राम मंदिर और हिंदू धर्म

इन दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा अयोध्या में राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियां जोरों पर हैं। इसके लिए तमाम लोगों को निमंत्रण भेजे जा रहे हैं। अयोध्या व देश भर में संघ-भाजपा द्वारा कई तरह के कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। ये लोगों को अयोध्या लाने के लिए विशेष प्रयास कर रहे हैं।
    
राम मंदिर उद्घाटन की घोषणा के बाद से कई विवाद उत्पन्न हो गए हैं। संघ-भाजपा हिंदू धर्म, हिंदू धर्म की आस्था, हिंदू धर्म के अनुसार पूजा को विधि और शास्त्र सम्मत करने की जगह जल्दबाजी में उद्घाटन करने में लगे हुये हैं। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा के उद्घाटन की तारीख हिंदू धर्म के ऋषि-मुनियों, पुरोहितों से पूछने, मुहूर्त निकालने की जगह 2024 के चुनाव को नजदीक आता देख जल्दी में घोषित कर दी गई। यह मंदिर प्रतिष्ठा की नहीं चुनाव जीतने के लिए चुनाव से पहले घोषित की गयी तारीख है। 
    
सनातन धर्म के अनुसार मंदिर पूरा बने बिना प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती है। राम मंदिर अभी बनने की प्रक्रिया में है। मंदिर का शिखर पूरा नहीं बना है। मन्दिर के लिए रथ यात्रा निकाली जा रही है। कई कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। संघ-भाजपा मंदिर के लिए पूरे देश में अक्षत बांट रहे हैं। अक्षत बांटना ना ही किसी वेद-परिषद में लिखा हुआ है और ना ही यह हिंदू धर्म में अभी तक परंपरा रही है। लेकिन संघ-भाजपा हिंदू धर्म की सारी परंपराओं से ऊपर है। वह जो कह दें वही परंपरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर उद्घाटन के मुख्य यजमान होंगे। वह यज्ञ भी करेंगे। यज्ञ सपत्नीक होता है। बिना पत्नी के ऐसी पूजा और यज्ञ नहीं होते हैं।
    
चारों पीठों के शंकराचार्य राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा को विधि और शास्त्र सम्मत नहीं मान रहे हैं। उनका मानना है कि रामनवमी पर प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम होना चाहिए। अन्य साधु-संत समाज भी इससे खुश नहीं है। विश्व हिंदू परिषद नेता व राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय का एक बयान खूब सुर्खियों में है। इसमें उन्होंने कहा कि, अयोध्या राम मंदिर रामानंद संप्रदाय का है। इसने हिन्दू धर्म के अलग-अलग शैव-वैष्णव आदि सम्प्रदाय के लोगों में मतभेद पैदा कर दिये हैं।
    
राम मंदिर की संघ-भाजपा के सालों के राजनीतिक वनवास को तोड़ने में बड़ी भूमिका रही है। संघ-भाजपा ने राम जहां भी रहे हों परंतु जमीनी स्तर पर इस बात को स्थापित किया कि अयोध्या में राम विराजते हैं और बाबरी मस्जिद की जगह यहां पर राम मंदिर होना चाहिए। राम मंदिर को स्थापित करने के लिए काफी मेहनत से दिन-रात एक कर आंदोलन की शक्ल दी गई। समाज में इस बात के स्थापित होते ही संघ-भाजपा का राजनीतिक वनवास भी छंटने लगा। ऐसे में संघ-भाजपा राम मंदिर के लिए हर वह चीज करने को तैयार है जो धर्म सम्मत, शास्त्र सम्मत ना होते हुए भी उनको प्रिय है।
    
राम मंदिर का स्थान हिंदू धर्म के चाहने वालों में चाहे जो भी हो लेकिन संघ-भाजपा के लिए यह प्रतिष्ठा का सवाल है। इसके लिए वह धार्मिक परंपराओं को तोड़ने को भी तैयार है। धर्म किसी भी व्यक्ति का निजी मामला होना चाहिए। उसका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। धर्म और राजनीति का आपस में कोई संबंध नहीं होना चाहिए। धर्म और राजनीति का मिला-जुला मिश्रण बनाकर संघ-भाजपा इसे समाज में स्थापित करना चाहते हैं। इस बात को भारतीय मीडिया मुस्तैदी से समाज में स्थापित कर रहा है। 
    
दरअसल संघ-भाजपा-मोदी का हिंदू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। यह राम मंदिर के नाम पर 2024 के चुनाव जीतना चाहते हैं। तीसरी बार सरकार बनाकर संघ के 100 साल पूरे होने पर अपनी मनमानी करना चाहते हैं। धार्मिक परंपराएं, धर्म ग्रंथ, आज शंकराचार्यों से नहीं जो संघ-मोदी कहें उन्हीं को परंपरा बताया जा रहा है। धार्मिक कार्यक्रमों, मंदिरों का उद्घाटन ऋषि-मुनि, शंकराचार्य, पुरोहित नहीं करेंगे तो कौन करेगा। राजनेता ही धार्मिक कार्यक्रमों का उद्घाटन करने लगेंगे तो शंकराचार्य और ऋषि-मुनियों की जरूरत ही क्या रह जाएगी। 
    
अपने हर कार्यक्रम को अद्भुत बताना और उसे इवेंट बनाना आत्ममुग्ध प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आदत है। संसद भवन का उद्घाटन आधा अधूरा और जल्दबाजी में किया गया। इस पर सवाल करने की जगह इसको अद्भुत बताया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को डर है कि 2024 के बाद वह प्रधानमंत्री रहें कि नहीं, पता नहीं। लेकिन काफी लम्बे संघर्ष के बाद बने राम मंदिर का उद्घाटन कर वह संघ-भाजपा, अपने चहेतों की नजरों में महान बनना चाहते हैं। हिंदू धर्म में चाहे जो परंपरा हो, जिसको निभाना हो वो निभाएं। लेकिन संघ-भाजपा-मोदी को अपने राजनीतिक हितों को साधने के लिए जो करना है वह वही करेंगे।        -महेश, हल्द्वानी
 

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