पूंजीवादी तंत्र और आरएसएस बेनकाब

पिछले दिनों आत्महत्या की दो घटनाएं काफी चर्चा रहीं। पहली घटना हरियाणा और दूसरी घटना केरल से सामने आई। पहली घटना ने जहाँ पूंजीवादी तंत्र के जातिवादी गलीचपन को उजागर किया तो वहीं दूसरी घटना ने स्वयंभू सांस्कृतिक संगठन के यौन कुंठा के गलीचपन को उजागर किया।

हरियाणा में एक आईपीएस अधिकारी पूरन कुमार ने खुद को गोली मारने से पहले एक नोट छोड़ा जिसमें राज्य के शीर्ष उच्च अधिकारियों पर जातिवादी भेदभाव करने का आरोप लगाया। उन्होंने लिखा कि उनके साथ लंबे समय से जातिगत भेदभाव, अपमान किया जा रहा है और अब स्थिति असहनीय हो गई है। इस कारण वे आत्महत्या कर रहे हैं। उन्होंने मुख्य सचिव, डीजीपी सहित 15 उच्च अधिकारियों पर जातिवादी उत्पीड़न का आरोप लगाया।

आत्महत्या के बाद भी शासन-प्रशासन का रूख आरोपियों को बचाने का ही रहा। हल्की धाराओं में मुकदमे लिखे गए। विभिन्न सामाजिक संगठनों व परिवार के दबाव में कई दिन बाद धाराएं बदली गयीं। लेकिन अभी भी रिपोर्ट में आरोपियों के नाम का खुलासा नहीं किया गया है।

गौरतलब है कि आईपीएस पूरण कुमार की आत्महत्या ऐसे समय में हुई है जब हरियाणा की भाजपा सरकार अपने 1 साल पूरे होने पर जश्न मनाने जा रही थी। प्रधानमंत्री मोदी भी इस जश्न में शरीक होने वाले थे। जश्न में निश्चित ही भाजपा सरकार व मोदी प्रदेश में 'सामाजिक कल्याण' 'सबका साथ सबका विकास' की बातें करते प्रदेश में विकास की गंगा की शेखी बघारते खुद पीठ थपथपाते। लेकिन आत्महत्या की इस घटना ने उनके रंग में भंग डाल दिया। सामाजिक कल्याण की सारी बातों पर गोबर फेर दिया।

आत्महत्या की इस घटना ने पूंजीवादी तंत्र को भी बेनकाब कर दिया है। यूं तो दलितों-आदिवासियों के खिलाफ हिंसा-उत्पीड़न समाज में आम बात है। गरीब दलितों-आदिवासियों का उत्पीड़न तो यदा कदा ही पूंजीवादी समाज में कोई चर्चा का विषय बन पाता है। यह चर्चा का विषय भी तब बन पाता है जब विभिन्न सामाजिक संगठन अथक प्रयास करते हैं।

लेकिन आत्महत्या का यह मामला दिखाता है कि जमीनी स्तर से लेकर शीर्ष तक जातिवाद का जहर फैला हुआ है। पूंजीवादी राज्य के शीर्ष अधिकारी जातिवाद के कोढ़ से ग्रसित हैं जो अपने सह या अधीन अधिकारियों का जाति की वजह से लगातार अपमानित उत्पीड़ित कर रहे हैं।

दूसरी आत्महत्या की खबर केरल से है। केरल में भी एक आईटी प्रोफेशनल आनंदू अजी ने इंस्टाग्राम में एक वीडियो पोस्ट किया और फिर फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली।

उन्होंने वीडियो में कहा कि वह बचपन से आरएसएस से जुड़े रहे और तीन-चार साल की उम्र से ही आरएसएस के नेता लोग उनका यौन उत्पीड़न कर रहे हैं।

गौरतलब बात यह है कि आनंदू अजी की आत्महत्या ऐसे वक्त में हुई है जब आरएसएस अपनी स्थापना के 100 साल मनाने के जश्न में डूबा हुआ है और जगह-जगह आरएसएस के योगदान पर बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं। आत्महत्या की यह घटना आरएसएस के 'राष्ट्र निर्माण' में योगदान, 'सांस्कृतिक संगठन' की कलई खोल देता है।

आनंदू अली ने अपने वीडियो नोट में बताया कि पिता के साथ शौक-शौक में वह बहुत छोटी उम्र से आरएसएस के कार्यक्रमों में जाने लगे थे। आरएसएस के ओटीसी में भी उनके साथ यौन शोषण हुआ करता था। बालपन में इसे उन्होंने सहज स्वभाविक मानकर स्वीकार कर लिया। पर यह चीज लंबे समय तक चलती रही और बाद में दिक्कतें बढ़ती गयीं और वह गंभीर मानसिक समस्या से जूझने लगे। मानसिक दबाव इतना बढ़ गया कि अंततः उन्होंने आत्महत्या का कठोर फैसला लिया।

ऐसा नहीं है कि आरएसएस के भीतर बाल यौन शोषण की बातें अकेली हैं। लेकिन यह बातें हमेशा ही ठंडी मौत का शिकार बन जाती रही हैं। आनंदू अली की आत्महत्या के बाद उपजे सवाल के जवाब कभी सामने आ पाएंगे या नहीं यह तो भविष्य ही बताएगा। लेकिन भाजपा-आरएसएस का अब तक का रिकॉर्ड तो यही बताता है कि यह सवाल भी ठंडी मौत ही मर जायेगा।

हरियाणा और केरल दोनों ही घटनाओं को देखा जाए तो पहली घटना जहां पूंजीवादी तंत्र के रंध्र-रंध्र में मौजूद जातिवाद को दिखाती है तो दूसरी घटना पूंजीवादी राजनीति में आज सर्व प्रमुख और शक्तिशाली संगठन आरएसएस के चाल-चरित्र को उजागर करती है। पूंजीवादी राजनीति और तंत्र किस कदर गलीचपन के शिकार हैं, यह घटनाएं आप बयां कर देती हैं।

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