफ खड़ा है। यह लद्दाख की शासन सत्ता में भागीदारी चाहने और अपने हितों का संरक्षण चाहने वाले ऊपरी वर्ग की अगुवाई में चल रहा है। जो एक दौर में शासक वर्ग का ही हिस्सा रहा है। जिसके पीछे आम जनता भी लामबंद है जिसकी अपनी संवेदनाएं, अलग भौगोलिक, भाषाई, सांस्कृतिक पहचान का मामला और बेहतर जीवन की आकांक्षाएं हैं। फिलहाल इस बात की ही ज्यादा संभावना है कि हिंदू फासीवादी अपने गुर्गों के नियंत्रण में पुडुचेरी जैसा राज्य लद्दाख को बना दें। लेह और लद्दाख की दोनों कमेटियों के नेता इसे किंतु परन्तु के साथ स्वीकार कर लें। इसके साथ कुछ अन्य छूट भी इन्हें मिल जाये। मगर इससे आम जनता की जिदगी में विशेष फर्क नहीं पड़ने वाला। कुछ समय के विराम के बाद जिंदगी फिर इन्हें संघर्ष की ओर धकेल देगी। हालांकि इस बीच सांप्रदायिक उन्माद और ध्रुवीकरण के चलते मामला जटिल भी होगा। जैसा कि मणिपुर में स्थिति साफ तौर पर जटिलता को दिखा रही है।

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