सत्ता हाथ से जाते देख नेतन्याहू बौखलाया

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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इजरायल के आम चुनाव में इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की पार्टी व उसके गठबंधन को मुंह की खानी पड़ी है। चुनाव में जीत हासिल करने के लिए नेतन्याहू ने हर दांव चला था। और हार खाने के बाद भी उसका सत्ता हासिल करने का मंसूबा बना हुआ है। वह हरचंद कोशिश कर रहा है कि सत्ता किसी भी तरह से उसके हाथ में बनी रहे। नेतन्याहू ढंग से जानता है कि इधर सत्ता उसके हाथ से फिसली उधर उसके बुरे दिन शुरू हो जायेंगे। उस पर न केवल भ्रष्टाचार के मुकदमे चलेंगे बल्कि उसके द्वारा इजरायल को अनवरत युद्ध में धकेले जाने के खिलाफ खासकर राष्ट्र की सुरक्षा में चूक का मुकदमा भी चलेगा। और जहां देश के भीतर उस पर मुकदमे चलेंगे वहां देश के बाहर गाजा नरसंहार के कारण वह एक वांछित अपराधी भी है। 
    
इजरायल के संसदीय चुनाव में किसी भी पार्टी या चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत नहीं मिला है। 120 सदस्यीय संसद (नेसेट) में नेतन्याहू के गुट को 53 सीटें जबकि उनके विरोधी पूर्व सेनाध्यक्ष गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को 48 सीटें मिलने की उम्मीद है। सबसे बड़ा उलटफेर अरब बहुमत वाली पार्टियों ने इस चुनाव में किया है। उन्हें 19 सीटें मिलनी हैं। ‘जाॅइंट लिस्ट’ व ‘रा’म नामक अरब पार्टियों के 19 सीटें मिलने से नेतन्याहू एकदम बौखला गया है। वह अरब पार्टियों पर ‘चुनाव चुराने’ का आरोप लगा रहा है। और अपनी हार के लिए अरब पार्टियों के साथ विदेशी साजिश का आरोप लगा रहा है। नेतन्याहू की हार से इजरायल में आम तौर पर खुशी का माहौल है। 
    
नेतन्याहू ने चुनाव में जीत हासिल करने के लिए वह सब कुछ किया जो वह कर सकता था। उसने देश के भीतर अपने फासीवादी जियनवादी विचारों के अनुरूप उग्र प्रचार किया। अंधराष्ट्रवादी भावनाओं को उभारा व मुसलमानों को गालियां दीं। उसने गाजा नरसंहार को अपनी एक उपलब्धि के रूप में गिनाया। इसके अतिरिक्त उसने हमास, हिजबुल्ला व ईरान के सुप्रीम नेताओं की कायराना हत्या को भी अपनी जीत के लिए दांव पर लगाया पर उसके इन सारे दावों, कारनामों को इजरायल की जनता ने खास तवज्जोह नहीं दी। उसे हार का मुंह देखना पड़़ा। 
    
इजरायल में हमेशा से गठबंधन सरकारें बनती रही हैं। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है कि अरब पार्टियों की सत्ता में भागीदारी न हो सके इसके लिए नेतन्याहू का गठबंधन गादी आइजनकोट के गठबंधन की कुछ पार्टियों को तोड़कर पुनः सत्ता पर काबिज हो जाये। या फिर दोनों नेतन्याहू व गादी मिलकर ‘राष्ट्रीय एकता’ की सरकार बना लें। वैसे भी गादी नेतन्याहू की तरह फासीवादी जियनवादी है। वह पूर्व सेनाध्यक्ष है और नेतन्याहू की ही तरह उसके हाथ भी निर्दोष फिलिस्तीनी बच्चों, औरतों व मर्दों के खून से सने हुए हैं। वह भी वही मंसूबे रखता रहा है जो नेतन्याहू रखता रहा है। दोनों ही गाजा के कसाई हैं। इसलिए इनमें से कोई या दोनों ही सत्ता में आये फिलिस्तीन व पश्चिम एशिया में हालात जैसे हैं वैसे ही बने रहेंगे। 

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