मुंह मियां मिट्ठू के ग्यारह साल

/munh-miyaan-mitthoo-ke-gayarah-saal

सोमवार 9 जून को देश भर के अखबारों में मोदी सरकार ने ‘विकसित भारत का अमृत काल : सेवा, सुशासन, गरीब कल्याण के 11 साल’ शीर्षक से विज्ञापन छपवाया। उस विज्ञापन में 15 उपलब्धियां गिनायी गयीं। जिन्हें ‘गरीब कल्याण’, ‘युवाओं के लिए अवसर अपार’ से लेकर ‘विरासत भी, विकास भी’ जैसे उपशीर्षक दिये गये। इस विज्ञापन के साथ मोदी ने एक्स पर इस संदर्भ में पोस्ट किये और भाजपा अध्यक्ष से लेकर कई मंत्रियों ने मोदी सरकार की ‘भूतोः न भविष्यति’ वाले अंदाज में प्रशंसा की। 
    
मोदी सरकार की आत्म प्रशंसा वाले इस विज्ञापन में एक भी राजनैतिक ‘‘उपलब्धि’’ का हवाला नहीं है। यह बड़े मजे की बात है। इसमें न धारा-370 की और न कश्मीर के भारत में ‘एकीकरण’ की चर्चा है और न इसमें मई माह में पाकिस्तान को ‘धूल चटा देने’ की चर्चा है। न इसमें भारत के बढ़ते ‘‘मान’’ विश्व गुरू बनने की चर्चा है और न जी-20 के ‘‘सफल आयोजन’’ के जरिये दुनिया में भारत के ‘‘धाक’’ जमाने की चर्चा है। न इसमें इस बात की चर्चा है कि कितनी विपक्षी सरकारें जोड़-तोड़ कर गिरायी और न इस बात की कि कितने विपक्षी दल तोड़ दिये। न इसमें ‘नए संसद भवन’ की चर्चा है और न नये संसद भवन में सेंगोल जैसे सामंती राजदण्ड को रखने की चर्चा है। न इसमें महिला आरक्षण की और न जाति जनगणना की चर्चा है। न इसमें नोटबंदी और न जीएसटी की चर्चा है। जब इन महान कार्यों की चर्चा नहीं है तो आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि मोदी सरकार बतायेगी कि 

* उसके काले कृषि कानून की किसान आंदोलन ने धज्जियां उड़ा दी। और भारत के इतिहास में वह पहली ऐसी सरकार बनी जिसे अपने बनाये कानून को एक साल के भीतर ठीक उसी प्रक्रिया में वापस लेना पड़ा जिस प्रक्रिया से उसे बनाया गया था।

* 2019 से पारित श्रम संहितायें आज तक लागू नहीं हो सकी।

* ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ जिसके जरिये वह न्यायालयों में काबिज होना चाहती थी कि योजना पर सर्वोच्च न्यायालय ने पलीता लगा दिया। 

* देश भर में हुए प्रतिरोध के चलते एन आर सी, एन पी आर को ठण्डे बस्ते में डालना पड़ा। सी ए ए का दांव चल नहीं पाया। 

* लाखों लोगों ने (विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 45 लाख से अधिक) ने मोदी सरकार के कुप्रबंधन, स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था के चलते कोविड-19 महामारी में प्राण त्याग दिये। ये सामान्य मृत्यु नहीं बल्कि मोदी सरकार के निकम्मेपन से उपजी संस्थागत हत्यायें हैं। 

* सैकड़ों लोग नोटबंदी के दौरान लाइन में लगने से मर गये।  

* पिछले 50 सालों में भारत में बेरोजगारी अपने चरम पर है। तीन में से दो युवा बेरोजगार है।

* मणिपुर को जलते हुए दो वर्ष से भी अधिक समय हो गया है। 
    
मोदी सरकार के कारनामों की यह सूची इतनी लम्बी बनेगी कि इतिहास में उसका नाम काले अक्षरों में ही लिखा जा सकता है। यह और बात है कि नड्डा दावा करते हैं कि मोदी सरकार के कार्यों को इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जायेगा। वैसे एक बात यह भी गौर करने की है कि मोदी सरकार के अनुसार भारत ‘विकसित भारत’ बन गया है। वाह! मोदी वाह!

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।