लक्जर मजदूरों के आवाज उठाने पर प्रबंधन मजदूरों को निकालने पर उतारू

हरिद्वार/ सिडकुल (हरिद्वार) में लक्जर राइटिंग इंस्ट्रूमेंट्स प्राइवेट लिमिटेड पेन निर्माता कम्पनी है। हरिद्वार सिडकुल में इसके दो प्लांट हैं जिसमें हजारों मजदूर काम करते हैं। जून के महीने में मजदूरों ने उत्तराखंड सरकार द्वारा बढ़ा हुआ वेतन लागू कराने के लिए 28 जून को काम बंद कर हड़ताल कर श्रम विभाग तक रैली निकाली थी। इससे पहले मजदूर वेतन बढ़ाने के लिए कई बार कम्पनी मैनेजमेंट व ठेकेदार से बात कर चुके थे। 28 जून की सुबह एक मजदूर के साथ मारपीट की गई जिसमें कम्पनी के ठेकेदार व गार्ड शामिल थे। इस घटना से मजदूर और ज्यादा भड़के और हड़ताल कर उन्होंने रैली निकाल दी। सिडकुल पुलिस ने मजदूरों के साथ बदसलूकी की व मजदूरों के ऊपर डंडे बरसाये। 
    
मजदूर जब श्रम विभाग पहुंचे तब लक्जर कम्पनी मैनेजमेंट के हाथ-पांव फूल गये। उसने मजदूरों को समझाने-बुझाने के लिए ठेकेदारों व अपने लोगों को भेजा लेकिन मजदूर वेतन वृद्धि के साथ-साथ और मांगों के लिए अडे़ रहे। मजदूरों व मैनेजमेंट के बीच एक लिखित समझौता हुआ। समझौते में कहा गया कि बढ़ा हुआ न्यूनतम वेतन दिया जाएगा, सैलरी स्लिप, गेट पास, छुट्टी, डबल ओवरटाइम व बोनस दिया जायेगा। 
    
लेकिन बाद में लक्जर कम्पनी मैनेजमेंट ने मजदूरों की मांगों को मानने के बजाय उल्टे मजदूरों को काम से निकालना शुरू कर दिया है। प्रबंधन अभी तक लगभग 30 से ज्यादा मजदूरों को निकाल चुका है। रोज मजदूरों के साथ काम के दौरान सुपरवाइजर व मैनेजर द्वारा डांटना-फटकारना और गेट बंद कर देना जारी है। बाहर ठेकेदार परेशान कर रहे हैं। वे लड़कियों को देख टीका-टिप्पणी करते हैं। 
    
पिछले साल दीवाली के समय करीब 50 महिला मजदूरों को काम से निकाल दिया गया था। कम्पनी मैनेजमेंट का कहना है कि इनकी उम्र ज्यादा हो गयी है और वे काम नहीं कर पा रही हैं लेकिन यह काम से निकालने का एक बहाना भर था। 
    
लक्जर कम्पनी में ज्यादातर मजदूर ठेकेदारी के तहत काम करते हैं। महिला मजदूरों की संख्या भी ठीक ठाक है। ठेके के मजदूरों से मशीनों पर काम कराया जा रहा है जो श्रम कानूनों का सीधे-सीधे उल्लंघन है। 5-10 साल से मजदूर काम कर रहे हैं लेकिन कम्पनी ने मजदूरों को स्थायी नहीं किया है। कम्पनी प्रबंधन रत्ती भर भी श्रम कानूनों का पालन नहीं करता है। प्रबंधन व ठेकेदारों द्वारा मजदूरों का शोषण-उत्पीड़न चरम पर है।
    
मजदूरों को 9 से 10 हजार रुपये वेतन देकर करोड़ों-अरबों रुपये कमाने वाली लक्जर कम्पनी के हरिद्वार, गुड़गांव व नोएडा में प्लांट हैं। लक्जर राइटिंग कम्पनी स्टेशनरी उत्पादों की एक भारतीय विनिर्माण कंपनी है। लक्जर अपने स्वयं के ब्रांड के तहत लेखन उपकरण और कार्यालय उत्पादों का निर्माण और विपणन करता है। साथ ही भारत में श्नाइडर, पार्कर और वाटरमैन पेन (न्यूवेल ब्रांड्स के साथ एक समझौते के बाद अंतिम दो ब्रांड) भी बेचती है। अतीत में, लक्जर ने पेपर वेट और पायलट उत्पादों का भी विपणन किया है। लक्जर कम्पनी भारत की लेखन उपकरणों की सबसे बड़ी निर्यातक है।
    
लक्जर कम्पनी के मजदूरों को अपने शोषण-उत्पीड़न को रोकने के लिए खुद ही आगे आना होगा। एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।           

-हरिद्वार संवाददाता
 

आलेख

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।