जी-20 - लुटेरों का जमावड़ा, जनता की आफत

जी-20 का शिखर सम्मेलन 9-10 सितम्बर को दिल्ली में होना है। पर इसकी बैठकें साल भर से बीसियों शहरों में होती रही हैं। सितम्बर माह की हाई प्रोफाइल बैठकें नई दिल्ली, मुंबई, वाराणसी और रायपुर में होनी हैं। हिन्दुस्तान के इन सभी शहरों में जनता कौतूहल कर रही है कि क्या बात है कि सड़कों की रातों रात मरम्मत हो जा रही है। इन शहरों में पर्दा और पुताई संस्कृति भी देखी जा रही है। सरकारी अमला रातों रात कुछ चुनिंदा सड़कों की मरम्मत करवाने के साथ-साथ सड़क किनारे की बदसूरती (दीपक तले अंधेरे को चरितार्थ करती गरीबी, निर्माणाधीन भवन आदि आदि) को छुपाने के लिए बड़े स्तर पर पुताई के साथ-साथ सड़क किनारे परदे लगवा देता है।
    
अगर आपके शहर में कोई पर्यटक स्थल है और उसमें भी कोई धार्मिक पर्यटक स्थल है, जिस पर बीजेपी सरकार की नजर पड़ गयी हो और उसका कुछ जीर्णोद्धार कर दिया गया हो तो बहुत संभव है कि जी-20 के विदेशी मेहमानों को वहां घुमाने ले जाया गया हो, और अगर आपकी रोड पर कोई दुकान हो या आप कोई ठेला वगैरह लगाते हों, तो आपको रोड मरम्मत और पर्दा-पुताई दिखाने की कीमत एक-दो दिन अपनी दुकान बंद रख कर चुकानी पड़ी हो।
    
भारत पिछले एक साल से जी-20 का अध्यक्ष है। अध्यक्ष को बाकी सदस्य देशों के राय मशविरे से बैठकों का एजेंडा तय करने का अधिकार होता है। और इस अनौपचारिक संगठन जिसका कोई स्थायी सेक्रेटेरिएट भी नहीं होता, की अध्यक्षता भी उन सभी सदस्य देशों के बीच साल दर साल घूमती रहती है। भारत सरकार की इस अध्यक्षता की बारी काफी पहले आ गयी थी, पर भारत ने इसे पास कर दिया और फिर कोरोना के कारण बैठक नहीं हुई। दो बार अध्यक्षता पास करने के बाद आखिर लोक सभा चुनाव से ऐन पहले 2023 की अध्यक्षता को सरकार ने लपक लिया और इस अध्यक्षता को भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती साख के रूप में प्रचारित करना शुरू कर दिया।  
    
जी-20 के सदस्य देश कौन हैं और ये तमाम बैठकों में क्या करते हैं? दुनिया के लुटेरे साम्राज्यवादी देशों की पहल पर उनके अलावा इसमें ढेरों विकासशील देश शामिल हैं। साम्राज्यवादी आर्थिक संकटों में विकासशील देशों के साथ तालमेल इसका उद्देश्य है। विकासशील देश इसमें कुछ अपने हितों को साधने का प्रयास करते हैं, पर अक्सर ही इसकी बैठकें और आयोजन साम्राज्यवादी देशों की आपसी झड़पों और टकरावों की बलि चढ़ बेनतीजा रहते हैं। 

हर एक देश के प्रधानमंत्री/राष्ट्रपति और उनकी टीम के अलावा वित्तमंत्री और बैंकों के बड़े अधिकारी इन बैठकों और आयोजनों में अपने देशों का प्रतिनिधित्व करते हैं। दुनिया के इन सर्वोच्च स्टेटस वाली शख्सियतों की विशालकाय टीमों की भागीदारी से ये आयोजन बड़े हो जाते हैं। तमाम नामी गिरामी पांच सितारा होटलों में सैकड़ों कमरे इनके लिए बुक किये जाते हैं। 
    
जनता के हिस्से दुकान बंदी, काम बंदी, ट्रैफिक डायवर्जन आते हैं। और इसमें भागीदारी कर रहे प्रतिनिधियों को खाने पीने-सैर सपाटे के बीच कुछ रस्मी बैठकों में शिरकत कर कुछ अच्छी बातें कहनी सुननी होती हैं। जी-20 के पास वैसे तो कोई ऐसे कार्यभार नहीं हैं जिनके लिए यह संगठन बाध्य हो, पर इसका फलक बहुत विस्तृत है। राष्ट्राध्यक्षों और वित्त विभाग के अलावा इसमें इंगेजमेंट ग्रुप्स होते हैं, जिन पर जी-20 देशों की सिविल सोसाइटी, सांसदों, बुद्धिजीवियों, महिलाओं, नौजवानों, श्रमिकों, व्यवसाइयों और शोधार्थियों को साथ लाना होता है। 
    
