मारूति प्रबंधन क्या कवच बदलकर वर्ग संघर्ष को रोक पाएगा?

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गुड़गांव/ मानेसर मारूति में 18 जुलाई 2012 में हुए मारूति काण्ड के पीछे असल कारण यह था कि मारूति यूनियन ने ठेका प्रथा खत्म करने तथा सभी ठेका मजदूरों को स्थाई करने के लिए मुखर मांग उठाई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि प्रबंधन ने मारूति काण्ड रच लगभग 150 मजदूरों को जेल भेज दिया, 1800 अस्थाई व 546 स्थाई मजदूरों की नौकरी समाप्त कर दी गई। स्थाई मजदूरों का केस आज भी लेबर कोर्ट गुड़गांव में चल रहा है। मजदूर कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं।
    
मारूति प्रबंधन ने उस दौरान जहां मारूति काण्ड को वर्ग युद्ध की संज्ञा दी वहीं ठेका प्रथा खत्म करने के नाम पर 7-7 महीने के लिए अस्थाई मजदूर (TW) रखने का प्रावधान किया। 5 माह के ब्रेक के बाद इन्हें दोबारा भी 7 महीने के लिए बुलाया जाता था। 
    
12 साल से कोर्ट के धक्के खाकर मारूति से बर्खास्त किए गए 546 मजदूरों ने मानेसर में दिनांक 18 सितम्बर 2024 में अपना धरना प्रदर्शन शुरू किया। जनवरी 2025 में इनके साथ भारी तादाद में मारूति के पूर्व अस्थाई मजदूर (TW) जुड़ गए। इनकी मांग स्थाई काम पर स्थाई रोजगार तथा सभी अस्थाई मजदूरों (TW) को स्थाई करने की थी। प्रशासन व प्रबंधन ने मजदूरों का धरना उजाड़ दिया, कहीं पर भी इन्हें एकजुट नहीं होने दिया। उसके बाद मारूति सुजूकी मजदूर संघ ने कम्पनी की इस संदर्भी नीति में मामूली बदलाव का एक व्हाट्सएप मैसेज जारी किया। मारूति प्रबंधन की ऐसी कोई विज्ञप्ति हमें अभी तक नही मिली है। 
    
मारूति प्रबंधन ने अस्थाई मजदूरों (TW) के स्वरूप को बदल दिया है। अब एक साल के लिए फिक्स टर्म इम्प्लॉयमेंट-1 को रखा जाएगा तथा परफारमेंस के आधार पर उन्हें फिक्स टर्म इम्प्लॉयमेंट-2 व फिक्स टर्म इम्प्लॉयमेंट-3 में रखा जाएगा। कुल मिलाकर इनको अधिकतम 36 महीने के लिए इसके बाद इन्हें परफारमेंस के आधार पर सी.टी. की परीक्षा में बैठने का मौका दिया जाएगा। 
    
18 जुलाई 2012 से पहले ठेका मजदूर 10-12 साल तक लगातार साथ में काम करते थे। उनके कोई अधिकार नहीं होते थे। लेकिन लगातार साथ में काम करने की वजह से उनकी स्थायी मजदूरों के साथ एक एकता बन जाती थी। इसी एकता को तोड़ने के लिए प्रबंधन ने ठेका मजदूर खत्म कर 6-7 माह के अस्थाई मजदूर रखे जिसे उनके आंदोलन के बाद अब उसने बढ़ा कर एक साल के लिए फिक्स टर्म पर रखना तय किया है ताकि मजदूर कोई आंदोलन ना कर सकें और अगर ऐसा किया तो उसमें यह भय बैठा रहे कि मुझे फिक्स टर्म इम्प्लॉयमेंट-2 व फिक्स टर्म इम्प्लॉयमेंट-3 में प्रमोट नहीं किया जाएगा। 
    
कुल मिला कर प्रबंधन की इस कार्यवाही को मजदूरों की जीत कहा जाए या प्रबंधन की जीत या वर्ष 2012 के वर्ग सघर्ष से डरे प्रबंधन की नित नई चालबाजी। सवाल यह भी है कि मजदूर अपने वर्ग संघर्ष को आगे बढ़ाएंगे या प्रबंधन के लालीपॉप का झंडा उठाए अपनी जीत का मुगालता पाले रहेंगे।           -गुड़गांव संवाददाता 
 

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