बूढ़ा, बीमार डगमग-डगमग कर चलता पूंजीवाद

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पूरी दुनिया में इस वक्त राजनैतिक विक्षोभ है। मौसमी विक्षोभ की तरह इसका असर बड़े स्तर से लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग ढंग से हो रहा है। मौसमी विक्षोभ का असर तेज बारिश, बादल फटने आदि, आदि तरह की मौसमी घटनाओं के रूप में होता है। ऐसा ही कुछ राजनैतिक विक्षोभ की वजह से भी हो रहा है। कई सरकारें शासक वर्ग के आपसी अंतरविरोधों की वजह से ठप्प सी ही हैं तो कहीं सत्ता में बैठे लोगों के खिलाफ युवा और अन्य मेहनतकश सड़कों पर उतरे हुए हैं। फ्रांस, स.रा. अमेरिका, जापान वगैरह उन देशों के उदाहरण के रूप में हैं जहां सरकारें एक तरह के संकट में फंसी हुयी हैं तो नेपाल, मोरक्को, मेडागास्कर, इण्डोनेशिया जैसे देश दूसरी तरह की घटनाओं के रूप हैं। यहां ‘जेन-जी’ सड़कों पर उतर कर शासकों को चुनौती दे रहे हैं। 
    
फ्रांस में पिछले दो साल में एक के बाद एक करके पांच प्रधानमंत्री, फ्रांस के राष्ट्रपति द्वारा हटाये व नियुक्त किये जा चुके हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति मैंक्रो अपने खिलाफ पैदा हुए आक्रोश को एक के बाद एक प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर (या उनसे जबरदस्ती इस्तीफा दिलवाकर) थामने की कोशिश कर रहे हैं। परन्तु मामला उससे संभल नहीं रहा है। उनकी अलोकप्रियता बढ़ती जा रही है। हाल में उनके द्वारा घोषित नये कटौती कार्यक्रम के खिलाफ पूरे फ्रांस में व्यापक प्रदर्शन हुए हैं। फ्रांस की जनता ने मैंक्रो के ऊपर फ्रांस की विदेश नीति खासकर गाजा नरसंहार मामले में अच्छा खासा दबाव बनाया। नतीजा यह निकला कि फ्रांस को फिलिस्तीन को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देनी ही पड़ी। कुछ ऐसा करने को ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, कनाडा आदि भी मजबूर हुए हैं। ब्रिटेन में लम्बे समय की राजनैतिक अस्थिरता के बाद इस समय राजनैतिक स्थिरता है परन्तु गाजा व अन्य मामलों में संघर्षरत लोगों का दमन बढ़ा है। ब्रिटेन में दक्षिणपंथ व फासीवाद तेजी से सर उठा रहा है। वे बड़ी-बड़ी रैलियां आयोजित कर रहे हैं। अप्रवासियों के प्रति नफरत बढ़ी है। 
    
स.रा. अमेरिका में ट्रम्प बदहवास है। ‘शटडाउन’ वहां की दो प्रमुख पार्टियों ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी व उसकी विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी के गहरे अंतरविरोध के कारण लगा हुआ है। बजट न पास होने के कारण सरकार और उसके विभाग व संस्थान बंद हुए पड़े हैं। ट्रम्प एक के बाद एक धमकियां दे रहा है परन्तु उसकी मनमर्जी चल नहीं पा रही है। सरकारी कामकाज, विभाग ठप्प हैं। कर्मचारियों को वेतन भुगतान नहीं हो रहा है। हालांकि यह सच है कि ऐसे ‘शटडाउन’ वहां पहले भी हुए हैं और भारी सौदेबाजी के बाद इन दोनों पार्टियों के बीच किसी तरह का समझौता होने के बाद हालात सामान्य हुए हैं। देर सबेर इस बार भी ऐसा ही होगा। अप्रवासियों व फिलिस्तीन समर्थकों का निर्मम दमन ट्रम्प प्रशासन द्वारा किया जा रहा है। ट्रम्प इस सबके बीच अपने को घिरा पा रहा है। टैरिफ वाला उसका दांव भी उलटा पड़ता जा रहा है। 
    
