राजद्रोह, NSA कानून का दुरुपयोग और तमाशा देखती सुप्रीम कोर्ट

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
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अक्सर ही सरकारें अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए और सरकार के खिलाफ हो रहे न्यायपूर्ण संघर्षों को दबाने के लिए दमनकारी कानूनों का इस्तेमाल करती हैं। इन काले कानूनों का दुरुपयोग कर अपने विरोधियों को लंबे समय तक जेल में रखने का काम करती रहती हैं। CAA, एनआरसी आंदोलन के समय में हमने देखा कि तमाम लोगों को गिरफ्तार किया गया और बगैर ट्रायल के लंबे समय तक जेलों में रखा गया। शरजील इमाम और उमर खालिद दोनों ही लगभग 7 साल से जेल में हैं और अभी तक केस शुरू भी नहीं हुआ है। नीचे से लेकर ऊपर तक हर अदालत में जमानत की गुहार लगाई गई पर हर जगह से खारिज कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने तो एक कदम और आगे जाकर यह कहा कि अब 1 साल से पहले जमानत की एप्लीकेशन लगा भी नहीं सकते हैं। इस तरह के मामलों की सूची तो काफी लंबी है पर हम अपने लेख में दो केसों के बारे में बातचीत करना चाहेंगे, जिन केसों में सरकार ने राजद्रोह व NSA लगाया और अब एक लंबे समय बाद अपने आप केस वापस ले लिया है।
    
पहले मामले में प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को सरकार द्वारा दंगा भड़काने, राजद्रोह के आरोप में 28 मई 2025 को गिरफ्तार कर लिया गया और दूसरे मामले में लद्दाख के सोनम वांगचुक को 24 सितंबर 2025 में लद्दाख से गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया गया। अब प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को 16 मार्च 2026 व सोनम वांगचुक को 14 मार्च 2026 को सरकार द्वारा राजद्रोह केस वापस लेने पर यह कहने पर कि अब हम केस नहीं चलाना चाहते हैं, जमानत दे दी गई।
    
परंतु इस दौरान क्या-क्या हुआ। 170 दिन सोनम वांगचुक जेल में रहे। उनके परिवार वाले जमानत की अर्जियां लगाते रहे, उनको मिलने तक नहीं दिया गया। मीडिया ट्रायल चला, सोशल मीडिया में कई रील बनाकर उनको आतंकवादी, देशद्रोही जाने क्या-क्या कहकर दोषी ठहरा दिया गया, गोदी मीडिया ने उनको पहले ही अपराधी, देशद्रोही, आतंकवादी तक घोषित कर दिया था। मानो उनको सजा दे ही दी गई हो। सुप्रीम कोर्ट प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को कहती है कि सोशल मीडिया पर पोस्ट थोड़ा देखकर-समझकर करनी चाहिए। वह तो सरकार ने बड़प्पन दिखाया कि केस वापस ले लिया है।
    
क्या वास्तव में भी सरकार द्वारा लगाई गई धाराएं इतनी हल्की या मामूली थीं कि यूं ही किसी पर लगा दी जा सकती हैं। क्या इस तरह के मामलों में सरकार पर कोई एक्शन नहीं होना चाहिए। सरकारों ने पूरी न्याय व्यवस्था का मजाक बना कर रखा हुआ है। यूं ही किसी पर कोई भी धारा लगाकर उसको बंद कर दो, सालों-साल किसी को जेल में सड़ा दो। कोई बोलने वाला नहीं है कोई जवाबदेही नहीं।
    
क्या न्याय व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट को इस तरह के मामलों को अपने संज्ञान में नहीं लेना चाहिए, उस व्यक्ति के जनवाद  की रक्षा नहीं करनी चाहिए उल्टा सुप्रीम कोर्ट उन व्यक्तियों को नसीहत दे रही है कि आप बच गए, आगे से संभल के रहिएगा।
    
खेल को अगर गौर से देखा जाए या समझा जाए तो साफ-साफ दिख रहा है कि खेल पूरे सत्ता की ताकत का है। कोई डेमोक्रेसी नहीं, कोई किसी का अधिकार नहीं, सत्ता जिसके हाथ में है सब कुछ उसका है। प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद के पूर्वज कांग्रेसी रहे हैं और वह वर्तमान में समाजवादी पार्टी से जुड़े हुए हैं और सबसे बड़ी बात कि वह मुसलमान हैं, अल्पसंख्यक हैं, इसलिए उनको टारगेट में लिया गया ताकि माहौल बनाने में आसानी हो। उधर सोनम वांगचुक बार-बार सरकार के झूठ को उजागर कर रहे थे, उनके लिए सर दर्द बन गए थे। सरकार ने सोचा क्यों न इसी को उठाकर बंद कर दिया जाए। सारा लेह-लद्दाख शांत पड़ जाएगा। परंतु सरकार गलती में है ऐसा नहीं होने वाला है। आपने एक ऐसा बीज बोया है जो बार-बार उठेगा और आपके लिए सर दर्द बनेगा। पहली बार भारत के इतिहास में ऐसा हुआ है कि किसी पूर्ण राज्य को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया है। आपने लेह-लद्दाख के लोगों को धोखे में रखा है। वहां जो भी हालात बुरे हो रहे हैं वह आपकी सरकार के कारण हैं। वहां के नौजवान बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं वहां के बच्चे पढ़ाई के लिए तरस रहे हैं।
        -दीपक, फरीदाबाद

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