जापान के बढ़ते सैन्यीकरण का बढ़ता विरोध

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
/japan-ke-badhate-sainyikaran-ka-badhata-virodh

19 अक्टूबर को जापान में लोग अमेरिका और जापान के बीच होने वाले सैन्याभ्यास का विरोध करने सड़क पर उतरे। ये सभी राष्ट्रीय डाइट भवन के सामने इकट्ठा हुए। वहीं दूसरी तरफ कुछ प्रदर्शनकारियों ने रक्षा मंत्रालय के सामने विरोध प्रदर्शन किया। कीन स्वार्ड 27 (ाममद ेूंतक 27) के नाम से होने वाला यह संयुक्त सैन्याभ्यास 19 से 29 अक्टूबर तक होगा। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री सनाई तकाइची का इस्तीफा मांग रहे थे। 
    
जापान के लोग पिछले लम्बे समय से जापान की साम्राज्यवादी सरकारों द्वारा जापान के किये जा रहे सैन्यीकरण का विरोध कर रहे हैं। उन्हें डर है कि अमेरिका के साथ किये जा रहे युद्धाभ्यास के कारण क्षेत्रीय तनाव बढ़ेगा। और युद्ध के कारण जान-माल का नुकसान होगा। वहीं बढ़ते सैन्यीकरण का खर्चा उनकी जेब से वसूला जाएगा। कीमतें बढ़ेंगी, करों का बोझ बढ़ेगा और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च भी बढ़ जायेगा। 
    
दरअसल शिंजो आबे के समय से ही जापान सैन्यीकरण की तरफ तेजी बढ़ रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान के संविधान में आर्टिकल 19 जोड़ा गया था। इस आर्टिकल में यह बात थी कि जापान सेना नहीं रखेगा। और युद्ध में भाग नहीं लेगा। अमेरिका ने युद्ध के बाद पैदा हुई परिस्थितियों का फायदा उठाकर जापान की सुरक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी के बहाने में भारी मात्रा में सैनिक तैनाती की। अमेरिका की 55,000 सेना जापान में तैनात है। 
    
अमेरिका चीन के साथ प्रतियोगिता में है और उसने जापान के साथ मिलकर दक्षिणी चीन सागर में तनाव की स्थिति पैदा कर रखी है। जापान के शासक भी अपनी पुरानी स्थिति से बाहर निकलना चाहते हैं। 2015 में शिंजो आबे ने एक विवादस्पद सुरक्षा विधेयक पास कराया था जो सीमित मात्रा में आत्मरक्षा में सैन्य बलों को रखने की छूट देता था। हमले के वक्त सहयोगियों की सहायता करने की छूट देता था। 21 अप्रैल, 2026 को सनाई तकाइची के शासन में एक नया कानून बनाया गया है जो हथियारों के निर्यात पर लगे प्रतिबंधों को हटा देता है और लम्बी दूरी की मिसाइलों को तैनात करने की छूट देता है। सैन्य खर्च को बढ़ाने और विदेशों में सैन्य भूमिका बढ़ाने की बात करता है। इसके बाद तो जापान के लोग इसके विरोध में उतर आये हैं और वे लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। 
    
जापान में मौजूद दक्षिणपंथी इस स्थिति का फायदा उठाकर आर्टिकल 19 को खत्म करने या कमजोर करने की तरफ बढ़ते रहे हैं। वे तर्क देते हैं कि आर्टिकल 19 जापान पर थोपा हुआ है और अमेरिका की इसमें सबसे बड़ी भूमिका है। अगर आर्टिकल 19 खत्म होता है तो इससे जापान के सैन्यीकरण में संवैधानिक बाधा खत्म हो जाएगी। और फिर जापान भी सैन्य दौड़ में शामिल हो जायेगा। इसका फायदा यहां के हथियार उद्योग को मिलेगा। और दुनिया में लूटपाट में उनका हिस्सा भी बढ़ेगा। जाहिर है साम्राज्यवादी जापान के पूंजीपति वर्ग की आज चाहत यही है। इसका खामियाजा जापान की मजदूर-मेहनतकश जनता उठाएगी। यह बात सामने आ रही है कि जापान अपने बजट का 2 प्रतिशत तक रक्षा बजट में खर्च करेगा जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बजट होगा। और इसकी पूर्ति जनता की सुविधाओं में कटौती करके होगी। जनता पर करों का बोझ बढ़ेगा, वस्तुओं की कीमतें बढ़ेंगी और सामाजिक सुविधाओं में कटौती होगी।
    
जापान का बढ़ता सैन्यीकरण अंतर साम्राज्यवादी संघर्षों को ही दिखा रहा है। अमेरिकी साम्राज्यवादी आज अपने फायदे के लिए एक हद तक जापान का सैन्यीकरण चाहते हैं तो खुद जापान का पूंजीपति वर्ग आज यही चाहता है। जापानी मजदूर-मेहनतकश जनता का संघर्ष अमेरिकी साम्राज्यवाद और जापानी पूंजीपति वर्ग दोनों से है।

जापानः अमेरिकी सेना के खिलाफ लोगों का आक्रोश फूटा

अक्टूबर के पहले सप्ताह में जापान के ओकीनावा में एक महिला के साथ लूटपाट और उसकी हत्या के आरोप में एक अमेरिकी सैनिक को गिरफ्तार किया गया। ओकीनावा में इस घटना के बाद जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुए। इससे पहले भी कई घटनाएं ऐसी हो चुकी हैं जिसमें महिलाओं और लड़कियों के साथ बलात्कार और हत्या के मामले में अमेरिकी सैनिकों की संलिप्तता सामने आयी है। 2016 में एक 20 वर्षीय महिला के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के मामले में एक अमेरिकी सैनिक को आजीवन कारावास की सजा भी हो चुकी हो। 1995 में एक 12 वर्षीय छात्रा की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गयी थी।1972 के बाद अब तक 6409 गिरफ्तारियां अमेरिकी सैनिकों की हुई हैं। 
    
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमेरिका की सेना जापान में तैनात है। ज्ञात हो कि द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की पराजय के बाद जापान पर सेना न रखने की शर्त थोप दी गयी थी और यह अमेरिकी सेना जापान की सुरक्षा के नाम पर तैनाती की गयी थी। ओकीनावा द्वीप पर अमेरिका की अधिकांश सेना तैनात है। जापान के लोग अमेरिकी सेना को जापान से हटाने की मांग करते रहे हैं। इसके साथ ही ओकीनावा जैसी घटनाएं आग में घी का काम करती रही हैं।  

Tags

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।