जापान का हाल भी अच्छा नहीं है। राजनैतिक अस्थिरता कायम है। अभी एक महिला प्रधानमंत्री को चुना गया है। जापान जैसे देश में यह पहली महिला प्रधानमंत्री बनी है, इस तथ्य को खूब भुनाया जा रहा है। यद्यपि साने ताकाइची बेहद रूढ़िवादी हैं और उन्हीं जन विरोधी नीतियों को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहरा रही है जिनके लिए उनके पूर्ववर्ती जाने जाते थे, और जो शिंजो आवे से लेकर शिगेरू इशिबा के इस्तीफा देने का कारण बना। जापान गम्भीर आर्थिक व सामाजिक संकट से गुजर रहा है। जापान में इस सबका नतीजा यह निकल रहा है कि वहां फासीवाद फिर से जड़ जमा रहा है। ट्रम्प के ‘अमेरिका फर्स्ट’ के नारे की तर्ज पर ‘जापानी पहल’ नारा लगाने वाली ससेटो पार्टी ने अपना आधार बढ़ाया है और सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) का आधार घटा है। 
    
फ्रांस, अमेरिका, जापान के जैसी हालत कई साम्राज्यवादी देशों की है। ये बातें दिखला रही हैं कि विश्व पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था अपने तीखे होते अंतरविरोधों के कारण बीमार बूढ़ों की तरह डगमग-डगमग कर चल रही है। बदमाश ट्रम्प के ‘टैरिफ वार’’ के कारण कई-कई देशों की अर्थव्यवस्था में संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। पहले से बेरोजगारी की मार से त्रस्त युवाओं के सामने नयी मुसीबतें आकर खड़ी हो गयी हैं। 
    
फ्रांस, अमेरिका जैसे कई देशों में युवा और अन्य मेहनतकश आबादी धूर्त शासकों की गृह और विदेश नीति का खुलकर विरोध कर रहे हैं। फ्रांस, अमेरिका, इटली, स्पेन आदि देशों में जनता खुलकर अपने शासकों व इजरायल के खिलाफ तथा फिलिस्तीन के समर्थन में सड़कों पर उतरी है। हालिया समय में इटली और खासकर रोम में बहुत बड़े-बड़े प्रदर्शन आयोजित हुए हैं। रोम में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2.5 लाख लोग सड़कों पर उतरे हैं। ऐसा ही एक विशाल प्रदर्शन स्पेन के मैड्रिड शहर में आयोजित हुआ है। 
    
नेपाल में युवाओं के लोकप्रिय उभार व ‘जेन जी विद्रोह’ नाम से मशहूर आंदोलन ने वहां की स्थापित सत्ता को ताश के पत्तों की तरह ढहा दिया है। जैसा नेपाल में हुआ वैसा ही पहले श्रीलंका, बांग्लादेश में हो चुका था। ऐसे ही हालात दुनिया के एक दर्जन से ज्यादा देशों में बने हुए हैं। इनमें इण्डोनेशिया, पेरू, कीनिया, मोरक्को, मेडागास्कर जैसे अनेकोनेक देश शामिल हैं। इन देशों के जैसे हालात कभी भी किसी भी देश में पैदा हो सकते हैं। ये घटनाएं किसी अपवाद की तरह नहीं बल्कि एक नियम की तरह, एक के बाद एक, देश में घट रही हैं। वैश्विक परिघटना का रूप ले रही हैं। 
    
जन विद्रोहों का वैश्विक परिघटना का रूप लेना दिखला रहा है कि मजदूर-मेहनतकशों, बेरोजगार छात्र-युवाओं, उत्पीड़ित समुदाय-तबकों के लिए स्थिति अब बर्दाश्त करने की सीमा से बाहर हो चुकी है। 
    
