पिछले कुछ समय से राहुल गांधी की राजनीति चमक रही है। वे अपनी अलग गतिविधियों की वजह से लगातार सुर्खियों में बने रहते हैं। जैसे-जैसे मोदी सरकार की चमक फीकी पड़ रही है, राहुल गांधी की चमक बढ़ रही है। स्वयं मोदी सरकार कुछ न कुछ ऐसा कर रही है जिससे राहुल गांधी को सुर्खियां बटोरने और अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने का मौका मिल रहा है। मसलन पैलेट गन से शिकार बनाये गये व्यक्ति के मामले में, पुलिस का एफ आई आर कई घंटों तक न दर्ज करना और राहुल गांधी का करीब 6 घंटों तक हाई प्रोफाइल ड्रामा रचना रहा हो।
पहले दिन राहुल दिल्ली में महफिल लूट रहे थे तो दूसरे दिन पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ में राहुल गांधी ने दिलचस्प ढंग से अपनी राजनीति परोसी। छात्राओं व युवा महिलाओं ने वे सब बातें रखीं जो असल में सबको पता हैं। राहुल मोदी, योगी व भागवत के स्त्री विरोधी बयानों की पोल खोलते हुए, ‘पितृसत्ता का नाश करो’ (स्मैश पेट्रायकी) का नारा उछाल रहे थे। मनुस्मृति के स्त्री विरोधी श्लोक के साथ महिलाओं की आजादी की वकालत कर रहे थे।
जो भी हो राहुल गांधी की आक्रामक राजनीति, अंदाजे-ए-बयां, स्टाइल, मुद्दे आदि-आदि कईयों को खूब लुभा रहे हैं। उनके मुरीद बढ़ रहे हैं। और ऐसे समय में जब देश में हिन्दू फासीवादी सत्ता में बैठे हों, उन्होंनें देश में दमघोंटू माहौल बनाया हो तब राहुल की राजनीति कईयों को राहत व सुकून व उम्मीद देने वाली लग रही है। यहीं पर पूंजीवादी राजनीति का असली घोटाला एक दूसरे रूप में सामने आता है। पहला घोटाला तो हिन्दू फासीवादी राजनीति है जिसे भारत के सबसे बड़े पूंजीपतियों ने पाला-पोषा और जो अब अपने शीर्ष से फिसलने लगी है। मोदी की जितनी लानत-मलामत हो रही है उससे कम मोहन भागवत व संघ की भी नहीं हो रही है।
राहुल गांधी की राजनीति क्या है। अगर पूंजीवादी विश्लेषकों की भाषा में कहें तो ‘सेण्टर-लेफ्ट’ (संसदीय मध्य वामपंथी या पूंजीवादी-सुधारवादी) है। लेफ्ट से हटकर ‘सेण्टर लेफ्ट’ और ज्यादा सुधारवादी व लफ्फाजी में और ज्यादा हुनरमंद होता है। लेफ्ट के मुकाबले ‘सेण्टर-लेफ्ट’ के मामले में पूंजीपति वर्ग उस पर ज्यादा भरोसा करता है। जानता है कि अपने ही आदमी हैं। और फिर राहुल के बाप-दादाओं ने भारत के पूंजीपति वर्ग की ढंग से सेवा भी की है। कई ने तो जान तक गंवा दी। ऐसे में राहुल, मोदी या भाजपा के पिटने की स्थिति में भारत के एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग की स्वाभाविक पसंद होंगे। शर्त है कि भारत के एकाधिकारी घराने (अडाणी-अम्बानी आदि) भारत के आधे-अधूरे लोकतंत्र का गला घोंटकर खुल्लम-खुल्ला फासीवादी निजाम ही न लाना चाहते हों।
राहुल गांधी की राजनीति हिन्दू फासीवादियों के खुले व नंगे झूठ के स्थान पर आधे सच पर आधारित है। वे जो तथ्य, तर्क, बातें आदि पेश करते हैं, वे अपनी शैली या प्रस्तुति में भले ही लोक-लुभावनी हों परन्तु वे आधे सच पर आधारित होती हैं। मसलन पैलेट गन से घायल करने का मामला हो या फिर पुणे में महिलाओं की गुलामी या डर-भय से जुड़े मामले हों, ये सब आधे सच आधे फसाने के मामले हैं। ऐसे में उनके कुछ सयाने विरोधी कांग्रेस पार्टी या उनके बाप-दादाओं के काल की बातों को सामने ला देते हैं। कुछेक बार तो राहुल, कुछ मामलों में अपनी पार्टी-नेताओं के अतीत के क्रूर कारनामों के लिए चतुराई भरी माफी भी मांग चुके हैं। और अक्सर ही इस तरह से पूरी सच्चाई सामने आती है। पैलेट गन कांग्रेस काल में ही उपयोग में लानी शुरू की गयी थी। और इसी तरह यदि इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में ‘पितृसत्ता को ध्वस्त करो’ की बात राहुल गांधी को करनी पड़ रही है तो इसलिए कि आजादी की लड़ाई के समय कांग्रेस ने पितृसत्ता की रक्षा करने वाली सामंती-धार्मिक ताकतों के साथ समझौता किया हुआ था। और जो साम्राज्यवाद व सामंतवाद विरोधी जनवादी (डेमोक्रेटिक) क्रांति उस वक्त आकार ग्रहण कर रही थी, उसकी हत्या कर दी गयी। अन्यथा न भारत में पितृसत्ता बचती न जाति व्यवस्था बचती और न इतनी क्रूर व निर्मम हिन्दू फासीवादी सत्ता होती जो अपने ही नागरिकों पर उन्हीं के पैसे (कर) से चलने वाली पुलिस से गोलियां या पैलेट गन खुलेआम चलवाती। तब भी कांग्रेस ने ऐसे तत्वों व तबकों से समझौता किया था और आज भी यह बात एक हद तक ठीक है। राहुल गांधी की पार्टी में आज भी ऐसे लोगों की भरमार है जो पुरानी राक्षसी शक्तियों के साथ गाहे-बगाहे खड़े होते रहते हैं।
राहुल गांधी की राजनीति एक ओर उन्हें पूंजीवाद की ऐसी पैरोकारी की ओर धकेलती है जहां उस पर सुधारों का, लोक-लुभावनवाद का परदा पड़ा हो तो दूसरी ओर उन्हें पूंजीवाद के कारण खासकर नंगे-लुच्चे-लफंगे पूंजीवाद के कारण पैदा होने वाली समस्याओं की खुली आलोचना या तीखी आलोचना की ओर धकेलती है। राहुल गांधी के पास या सारे ही वाम सुधारवादियों के पास भारत की गरीबी, बेरोजगारी, स्त्रियों या दलितों के साथ गैर बराबरी आदि का अधिक से अधिक समाधान ‘लोक कल्याणकारी राज्य’ का है। और इस मामले में उनकी राजनीति अपने सबसे उग्र व शुद्ध रूप में नेहरू-अम्बेडकर के लोक कल्याणकारी राज्य की है। और वह और कुछ नहीं लोक कल्याण का मुलम्मा चढ़ा पूंजीवादी राज्य ही है। जहां मजदूर-मेहनतकश पूंजीपति वर्ग के ऐसे गुलाम होते हैं जहां उनकी बेड़ियां उन्हें चुभे नहीं इसलिए सुनहरे मखमल का कपड़ा उन पर लपेट दिया जाता है। मोदी के हिन्दू फासीवादी काल में वह कपड़ा या तो फाड़ दिया गया या फिर उस पर नुकीले तारोें की एक पट्टी चढ़ा दी गयी है।
भारत के मजदूर-मेहनतकशों, छात्र-युवाओं, स्त्रियों-दलितों या सभी शोषित-उत्पीड़ितों की असली मुक्ति का रास्ता राहुल की वाम लफ्फाजी से भरी सुधारवादी पूंजीवादी राजनीति में नहीं है। उनकी मुक्ति का रास्ता वास्तव में सभी तरह की पूंजीवादी राजनीति को नकारने और क्रांतिकारी राजनीति को अपनाने से शुरू होता है।
भारत का मजदूर वर्ग ही वह वर्ग या वह ताकत है जो भारत के सभी शोषित-उत्पीड़ितों की मुक्ति की राह खोल सकता है। भारत का मजदूर वर्ग जब जागेगा तब वह अपनी करोड़ों भुजाओं से उस शोषण-उत्पीड़न-दमन के तंत्र को एक झटके में उखाड़ फेंकेगा जो आज शोषित-उत्पीड़ितों के ऊपर लदा हुआ है।
ऊपर लिखी गयी बात को यदि भारत की करोड़ों मेहनतकश स्त्रियों के संदर्भ में सोचें तो राहुल गांधी की बात आधी सच है कि उसके ऊपर पितृसत्ता की दासता है। राहुल यह नहीं बताते कि यह पितृसत्ता किसके दम पर काम कर रही है। और यह भी नहीं बताते कि भारत की करोड़ों स्त्रियां उनमें वे युवा छात्रायें भी शामिल हैं जो पुणे के मंच में थीं, दोहरी-तिहरी दासता की शिकार हैं। वे न केवल पितृसत्ता, धार्मिक-सामंती सत्ता बल्कि पूंजी की सत्ता की भी गुलाम हैं। वे उजरती गुलाम हैं। और पूंजी की सत्ता ही बाकी सत्ता को बना कर रखे हुयी है। और जब तक पूंजी की सत्ता का खात्मा नहीं होगा और श्रम की सत्ता यानी मजदूर-मेहनतकशों का राज नहीं आयेगा तब तक भारत की करोड़ों स्त्रियां पूर्णतया आजाद नहीं होंगी।
राहुल गांधी की राजनीति भारत के करोड़ों मजदूर-मेहनतकशों शोषितों-उत्पीड़ितों के किसी काम की नहीं है। खुदा न खास्ता वे कभी भविष्य में सत्ता में आ गये तो उनके हिस्से भी वही बदनामी आयेगी जो उनके पुरखों के हिस्से आती रहती है।