राजनीति से बेरुखी ठीक नहीं

राजनीति सत्ता को प्राप्त करने अथवा उसे अपने हाथ में कायम रखने के लिए किया जाने वाला संघर्ष या आम भाषा में लड़ाई है

राजनीति क्या है? यह प्रश्न राजनैतिक विज्ञान का गूढ़ प्रश्न होने से कहीं ज्यादा बेहद आम प्रश्न है। राजनीति सत्ता को प्राप्त करने अथवा उसे अपने हाथ में कायम रखने के लिए किया जाने वाला संघर्ष या आम भाषा में लड़ाई है। और जब कोई खुले या छिपे ढंग से अपने अथवा अपनों से जुड़े मुद्दों को लेकर लड़ाई करने लगता है तो अन्य लोग कह उठते हैं कि ‘ज्यादा चतुराई न दिखाओ’, ‘ज्यादा राजनीति मत करो’। यानी राजनीति के प्रति आम लोगों में एक ऐसी भावना आम है कि राजनीति खराब चीज है। और राजनीति करने वाले लोग धूर्त, चालाक, बात बनाने और घुमाने वाले, किसी को भी धोखा देने वाले और सत्ता पाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। ‘कुछ भी कर सकते’ का मतलब दंगा-फसाद, भाई से भाई को लड़ाना आदि सब कुछ है। 
    
राजनीति के प्रति घृणा मजदूरों-मेहनतकशों में आम है। हर चुनाव में करीब-करीब एक तिहाई से एक चौथाई आबादी ऐसी है जो कभी वोट डालने ही नहीं जाती है। और कभी-कभी तो यह संख्या आधी तक हो जाती है। वोट न डालने वालों और चुने गये लोगों के खिलाफ वोट डालने वालों की संख्या को आपस में जोड़ दिया जाये तो यह बात सामने आयेगी कि चुनाव जीता हुआ व्यक्ति आबादी की बहुसंख्या का नहीं बल्कि एक बेहद छोटी अल्पसंख्या का प्रतिनिधि है। और यही बात मौजूदा सरकार पर भी लागू होती है। 
    
यह एक सच्चाई है कि औपचारिक तौर पर भी और वास्तविक तौर पर भी कोई सांसद, कोई विधायक या अन्य औपचारिक तौर पर मतदाताओं के बेहद छोटे हिस्से की पसंद होता है और वास्तविक तौर पर वह जिनके हितों को साधता है, वह आबादी की अत्यन्त न्यून संख्या है। 
    
वर्तमान में मोदी सरकार किसका प्रतिनिधित्व वास्तविक तौर पर करती है। इसका लोकप्रिय जवाब सामने आयेगा कि अम्बानी और अडाणी के हितों को साधती है। ‘अम्बानी-अडाणी’ भारत के सबसे दौलतमंद लोगों के लोकप्रिय प्रतीक हैं। कांग्रेस के जमाने के ‘टाटा-बिडला’ ने मोदी के जमाने में ‘अम्बानी-अडाणी’ का रूप धर लिया है। ये बात इतनी आम हो गयी है कि कोई भी छूटते ही कहता है कि ‘मोदी सरकार’, ‘अम्बानी-अडाणी’ की सरकार है। अम्बानी-अडाणी कौन हैं? अम्बानी-अडाणी सहित भारत के सबसे बड़े पूंजीपति अपने विदेशी पूंजीपति मित्रों के साथ भारत के भाग्य-विधाता बने हुए हैं। और मोदी जैसे राजनेता इन ‘भाग्य-विधाता’ के हितों के हिसाब से ही देश को मूल तौर पर चलाते हैं। जब वे आम जनता को कुछ ‘‘खैरात’’ बांटते हैं तो भी वे इस बात का ख्याल रखते हैं कि कहीं जनता, भूख के मारे 1789 की फ्रांसीसी क्रांति की तरह क्रांति न कर दे। शासन-सत्ता छीनकर अपने हाथ में न ले ले। 
    
इस तरह देखें तो शासक वर्ग की राजनीति के दो आयाम हैं। पहला, पूरी दक्षता, पूरी क्षमता से शासक वर्ग के आर्थिक-राजनैतिक-सामाजिक हितों को साधना। और दूसरा या तो आम मजदूरों-मेहनतकशों को चिकनी-चुपड़ी बातों से भरमाना और यदि भरमाना कामयाब न हो रहा हो तो धर्म, जाति, इस्लाम, भाषा आदि के नाम पर लड़ाने वाले शासक वर्ग के लोग इस काम में इतने दक्ष और प्रवीण ही नहीं बल्कि व्यापक अनुभव वाले हैं कि आम मजदूर-मेहनतकश सौ में से सत्तर बार इनके बिछाये जाल में फंस ही जाते हैं। दंगे-फसाद में मारे जाते हैं। धूर्त राजनेता या पूंजीपति का तो बाल भी बांका नहीं होता है। मिसाल के तौर पर भारत के पूंजीपति वर्ग के राजनेताओं और उनके द्वारा चलायी जा रही पार्टियों की कार्यप्रणाली को ही देख लीजिये। मोदी, राहुल, मायावती, ममता, अखिलेश आदि-आदि नेताओं और इनकी पार्टियों के पुराने-नये इतिहास व वर्तमान को ही देख लिया जाए। 
    