यद्यपि अभी उनके निशाने पर आम तौर पर सत्ता में बैठे नेता या पार्टियां हैं। और जब भी एक नेता या पार्टी के स्थान पर दूसरे नेता या पार्टी आ रही हैं, वे भी शीघ्र ही अलोकप्रियता का शिकार हो जा रही हैं। पार्टी और नेताओं की उम्र काफी कम साबित हो रही है। फ्रांस से लेकर एशिया-अफ्रीका के कई देशों में ऐसे ही हाल हैं। भारत में आप पार्टी का उदय व पराभव अपनी कहानी आप कह देता है। आप पार्टी ने जितनी तेजी से स्थापित पार्टियों कांग्रेस व भाजपा के खिलाफ लोकप्रियता हासिल की उतनी ही तेजी से वह अपनी चमक भी खोती गयी। 
    
गौर से देखा जाये तो एक ओर पूरी दुनिया में शासक वर्ग का हमला अनेकोनेक रूप में मजदूर वर्ग सहित शोषित-उत्पीड़ित जनों पर बढ़ता गया है तो दूसरी ओर पूरी दुनिया में शोषित-उत्पीड़ित जनों सहित युवाओं का आक्रोश बार-बार फूट पड़ रहा है। ऐसे ही जहां शासक वर्ग के सबसे घृणित दक्षिणपंथी, रूढ़िवादी व फासीवादी हिस्से आक्रामक ढंग से सत्ता में दावेदारी ठोक रहे हैं तो वहीं शोषित-उत्पीड़ित जनों का आक्रोश जो वर्षों से जमा हो रहा है वह जन विद्रोह का रूप तक धारण कर ले रहा है। ये दोनों ही बातें यह दिखला रही हैं कि बूढ़े, बीमार डगमग-डगमग कर चल रहे पूंजीवाद का संकट गहरा रहा है। दुनिया के कई-कई देशों में यह क्रांतिकारी संकट का रूप तक धारण कर ले रहा है। इस संकट की जद में एक के बाद एक देश आते जा रहे हैं। और यह सब परिघटना का रूप धारण करता जा रहा है। 
    
इन संकटों के समय वैश्विक पूंजीवाद और साम्राज्यवाद बहुत तेजी से हस्तक्षेप कर इनको ऐसे ढंग से ‘मैनेज’ कर रहा है कि उनके हितों का कम से कम नुकसान हो। जन विद्रोह व जन आक्रोश उनकी व्यवस्था को न लील जाये इसके लिए वे ऐसे-ऐसे उपाय कर रहे हैं जो पहले प्रचलित न थे। श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल आदि देशों में उठे जन विद्रोह के भीतर अपने प्रशिक्षित एजेण्टों के जरिये साम्राज्यवादी हस्तक्षेप कर रहे थे। मोहम्मद युनूस जैसा उनका अपना प्रशिक्षित व्यक्ति बांग्लादेश में युवा आक्रोश के विस्फोट के बाद अंतरिम सरकार संभालता है। उसकी पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के प्रति निष्ठा असंदिग्ध रही है। यही बात श्रीलंका और अब नेपाल के बारे में सच है। धूर्त, बदनाम, भ्रष्ट राजनेताओं के बदले दूसरे शातिर परन्तु ईमानदार छवि धारण किये हुए प्रशिक्षित नेता या टेक्नोक्रेट सत्ता में बिठा दिये जाते हैं। वे इस सड़ती-गलती व्यवस्था के वीभत्स जन विरोधी चरित्र पर रंगीन, खूबसूरत मुलम्मा चढ़ाने की कोशिश करते हैं। हालांकि यह सब बहुत जल्दी अपनी चमक खो देता है परन्तु वैश्विक साम्राज्यवाद के सहयोग से उस देश का संकट तात्कालिक तौर पर हल हो जाता है। यह सब कुछ समय या तब तक चलता रह सकता है जब तक स्वयं मजदूर वर्ग सहित शोषित-उत्पीड़ित जन पूंजीवादी सत्ता का तख्ता उलट कर अपने सिर पर स्वयं ताज नहीं सजाते हैं।  

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।