दो मिस काॅल। फैक्टरी की व्यस्तता के बीच जैसे ही मोबाइल खोला मिस काॅल पर नजर गई, जो संकेत थी कि सुभाष को कोई जरूरी काम है। फैक्टरी के शोरगुल में बातचीत संभव नहीं हो सकती। सुरक्षित जगह तलाशी गई। ‘हां सुभाष भाई! सब ठीक तो है?’
सुभाषः ‘आप कहां हो? एक पड़ोस के राजमिस्त्री की करंट लगने से मौत हो गई है, हम लोग ठेकेदार के खिलाफ तहरीर देने आए हैं। कैसे लिखनी है क्या बता सकते हो?’ फोन पर सुभाष ने पूरी बात बताई। बातचीत चल ही रही है तभी प्रमोद को सुपरवाइजर ने कहा ‘अरे तुम यहां क्या कर रहे हो?, अर्जेंट माल जाना है। बात बाद में कर लेना। ‘फोन कान से हटाकर’ हां आ रहा हूं।’ प्रमोद ने कहा। ‘अभी थोड़ा बिजी हूं फ्री होते ही काॅल करता हूं’। सुभाष को सूचना दी जाती है।
महेश, महादेव नगर का निवासी। एक राजमिस्त्री, जो कई सालों से मोमिन ठेकेदार के पास दिहाड़ी कर रहा था और इस बार भी एक बिल्डिंग निर्माण में काम कर रहा था। लोहे के जंगले में करंट फैला। मानव निर्मित विद्युत धारा अपनी बारी में जीवित जीवन धारा को निगल गई।
महेश का घर सुभाष की दुकान से महज चंद कदम दूर है। सुभाष! समाज के दुख दर्द में शामिल अच्छा इंसान है, संवेदनशील और जुझारू इंसान। अपनों को खोने की पीड़ा जिसने करीब से देखी है वो आहत है। 5 बच्चे एक पत्नी, उनका पालन-पोषण, जीवन निर्वाह। सैकड़ों प्रश्न यकायक मस्तिष्क पर आघात करते हैं।
सिंचित अनुभव कहता है कि ठेकेदार और निर्माणाधीन मैरिज हाॅल के मालिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाने का प्रयास किया जाये। गांव वाले और कुछ परिचित चैकी में साथ हैं ताकि इस नाइंसाफी का इंसाफ हो, या फिर कोई बेहतर मुआवजा मुकर्रर हो क्योंकि यहां प्रश्न 6 जीवित प्राणियों के ताउम्र गुजर बसर का है। और इसी क्रम में प्रमोद को फोन किया गया था।
‘सुभाष भाई कहां हो?’ शाम करीब साढ़े सात बजे फैक्टरी से निकलकर प्रमोद ने फोन किया। ‘बाॅडी को पोस्टमार्टम के बाद घर ले आए हैं, मैं भी निकल रहा हूं।’ जवाब आया। ‘मैं घटना की जगह पहुंचने वाला हूं’। ‘चलो ठीक है आप पहुंचो मैं भी लौटकर आ रहा हूं।’ सुभाष ने बात पूरी की।
‘बाॅडी घर क्यों ले आए? ये काम गलत हो गया है।’ हाथ मिलाते हुए प्रमोद ने पूछा। ‘कल सुबह यहीं लेकर आयेंगे बात हो गई है लोगों से।’ सुभाष का जवाब।
प्रमोदः यहां लाकर कोई फायदा नहीं होगा, बेहतर होगा कि चैकी या कोतवाली पर बाॅडी को रखा जाय। यहां वीराने में रखना ताकत जाया ही होगी। बेहतर हो कि चैकी या कोतवाली पर रखा जाय महेश की बाॅडी को।’
बात कायदे की थी। स्वीकृति में सुभाष ने सर हिलाया। सुभाष ने कहना जारी रखा ‘ध्यान रहे कि बाॅडी घर में पहुंचने के बाद सुबह तक समीकरण बदलने का खतरा मौजूद हो जाएगा। सुबह तक कोई न कोई बिचैलिया अपना खेल खेलने पहुंच जाएगा। तुम्हें सचेत रहना होगा और कोशिश करनी होगी कि बाॅडी को अंतिम संस्कार के लिए न ले जाया जाय।’ प्रमोद ने बात पूरी की।
‘ठीक कह रहे हो भैय्या बाॅडी सुबह चैकी पर लेकर आयेंगे, सब लोग तैयार हैं।’
प्रमोदः अभी चल सकते हैं महेश के घर?
सुभाष: हां चलो, चलते हैं।
अगली सुबह जिसका डर था वही हुआ। मक्कार चीलें और गिद्ध अपना दांव खेल चुके हैं। महज 3 लाख मुआवजे की रकम पर महेश के भाई समझौते पर राजी हो चुके हैं। मायका पक्ष चैकी ले जाने की जिद पर है और सुभाष की तरफ आस भरी निगाहों से देखता है मगर महेश के भाई अंतिम संस्कार की जिद पकड़े हुए हैं। पांच बच्चों की परवरिश और सुरक्षा, महेश की पत्नी अपने जेठों की इच्छा के आगे निःसहाय हो चुकी है और उतना ही निःसहाय सुभाष खुद को भी पाता है।
प्रमोद: क्या बात सुभाष भाई! दुखी लग रहे हो? हाथ मिलाते हुए सुभाष से पूछा।
सुभाष: ‘मेरे पहुंचते ही उसके भाई मुझसे लड़ने लगे। मैंने तो ट्रैक्टर ट्राली भी बुला ली थी।’ दुखी होते हुए आवाज आई।
प्रमोद: ‘तुम जो कर सकते थे, जिस सही जमीन पर लड़ सकते थे तुम लड़े। तो क्या हुआ जो तुम हारे। हताशा या दुख करना योद्धा को शोभा नहीं देता।’ साहस बंधाते हुए प्रमोद ने कहा।
तभी दुकान पर 8, 9 साल की बच्ची आती है ‘भैय्या मम्मी की आंखों के लिए ये दवा दे दो।’
सुभाष की आंखों में व्याकुलता है। दवा लेकर छोटी लड़की चली गई।
सुभाष: ‘ये महेश की सबसे बड़ी बेटी है।’ कुछ पल की खामोशी।
प्रमोद: इंसान की संवेदना ही उसे आदमी से मनुष्य बनाती है और मनुष्यता का सबसे ऊंचा रूप है एक कामरेड होना। गलत होने पर दुखी होना, आक्रोशित होना इंसानियत का धरातल है मगर महज भावुक होकर तो ये सब कुछ नहीं बदला जा सकता।
सुभाष: फिर सही रास्ता क्या है? इन सबका हल क्या है?
प्रमोद: सबसे पहले समस्या की मूल वजह तक पहुंचना, दूसरा इन सबको बदलने के लिए सचेत प्रयास। यही वो सफलता की कुंजी है जो एक नए मानव को जन्म देगी और नई दुनिया, नए समाज का निर्माण करेगी।
कुछ देर की खामोशी सब कुछ ढंक लेती है। -पथिक