क्या कांग्रेस पार्टी ने वही राजनीति नहीं की है जिसकी ऊपर चर्चा की गयी है। और अब भाजपा-संघ वही राजनीति नहीं करते हैं जिसके एक समय के सिद्धहस्त कांग्रेसी थे। भाजपाई-संघी वैसे कई-कई मामलों में कांग्रेसियों से भी दो कदम आगे हैं। कांग्रेसियों की राजनीति से संघी-भाजपाइयों की राजनीति में फर्क यह है कि संघी-भाजपाई भारत को एक ‘‘हिन्दू राष्ट्र’’ बनाना चाहते हैं जबकि कांग्रेसी इसके वर्तमान स्वरूप को ही कायम रखना चाहते हैं। संघी-भाजपाई जहां नंगी फासीवादी राजनीति करते हैं वहां कांग्रेसी धूर्ततापूर्वक पूंजीवादी-जनवादी राजनीति करते हैं। और आज के जो हालात हैं उसमें ‘‘भारत के भाग्य विधाता’’ हिन्दू फासीवादी राजनीति को अपने हितों के लिए ज्यादा मुफीद व लाभकारी मानते हैं। और इसलिए सारी तीन-तिकड़म करके उन्होंने मोदी को तीसरी बार सत्ता में पहुंचा दिया है। 
    
कांग्रेस, भाजपा के अलावा अन्य राजनैतिक दलों के भी मुख्य पालनकर्ता पूंजीपतियों के छोटे-बड़े हिस्से ही हैं। और ये प्रांतों से लेकर केन्द्र तक सत्ता में हिस्सेदारी या कब्जे के लिए ही राजनीति करते हैं। और इसके लिए तीन-तिकड़म, अवसरवाद, धोखा-धड़ी गठबंधन आदि जो भी करना पड़े ये अपनी गणना, आवश्यकता के अनुसार करते रहते हैं। और खुद इन पार्टियों के भीतर दूसरी पार्टियों के लोगों का आना-जाना इस बात की गवाही देता है कि सिद्धान्त, विचारधारा, आदर्श आदि बातों का वर्तमान पूंजीवादी राजनीति में स्थान उतना भी नहीं रह गया है जितना किसी रंगमंच के कलाकार के लिए विभिन्न तरह की भूमिकायें निभाते वक्त पोशाक और अभिनय का होता है। नवीन जिंदल जैसा पुराना कांग्रेसी (जिसकी मां सावित्री जिंदल भारत की सबसे अमीर औरत है) आम चुनाव के ठीक तीन दिन पूर्व भाजपाई बन जाता है और अपनी दौलत और संघी-भाजपाइयों के अनुयाइयों के दम पर सांसद भी बन जाता है। और उसकी मां जो कल तक कांग्रेसी और फिर भाजपाई बनती है तथा हरियाणा के विधानसभा चुनाव में भाजपा से टिकट न मिलने पर बगावत कर निर्दलीय खड़ी हो जाती है। 
    
किसी जमाने में, रोम में राजनैतिक पतनशीलता और राजनीतिज्ञों की धूर्त चालों से आजिज आकर एक राजनेता ने रोम को वेश्या की संज्ञा दे दी थी और फिर यह कहकर इसका बचाव भी किया कि ‘मैं जानता हूं रोम एक वेश्या है पर मेरी मां भी है’। और कुछ इसी तरह भारत के एक राजनेता जार्ज फर्नांडीज ने भारत की संसद को सूअरबाडा की संज्ञा दे दी थी। और उस वक्त वे स्वयं भी एक सांसद थे। ये ऐसी कटु स्वीकारोक्तियां हैं जो स्वयं धूर्त राजनेताओं ने की हैं। ये किसी जनपक्षधर या मजदूर-मेहनतकश द्वारा की गयी आलोचक टिप्पणियां नहीं हैं। 
    
मजदूरों-मेहनतकशों के सामने लाख टके का सवाल यह है कि वे क्या करें? वे चाहे कितनी ही घृणा राजनीति के प्रति पालें या अपने आपको राजनीति से एकदम दूर रखें परन्तु उनका जीवन, उनका भाग्य कमबख्त राजनीति ही तय करती है। और वे चाहें या न चाहें उन्हें राजनीति को गहराई से समझना होगा और उसमें अपने हितों के अनुरूप निश्चित दखल देना होगा। ठीक पूंजीपतियों की तरह उन्हें सत्ता को हासिल और उसे कायम रखने के लिए राजनीति करनी होगी। और राजनीति करने के लिए उसे अपने आपको संगठित करना होगा। मजदूरों की एक ऐसी पार्टी बनानी होगी जो सत्ता को हासिल करने व उसे उसके हाथों में कायम रखने के संघर्ष में, उसे नेतृत्व दे व संगठित कर सके। और सभी मेहनतकशों को एक साथ ला सके और उनके हितों को साध सके। क्योंकि मजदूर वर्ग सत्ता पर कब्जा किसी पूंजीवादी चुनावी तीन-तिकड़म, जोड़-तोड़ से नहीं कर सकता है और फिर इस पूंजीवादी राजसत्ता का वह करेगा भी क्या? तो उसे इंकलाब की राह ही पकड़नी होगी। और इसका मतलब क्या है? भगतसिंह के शब्दों में वर्तमान व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन है। पूंजीवाद के स्थान पर समाजवाद कायम करना है।  

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