नेपाल बाढ़: व्यवस्था जन्य आपदा

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
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नेपाल बाढ़ की भयावह तस्वीरें टीवी चैनलों व सोशल मीडिया पर छाई हुई हैं। सैकड़ों लोगों के मारे जाने, हजारों लापता होने व सम्पत्ति के भारी नुकसान का अनुमान है। लापता लोगों में सैकड़ों भारतीय चीनी व अन्य विदेशी पर्यटक भी हैं। बाढ़ के चलते भारत के कई इलाकों के भी चपेट में आने की आशंका जाहिर की जा रही है।
    
बाढ़ की भयावहता इससे समझी जा सकती है कि कई गांव-बाजार-सड़कें-पुल एक झटके से चंद सेकेण्डों में बह गये। नेपाल की त्रिशूली, भोटेकोशी, शूली व नारायणी नदी में आई इस बाढ़ में नदियों के इर्द-गिर्द की भारी बसावट देखते ही देखते मलबे में बदल गयी। 
    
बाढ़ के कारणों का अभी तक यही पता चला है हिमालय की कोई चट्टान या हिमखण्ड ऊपर से नदियों के उद्गम स्थल में गिरा। कुछ समय तक नदी की धारा रोकने के बाद यह मलबा पानी के साथ तेज बहाव से नदियोें के रास्ते नीचे की ओर बढ़ा और उसने भारी तबाही पैदा कर दी। पहले बाढ़ से पूर्व भूकम्प की भी खबरें आ रही थीं पर बाद में पाया गया कि चट्टान के गिरने से भूकम्प सरीखा कम्पन पैदा हुआ। 
    
इस बाढ़ से तिब्बत में भी नुकसान की खबरें आ रही हैं। ढेरों मानसरोवर यात्री भी गायब बताये जा रहे हैं।
    
नेपाल सरकार इसे प्रकृति का कोप बता रही है। पर यह कोप प्रकृति से ज्यादा पूंजीवादी व्यवस्था के कुकर्मों का परिणाम है। वैसे ही हिमालयी क्षेत्र ज्यादातर भूकम्प, चट्टानें दरकने आदि के मामलों में संवेदनशील हैं। नदियां जब तब अपना रास्ता बदलती रही हैं। ऐसे में नदियों का पानी रोक बड़े बांध बनाने, नदियों के इर्द-गिर्द पर्यटन के नजरिये से रिसार्ट-होटल बनाने, नदियों को बांध कर सड़कें बनाने से लेकर नदियों की गाद की सफाई न करने तक के कारनामे किये जाते रहे हैं। सरकारें-पूंजीपति पहाड़ों की खूबसूरती को पूंजी में बदलने की खातिर मनमाने निर्माण करती रही हैं। साथ में ग्लोबल वार्मिंग हिमखण्डों को पिघला नदियों में गिरने का इंतजाम कर रही है। ऐसे में हिमालयी क्षेत्रों में पिछले कुछ दशकों में बार-बार आपदा के बावजूद सरकारें सबक लेने को तैयार नहीं हैं।
    
संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में निर्माण के लिए वृक्षों का भारी कटान भी पहाड़ों को दरकने की ओर ले जाता रहा है। अतः इस आपदा को प्रकृति से ज्यादा पूंजी के मुनाफे की हवस का परिणाम कहना अधिक सही होगा। 
    
आधुनिक विज्ञान के युग में ऐसी आपदाओं का पूर्वानुमान व समय रहते लोगों को सुरक्षित निकालने का तंत्र भी मौजूद है। पर नेपाल सरीखे देश को अमेरिकी-चीनी ऊंची तकनीक न मुहैय्या होने से वे इसका इस्तेमाल नहीं कर पाते। इन अर्थों में भी यह आपदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था को दोषी साबित करती है जहां गरीब मुल्कों के लोग कुछ सम्पन्न मुल्कों के तकनीक पर इजारे के चलते मरने को मजबूर होते हैं। 
    
अब आपदा के बाद राहत की हालत यह है कि अभी ढेरों इलाकों में पहुंचने की व मदद पहुंचाने की स्थिति भी नहीं बनी है। यहां भी पर्यटकों को बचाने की प्राथमिकता है पर आम गरीब नेपाली जनता का बचाव व राहत का काम भगवान भरोसे चल रहा है।  

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