संघी लम्पट और नौकरी

संघी लम्पट और नौकरी

संघी लम्पट और नौकरी

पिछले दिनों भाजपा के पूर्व विधायक राघवेन्द्र प्रताप सिंह ने उ.प्र. के सिद्धार्थनगर में एक जनसभा में मुसलमानों के खिलाफ काफी भड़काऊ बयान दिया। उन्होंने खुलेआम हिन्दू युवाओं से मुसलमान लड़कियों से विवाह कर उन्हें हिन्दू बनाने का आह्वान करते हुए नारा दिया ‘‘मुसलमान लड़कियां लाओ नौकरी पाओ’’। यानी उन्होंने खुलेआम बेरोजगार युवाओं को न्यौता दिया कि अगर वे मुसलमान लड़कियां लायेंगे तो उन्हें नौकरी दिलायी जायेगी।

भाजपा विधायक के इस बयान को अतिश्योक्ति भी मान लें तो भी यह सवाल उठना लाजिमी है कि संघ-भाजपा व उससे जुड़े तमाम संगठनों में जो युवा आज शामिल हो रहे हैं; जो सड़क पर गुण्डागर्दी से लेकर मॉब लिंचिंग को तैयार रहते हैं, उनकी रोजी-रोटी कैसे चल रही है। जाहिर सी बात है कि ये भर्ती हो रहे युवा किसी फैक्टरी-कारखाने में 10-12 घण्टे काम करने वाले या 10 से 5 दफ्तर में नौकरी करने वाले नहीं हैं। क्योंकि ये किसी भी समय और कहीं भी प्रकट हो जाते हैं, और ऐसा नौकरीपेशा मजदूर-कर्मचारी नहीं कर सकते। तब फिर गुण्डागर्दी-लम्पटाई के लिए हमेशा प्रस्तुत ये नौजवान आखिर कुछ काम-धाम करते भी हैं या नहीं और अगर नहीं करते तो इनका खर्चा कैसे चलता है?

थोड़ा गौर से देखने पर पता चलता है कि इन युवाओं में एक हिस्सा दरअसल घोषित तौर पर बेरोजगार है, उसके पास कोई काम नहीं है और वह अपने मेहनतकश मां-बाप की मामूली कमाई पर पलता है। समाज में हर ओर से दुत्कारे जाने वाले ये बेरोजगार गले में रामनामी दुपट्टा डालकर अपने जीवन को कुछ सार्थक अपनी कुछ पहचान मानने लगते हैं। एक अन्य हिस्सा छोटे-छोटे स्वरोजगारों से जुड़ा है- किसानी या छोटी दुकानदारी से जुड़ा है जिसमें कभी भी वह समय निकाल अपने लंपट मिशन को अंजाम देने पहुंच जाता है। एक अन्य हिस्सा निचली खासकर दलित जातियों से आता है जो सफाईकर्मी, पशुपालन या अन्य किसी मामूली रोजगार से जुड़ा होता है। एक छोटा हिस्सा पढ़े-लिखे बेरोजगारों का भी है जो किसी नौकरी की तैयारी कर रहा होता है। खाते-पीते घरों या राजनीति में सक्रिय घरों से आने वाले युवाओं का भी एक हिस्सा होता है जो नेतागिरी में ऊपर उठना चाहते हैं।

जहां तक संघी लंपट संगठनों में भर्ती होने पर होने वाले आर्थिक लाभों का प्रश्न है तो यहां दलाली-वसूली के अतिरिक्त कुछ खास लाभ नहीं होता। हां, दिन भर की भागदौड़ के पेट्रोल और चाय-नाश्ते का इंतजाम संघी मशीनरी व छुटभैय्ये नेताओं के दम पर होता रहता है। चुनावों के वक्त इनकी कमाई बढ़ जाती है। बाकी दिनों में तो कभी-कभार ही अच्छी कमाई किसी शिकार के फंसने पर होती है। हां, इस दौरान हासिल पहुंच-पहचान के इस्तेमाल से कुछ लोग मामूली नौकरी पा जाते हैं तो कुछ दलाली का काम कर ‘जनसेवा’ कर गुजारा करने लगते हैं।

ऐसे में यदि कोई भाजपा नेता ‘मुसलमान लड़की लाओ नौकरी पाओ’ का नारा लगाता है तो वह प्रकारान्तर से यह स्वीकारता है कि नौकरी आज के युवाओं की उनकी तथाकथित धर्मरक्षा से बड़ी समस्या है। यह यह भी स्वीकारता है कि उनकी मोदी-योगी की सरकार सालों सत्ता में रहने पर भी युवाओं के लिए नौकरी के एकदम विफल है। ऐसे में संघी लंपट बन नौकरी पाने का आह्वान इनकी सरकारों की नाकामी को ही दिखाता है।

संघी कारकून अच्छे से जानते हैं कि वे अपने साथ खड़ी लम्पटों की इस फौज को बेहतर रोजगार या जीवन नहीं दे सकते। जहां संघ-भाजपा के बड़े नेता-कार्यकर्ता आज बड़े-बड़े बिल्डर्स, ठेकेदार बन लाखों-करोड़ों में खेल रहे हैं वहीं इनके जमीनी लंपटों के लिए इनके पास कुछ भी सम्मानजनक काम नहीं है। ऊपरी संस्तर नीचे वालों पर कुछ टुकड़े तो फेंक सकता है; उनके दिलों में अपने जैसा अमीर बनने का सपना तो बो सकता है, पर कुछ सकारात्मक नीचे वालों के लिए नहीं कर सका।

ऐसे में जब संघी कारकून मुसलमानों का आर्थिक बहिष्कार करने, मुसलमान दुकानों से सामान न खरीदने का आह्वान करते हैं तो उनका लक्ष्य साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के साथ हिन्दू व्यवसायियों-दुकानदारों का धंधा बढ़ाना भी होता है। हालांकि आज हर क्षेत्र में बनी समूची मूल्य श्रंखला न देख पाने के चलते वे इस सबसे हिन्दू-मुसलमान दोनों छोटे कारोबारियों का लाभ कम, नुकसान ज्यादा करते हैं। पर धर्मरक्षा के अपने दावे को वे कुछ स्वीकार्यता दिला लेते हैं।

कुल मिलाकर संघी ताकतें जब आम तौर पर पूरे समाज में मजदूर-मेहनतकशों का जीवन बुरा कर रही हों, पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ा रही हों, तब वे अपने गरीब लंपट कार्यकर्ताओं का जीवन भी नहीं सुधार सकतीं। वो उन्हें नौकरी का ख्वाब दिखा कुकर्म करवा सकती हैं पर सम्मानजनक नौकरी नहीं दिला सकतीं।

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