जी-20 से जुड़े तरह-तरह के समूहों की बैठकें इस वर्ष की शुरूआत से भारत में विभिन्न शहरों में हुईं। इन बैठकों के सुझाव शीर्ष बैठक में रखे जायेंगे। इन सुझावों को मोटे तौर पर दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहली श्रेणी दुनिया भर के पूंजीपतियों-व्यवसायियों-व्यापारियों के हितों से संदर्भी हैं। इस मामले में सुझावों का सार यह है कि विभिन्न क्षेत्रों में उदारीकरण-वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया जाए। आयात-निर्यात, परस्पर तकनीकी-वैज्ञानिक सहयोग, सेवाओं का व्यापार निवेश आदि को बढ़ा कर पूंजीपतियों के मुनाफे को बढ़ाने की कोशिशें की जायेंगी। दूसरी श्रेणी शिक्षा-स्वास्थ्य-महिलाओं, मजदूरों की स्थिति सुधारने के बारे में हैं। इनमें सुझावों का प्रमुख जोर इस बात पर है कि उदारीकरण-वैश्वीकरण की नीतियां तेजी से बढ़ा सभी समुदायों की स्थिति सुधारी जा सकती है। इसी के साथ कुछ अच्छे लगने वाले लक्ष्यों को सदाचार के बतौर दोहरा दिया गया है मसलन् मजदूरों को अनौपचारिक क्षेत्र से औपचारिक क्षेत्र में लाना, सबके लिए शिक्षा, गरीबी हटाना, महिला-पुरुष जेंडर गैप खत्म करना, पर्यावरण सुरक्षा आदि आदि। इस बात को सुझावों में पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है कि अगर दुनिया के पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ेगा तो मजदूर वर्ग-युवाओं-रोजगार-महिलाओं की दुर्दशा भी बढ़ेगी। कुल मिलाकर जी-20 के शासक कुछ दिखावटी अच्छी बातें कर दुनिया भर की मजदूर-मेहनतकश जनता की लूट बढ़ाने पर एकमत हैं और शीर्ष बैठक में वे इसे ही परवान चढ़ायेंगे। 
    
उपरोक्त एकमतता के बावजूद जी-20 देशों के बीच भारी अंतरविरोध भी हैं। ये अंतरविरोध मूलतः लूट के बंटवारे को लेकर हैं। साम्राज्यवादी वर्चस्व के लिए पश्चिमी साम्राज्यवादियों व रूसी-चीनी साम्राज्यवादियों के बीच तीखी टकराहट है। यूक्रेन युद्ध के मसले पर यह टकराहट स्पष्ट तौर पर दिखती है। यह टकराहट इस हद तक बढ़ती रही है कि साझा बयान तक जारी करना कठिन होता रहा है। इसके अलावा तीसरी दुनिया के बड़े देशों के शासक भी अपनी लूट में हिस्सेदारी बढ़ाना चाहते हैं। ये टकराहटें ही दिखाती हैं कि लुटेरे भी अपने नारे ‘एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य’ पर कभी एकजुट नहीं हो सकते। शासक पूंजीपति व मजदूर-मेहनतकश तो परस्पर विरोधी परिवार व भविष्य के हैं ही। 
    
इस प्रकार दुनिया भर के शीर्ष पूंजीवादी साम्राज्यवादी शासकों की काफी इत्मीनान से सम्पन्न होने वाली मुलाकात बैठकों का नाम हैं जी-20। दुनिया में गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, बेरोजगारी, अस्वास्थ्य, प्रदूषण, भ्रष्टाचार को जन्म देने और पालने-पोषने वाली व्यवस्था को चलाने वाले शासक इन्हीं समस्याओं के समाधान के नाम पर कुछ अच्छी रस्मी बातें करने के अलावा एक दूसरे की टांग खिंचाई को रस्मी तौर पर करते हैं। दुनिया की जनता की लूट के बंटवारे में अपनी हैसियत को बढ़ाने की लड़ाई भी चलती रहती है। मोदी ने तो इस  पाखण्ड में भी अवसर खोजते हुए दिल्लीवासियों से अग्रिम माफी मांग ली है। मोदी ने कहा है कि जी-20 शिखर सम्मलेन के दौरान सुरक्षा कारणों से दिल्ली वालों को असुविधा का सामना करना पड़ेगा और इसके लिए मैं माफी मांगता हूं। गोदी मीडिया की मदद से इसे भी मोदी का बड़प्पन दिखाया जाएगा। ऐसा इसलिए सहज हो पायेगा क्योंकि हमारे देश में वर्गीय चेतना की भारी कमी है और पूंजीवादी विचारधारा ही सामान्यतः जनता पर हावी है। अपने श्रम को लुटाते मजबूर लोग इस पाखण्ड को महसूस तो करते हैं लेकिन उसे अभिव्यक्त करने वाला राजनीतिक विश्लेषण और विचारधारा उनके पास नहीं है। 

आलेख

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