मोदी सरकार द्वारा 2014 में सत्ता में आने के बाद से जिस तेजी के साथ उदारीकरण-निजीकरण की जन विरोधी नीतियों को आगे बढ़ाया गया है, उसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में रिक्त पदों की संख्या 2015 के 4.21 लाख की तुलना में 2024 में 8.24 लाख अर्थात दो गुनी हो गई है।
केंद्र सरकार की सिविल एम्प्लोयीज के वेतन व भत्तों से जुड़ी व्यय विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 में जहां केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों के कुल स्वीकृत पद 36,49,468 थे और इसमें से 4,20,547 पद खाली पड़े थे, वहीं एक दशक बाद 2024 में 39,23,212 स्वीकृत पदों में से 8,23,556 पद खाली पड़े हैं।
इस रिपोर्ट के अनुसार रेलवे और स्वास्थ्य विभाग में जहां 2015 में एक भी पद खाली नहीं था, वहीं 2024 में यहां क्रमशः 2,40,125 और 1582 पद खाली पड़े हैं। इसी तरह डाक विभाग में 2015 के 7,561 खाली पड़े पदों की तुलना में 2024 में 61,546 पद खाली पड़े हैं। जबकि रक्षा विभाग (सिविल) में 2,41,643 एवं गृह मंत्रालय में 1,10,885 पद खाली पड़े हैं। इसी तरह अन्य विभागों राजस्व, लेखा, परमाणु ऊर्जा इत्यादि में भी हजारों की संख्या में पद खाली पड़े हैं।
इसके अलावा केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में कुल कर्मचारियों में से करीब आधे कर्मचारी इस समय संविदा अथवा ठेके पर हैं। पब्लिक इंटरप्राइजेज सर्वे के अनुसार 2015 में जहां केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में 15,87,149 कर्मचारियों में से 2,95,995 अर्थात 18.6 प्रतिशत कर्मचारी संविदा अथवा ठेके पर थे, वहीं 2025 में 15,42,339 कर्मचारियों में से 7,58,611 अर्थात 49.1 प्रतिशत कर्मचारी संविदा अथवा ठेके पर हैं। गौरतलब है कि 1991 में देश में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियां लागू होने के बाद से ठेका प्रथा ने एक परिघटना का रूप ले लिया है, जिसके तहत निजी ही नहीं बल्कि सरकारी-सार्वजनिक क्षेत्र में भी मजदूरों-कर्मचारियों का भयंकर शोषण किया जा रहा है।
इस तरह उदारीकरण-निजीकरण की जिन नीतियों को कांग्रेसी सरकारें अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ा रही थीं, उन्हें 2014 में केंद्र की सत्ता में काबिज होने के बाद संघी नरेंद्र मोदी की सरकार दु्त गति से आगे बढ़ा रही है। आखिर अडाणी-अम्बानी, टाटा-बिड़ला, जिंदल-सिंघानिया जैसे एकाधिकारी पूंजीपतियों द्वारा अपनी पूंजी की ताकत के बल पर संघ-भाजपा और मोदी को केंद्र की सत्ता पर काबिज भी इसीलिए कराया गया है।